श्री भरत भगवान का अर्घ्य
हे नाथ अर्घ्य कितने ही, अब तक मैंने हैं चढ़ाए।
पदवी अनर्घ्य पाने को, अब मन मेरा ललचाए।
अहो! भरत जिनेश्वर तुमने, वैराग्य भाव उर धारा।
क्षण में चक्री पद छोड़ा, निज आतम रूप निहारा।
निज थिरता से प्रभु तुमने,आनंद अतीन्द्रिय पाया।
अन्तर्मुहूर्त में ही प्रभु , फिर केवल ज्ञान उपाया ।
प्रभु चक्र रत्न को तजकर, था धर्म चक्र प्रकटाया।
फिर सिद्धचक्र में जाकर, भव चक्र आप विनशाया।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।
ॐ ह्रीं श्री भरत जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।