भारतवर्ष नामकरण का असली आधार क्या है? | Bharatavarsh Namakaran Ka Asali Adhar Kya Hai

भारतवर्ष नामकरण का असली आधार क्या है?

-डॉ. वीरसागर जैन

प्रोफेसर, जैनदर्शन विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली-110016
दूरभाष:- 011-26177207, 9868888607

हमारे देश का नाम ‘भारतवर्ष’ है। ‘भारतवर्ष’ का अर्थ होता है- भरत का क्षेत्र या देश। स्पष्ट है कि हमारे देश का नाम किसी ‘भरत’ नामक महापुरुष के नाम पर रखा गया है इसीलिए ‘भारत’ है। किन्तु विचारणीय है कि ये भरत कौन थे और क्यों इनके नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ रखा गया है। आश्चर्य की बात है कि आज इस सम्बन्ध में भारतवर्ष के ही बहुत लोगों को समीचीन जानकारी नहीं है, जबकि प्रत्येक भारतीय को इसकी समीचीन जानकारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए थी। न केवल जानकारी होनी चाहिए थी, अपितु उन भरत के आदर्शों पर भी सबको चलना चाहिए था।

हमारे देश के इतिहास में तीन भरत अत्यधिक प्रसिद्ध हुए हैं- १. राम का भाई भरत, २. दुष्यन्त-शकुन्तला का पुत्र भरत और ३. ऋषभदेव का पुत्र चक्रवर्ती भरत।

यद्यपि उक्त तीनों ही भरत शूरवीर, पराक्रमी और हमारे देश की जनता को अत्यधिक प्रभावित करने वाले महापुरुष हुये हैं, अतः कुछ लोगों को (कभी-कभी विद्वानों तक को भी) यह भ्रम भ्रम/संशय हो जाता है कि उक्त तीनों में से किस भरत के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारतवर्ष’ रखा गया है। किन्तु स्थिति एकदम साफ है, जिसे हम तीनों भरतों के प्रति आदरभाव रखते हुए भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं। सभी वैदिक एवं जैन पुराणों और इतिहास-ग्रन्थों से भी यह सुतरां सिद्ध होता है कि हमारे देश का नाम ऋषभ-पुत्र ‘भरत’ के ही नाम पर भारतवर्ष रखा गया है। उनसे पहले इस देश को उनके पिता ‘नाभिराय’ के नाम पर ‘नाभिखण्ड’ या ‘अजनाभवर्ष’ कहा जाता था, जैसा कि श्रीमद्भागवत में स्पष्ट कहा गया है-

“अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।" (-श्रीमद्भागवत 5/7/3)

“येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठ श्रेष्ठ गुण आसीत् येनेदं वर्ष भारतमिति व्यपदिशन्ति।” (-श्रीमद्भागवत 5/4/9)

अर्थ- ‘अजनाभवर्ष’ ही आगे चलकर ‘भारतवर्ष’ इस संज्ञा से अभिहित हुआ। श्रेष्ठ गुणों के आश्रय भूत, महायोगी भरत अपने सौ भाइयों में ज्येष्ठ थे, उन्हीं के नाम पर इस देश को ‘भारतवर्ष’ कहते हैं।

इसी प्रकार का अभिप्राय प्रायः सभी जैन एवं वैदिक पुराणग्रन्थों में अनेकशः व्यक्त किया गया है। यहाँ विस्तारभय से उन सबके उद्धरण प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है। जिज्ञासु जन कुन्दकुन्द भारती से प्रकाशित कृति ‘भरत और भारत’ देखें।

सभी जैन एवं वैदिक पुराणों से यह स्पष्ट होने पर भी कि ऋषभ-पुत्र भरत के ही नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा है, कुछ लोग अज्ञानादि वश कभी राम के भाई भरत को और कभी दुष्यन्त-पुत्र भरत को ‘भारत’ नामकरण का आधार बना देते हैं, किन्तु यह सत्य नहीं है। सुप्रसिद्ध विद्वान् डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने भी एक बार दुष्यन्त-पुत्र भरत के नाम पर ‘भारत’ के नामकरण की बात लिखी थी, किन्तु बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी भूल को सुधारते हुए स्पष्ट लिखा कि- “मैंने अपनी ‘भारत की मौलिक एकता’ नामक पुस्तक (पृष्ठ 22-24) में दौष्यन्तिक भरत से भारतवर्ष लिखकर भूल की थी। इसकी ओर मेरा ध्यान कुछ मित्रों ने आकर्षित किया। उसे अब सुधार लेना चाहिए।”

इतना ही नहीं, इसके बाद एक अन्य कृति की भूमिका में भी उन्होंने एक बार पुनः जोर देकर लिखा कि- “स्वायम्भुव मनु के प्रियव्रत, प्रियव्रत के पुत्र नाभि, नाभि के ऋषभ और ऋषभदेव के सौ पुत्र हुए, जिनमें भरत ज्येष्ठ थे। यही नाभि ‘अजनाभ’ भी कहलाते थे जो अत्यन्त प्रतापी थे और जिनके नाम पर यह देश 'अजनाभवर्ष कहलाता था। यही ‘अजनाभखण्ड’ पीछे ‘भरतखण्ड’ कहलाया। नाभि के पौत्र भरत उनसे भी अधिक प्रतापवान चक्रवर्ती थे। यह अत्यन्त मूल्यवान ऐतिहासिक परम्परा किसी प्रकार पुराणों में सुरक्षित रह गई है।” (-भरत और भारत, पृष्ठ 10)

दरअसल, राम के भाई भरत तो कभी स्वयं राजग‌द्दी पर बैठे ही नहीं थे, अतः उनके नाम पर हमारे देश का नाम पड़ना सम्भव नहीं है और दुष्यन्त-पुत्र भरत भी कालिदास के ‘अभिज्ञानकुन्तलम्’ की विश्वव्यापी ख्याति से ही विख्यात हुए हैं जो बहुत परवर्ती हैं, जैसा कि डॉ. प्रेमसागर जैन ने स्पष्ट लिखा है- “राम के भाई भरत कभी राजसिंहासन पर नहीं बैठे, अतः उनके आधार पर इस देश के नामकरण का प्रश्न ही नहीं उठता। कतिपय विद्वानों ने दौष्यन्ति भरत के नाम को मूलाधार स्वीकार किया है। यह स्वाभाविक था। कालिदास के 'शाकुन्तलम् की विश्वव्यापी ख्याति ने दौष्यन्ति भरत को जन-मानस में प्रतिष्ठित कर दिया। उसी को लोग इस देश के ‘भरत’ नाम का मूलमन्त्र मान बैठे।” (भरत और भारत, पृष्ठ 9)

दुष्यन्त-पुत्र भरत के नाम पर ‘भारत’ नामकरण बताने की भूल अनेक विद्वानों से हुई है और अनुकरण-नियम से होती चली जा रही है। किन्तु हमारा प्राचीन साहित्य इस तथ्य का कहीं भी समर्थन नहीं करता, अपितु अत्यन्त स्पष्ट कहता है कि ऋषभ-पुत्र भरत के ही नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारतवर्ष’

पड़ा है। अतः विद्वानों का यह कर्तव्य है कि आज यह भूल सुधारी जाए और सत्य सभी के सामने प्रस्तुत किया जाए।

अब ज्ञातव्य है कि इन ऋषभ-पुत्र भरत का जीवनवृत्त एवं व्यक्तित्व कैसा था और क्यों इनके नाम पर हमारे देश का नामकरण किया गया है। ऋषभ-पुत्र भरत के सम्बन्ध में हम इतना तो उक्त उद्धरणों से जान ही चुके हैं कि इस पवित्र भारतभूमि पर जो पहले हिमवत् प्रदेश कहलाती थी, बाद में ‘नाभिखण्ड’ या ‘अजनाभवर्ष’ कहलाती थी और आज ‘भारतवर्ष’ कहलाती है, असंख्य वर्ष पूर्व एक महान् प्रतापी राजा नाभिराय हुए जिन्हें अन्तिम मनु या कुलकर भी कहा जाता था। उनकी महारानी का नाम मरुदेवी था। उनके एक ‘वृषभ’ या ‘ऋषभ’ नाम का पुत्र हुआ जिसकी चर्चा वेदों और पुराणों में भी विपुलता से विष्णु के अवतार मानकर की गई है। ये ही ऋषभदेव आगे चलकर सम्पूर्ण राज्य का त्याग कर मुनि हो गए और इस युग में जैनधर्म के प्रथम तीर्थकर के रूप में प्रसिद्ध हुए।

गृहस्थावस्था में इनकी दो पत्नियाँ थीं- नन्दा और सुनन्दा। इन दोनों के कुल 101 पुत्र और ब्राह्मी व सुन्दरी नामक दो पुत्रियाँ हुई। पुत्रों में भरत और बाहुबली विशेष विख्यात हुए। भरत और बाहुबली में भी भरत ज्येष्ठ थे और ऋषभदेव के बाद उन्हें ही राजा बनाया गया था। ये ही भरत आगे चलकर सम्पूर्ण षट्खण्ड वसुधा पर विजय प्राप्त कर चक्रवर्ती भरत कहलाए और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारतवर्ष’ रखा गया।

ऋषभदेव का चरित्र तो वेदों और सभी हिन्दू-जैन पुराणों में भी विस्तारपूर्वक मिल जाता है, किन्तु इन चक्रवर्ती भरत का विस्तृत जीवन-परिचय जानने के लिए हमें महाकवि रत्नाकर कृत भरतेश वैभव, आचार्य जिनसेन कृत महापुराण आदि जैन ग्रन्थों का अवलोकन करना आवश्यक है। इन ग्रन्थों में वर्णित भरत-चरित्र के अनुसार ये ऋषभ-पुत्र भरत इस सम्पूर्ण वसुधा के एकच्छत्र सम्राट थे और ‘चक्रवर्ती’ कहलाते थे। इनके पास अपरम्पार सम्पदा थी जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। किन्तु इनके व्यक्तित्व की सबसे खास विशेषता यह थी कि वे उस अपरम्पार वैभव-सम्पदा के बीच भी सदैव जल में कमल की भाँति निर्लिप्त और अपने आत्मिक आनन्द में ही निमग्न रहते थे। जीवन में आने वाले संयोग-वियोग, जीवन-मरण, सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि सर्वविध प्रसंगों में हर्ष-विषाद से रहित समताभाव धारण किए रहते थे। ज्ञान-वैराग्य और आध्यात्मिक दृष्टि के कारण जीवन का कोई भी प्रसंग उनके अन्तस्तल को व्यग्र या आन्दोलित नहीं कर पाता था। वे सदैव स्वयं को सर्व शरीरादि भावों से भिन्न चैतन्यमय आत्मतत्त्व अनुभव करते थे।

हम समझते हैं कि भरत चक्रवर्ती के इसी महान् गुण के कारण हमारे प्रबुद्ध पूर्वजों ने हमारे देश का नाम उनके नाम पर ‘भारत’ रखा है। वे हमें इस माध्यम से आध्यात्मिक जीवन-यापन का महान् सन्देश देना चाहते थे। भरत चक्रवर्ती के ज्ञान-वैराग्यमय आध्यात्मिक जीवन का चित्रण करने वाला एक लोकगीत इस सन्दर्भ में ध्यानपूर्वक पठनीय है-

“भरत जी घर ही में वैरागी, वे तो अन-धन सबके त्यागी।
कोड अठारह तुरंग हैं जाके, कोड चौरासी सागी।
लाख चौरासी गजरथ सोहैं, तो भी भए नहीं रागी।।
तीन कोड दो हलधर सोहैं, एक कोड हल साजे।
नव निधि रतन चौदह घर जाके, मन वांछा सब भागी।।
चार कोड मण नाज उठे नित, लोण लाख दश लागे।
कोड थाल कंचन मणि सोहे, नांहि भया कोई रागी।।
ज्यों जल बीच कमल अन्तःपुर, नांहि भये वे रागी।
भवि जन होय सोई उर धारो, सोई पुरुष बड़भागी।।”

यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है कि ऋषभदेव तो भरत से भी बहुत महान् थे, उनके पिता भी थे और तीर्थकर भी थे, फिर उनके नाम पर हमारे देश का नाम क्यों नहीं रखा ? भरत के ही नाम पर क्यों रखा ?

उत्तर:- हमारे पूर्वज अध्यात्मिक जीवन-यापन का सन्देश अत्यधिक व्यावहारिक रूप में ही देना चाहते थे, ताकि जनसामान्य भी उस पर आसानी से चल सके। इसके लिए भरत ही अधिक उपयुक्त थे, ऋषभदेव नहीं। ऋषभदेव तो बहुत महान् थे, तीर्थंकर थे, अतः कोई भी कह सकता था कि उनकी क्या बात, हम उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं, किन्तु भरत एक साधारण गृहस्थ थे, हम-आप-जैसे बहुत काम-धन्धों में उलझे हुए एक सामान्य श्रावक ही थे, कोई मुनि नहीं, मुनि तो वे बहुत बाद में बने थे। दूसरी बात- ऋषभदेव मात्र अयोध्या के राजा थे, सम्पूर्ण भरतखण्ड के नहीं। भरत ही सम्पूर्ण भरतखण्ड के विजेता थे। इतने अधिक वैभव के बीच भी आध्यात्मिक जीवन-यापन किया जा सकता है- यह सन्देश भरत के ही जीवन से अधिक प्रभावी रूप में अभिव्यक्त होता है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने हमारे देश का नाम ऋषभदेव के भी नाम पर न रखकर भरत के ही नाम पर रखना अधिक उचित समझा।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘भारत’ नाम में ही आध्यात्मिकता भरी हुई है और इसीलिए प्रत्येक भारतीय का यह परम कर्तव्य है कि वह अध्यात्मविद्या अवश्य प्राप्त करे, अन्यथा उसे सही अर्थों में ‘भारतीय’ कहना सम्भव नहीं होगा। इस विषय का विस्तार पढ़ने के लिए मेरी पुस्तक ‘भारतीय दर्शन में आत्मा एवं परमात्मा’ देखिए |