भव-रोग | Bhav-Rog

तर्ज : ज्ञान ही सुख है राग ही दुख है …

ज्ञान में राग ना, ज्ञान में रोग ना,
राग में रोग है, राग ही रोग है।। टेक।।

ज्ञानमय आत्मा, राग से शून्य है,
ज्ञानमय आत्मा, रोग से है रहित।
जिसको कहता तू मूरख बड़ा रोग है,
वह तो पुद्गल की क्षणवर्ती पर्याय है ।। 1 ।।

उसमें करता अहंकार-ममकार अरु,
अपनी इच्छा के आधीन वर्तन चहे।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह