भव दुख से बचने का मार्ग जो दिखाती है,
जिनवाणी कहलाती है, जिनवाणी कहलाती है।
भव दुख से बचने का मार्ग जो दिखाती है,
जिनवाणी कहलाती है।
पर्याय छाँव ढलती, आती है जाती है,
ध्रुव ही सच्चा साथी है, ध्रुव ही सच्चा साथी है।
भव दुख से बचने का मार्ग जो दिखाती है,
जिनवाणी कहलाती है।
भव्य जनों प्रथमानुयोग से, जानो तुम करम गति को,
जानो करणानुयोग से, गुणस्थान तीनों लोक को।
कलिकाल में भी कोई अपना तो है,
कलिकाल में भी कोई अपना तो है।
ओ हो हो हो हो…
पर्याय सदा बदलती, आती है जाती है,
ध्रुव ही सच्चा साथी है, ध्रुव ही सच्चा साथी है।
भव दुख से बचने का मार्ग जो दिखाती है,
जिनवाणी कहलाती है, जिनवाणी कहलाती है।
चरणानुयोग बतावे हमको, मुनि श्रावक के आचारों को,
जीव त्रिकाली शुद्ध आत्मा, द्रव्यानुयोग विचारों को।
कलिकाल में भी कोई अपना तो है,
कलिकाल में भी कोई अपना तो है।
ओ हो हो हो हो…
पर्याय सदा पलटती, आती है जाती है,
ध्रुव ही सच्चा साथी है, ध्रुव ही सच्चा साथी है।
भव दुख से बचने का मार्ग जो दिखाती है,
जिनवाणी कहलाती है, जिनवाणी कहलाती है।
ध्रुव ही सच्चा साथी है, ध्रुव ही सच्चा साथी है। ![]()
पाण्डे शीतल कुमार जी जैन , उज्जैन