भक्ति की शक्ति
-प्रो. (डॉ.) वीरसागर जैन
जिनेन्द्रदेव की भक्ति में बड़ी शक्ति है, क्योंकि वह उभयलोक सुखकारी है, उससे लौकिक और पारमार्थिक वेनों प्रकार के सर्व प्रयोजन सिद्ध होते हैं। यद्यपि जिनेन्द्रभक्ति का उत्तम प्रयोजन पारमार्थिक या आध्यात्मिक लाभ ही है, परन्तु यह भी सत्य है कि उससे केवल पारमार्थिक लाभ ही नहीं होता, अपितु लौकिक लाभ भी अवश्य होता ही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। सभी आचार्यों ने इस बात को अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में लिखा है। आचार्य वीरसे स्वामी ‘धवला’ में लिखते हैं-
“विघ्नाः प्रणश्यन्ति भयं न जातु न दुष्टदेवाः परिलंघयंति ।
अर्थान् यथेष्टांश्च सदा लभन्ते जिनोत्तमानां परिकीर्तनेन ॥”
-(धवला, 1/1/1/21)
अर्थात् जिनेन्द्रदेव के परिकीर्तन से सर्व विघ्न नष्ट हो जाते हैं, किसी प्रकार का भय नहीं सताता, दुष्टदेव पीड़ित नहीं करते और सदा यथेष्ट अर्थों की प्राप्ति होती है।
आचार्य विद्यानन्द स्वामी ‘आप्तपरीक्षा’ में लिखते हैं-
‘श्रेयोमार्गस्य संसिद्धिः प्रसादात् परमेष्ठिनः।’ -(आप्तपरीक्षा, 2)
अर्थात् पंचपरमेष्ठी के प्रसाद से पर और अपर के भेद से जो दो प्रकार का है- ऐसे श्रेयोमार्ग की सम्यक् सिद्धि होती है। परनिश्रेयस का अर्थ है मोक्ष और अपरनिश्रेयस का अर्थ है स्वर्ग (लौकिक अभ्युदय)।
ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ ‘मोक्षमार्ग’ की बजाय ‘श्रेयोमार्ग’ शब्द का प्रयोग ही इसलिए किया है कि उसके द्वारा आचार्यदेव जिनेन्द्रभक्ति की उभयलोक-हितकारिता को दिखाना चाहते हैं।
मंगलाचरण के रूप में पढ़े जाने वाले इस सुप्रसिद्ध श्लोक में भी यही कहा है-
‘ओंकारं बिंदुसंयुक्तं, नित्यं ध्यायंति योगिनः।
कामदं मोक्षदं देवमोंकाराय नमो नमः॥’
-(आचार्य दुर्गसिंह, कातंत्र टीका, पृ. 9)
अर्थात् ओंकार के ध्यान से काम और मोक्ष दोनों की सिद्धि होती है।
हिन्दी कवियों ने भी इस बात को सैकड़ों बार कहा है। यथा-
‘भुक्ति मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराज वर।’
अथवा-
‘धर्म करत संसार सुख, धर्म करत निर्वाण।’
कविवर द्यानतरायजी ने ‘दर्शन-दशक’ के प्रथम छन्द में कहा है-
देखे श्रीजिनराज आज सब विघन विलाये,
देखे श्रीजिनराज आज सब मंगल छाये ।
देखे श्रीजिनराज काज कछु करना नांहि ,
देखे श्रीजिनराज होंस पूरी मन मांहि ।
तुम देखे जिनराज अब, भवजल अंजुलि सम भया।
चिंतामणि पारस कल्पतरु, मोह सबनि सों उठि गया॥
अर्थात् जिनेन्द्रदेव की भक्ति से सर्वविघ्नों का नाश होता है, और सर्वमंगलों की प्राप्ति होती है। भक्तके सर्वकार्य सम्पन्न हो जाते हैं, उसकी सर्व इच्छा पूर्ण हो जाती है, वह कृतकृत्य हो जाता है, उसे चिंतामणि, पारस, कल्पवृक्ष की भी आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि भक्ति से सर्व लाभ प्राप्त होता है, संसार-सागर ही छोटा-सा रह जाता है।
यहाँ कवि ने बड़ी कुशलता से पारमार्थिक और लौकिक दोनों प्रकार के लाभ का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत किया है।
इसीप्रकार के और भी अनेकानेक उद्धरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि जिनेन्द्रदेव की भक्ति में महान् शक्ति है और उससे दोनों प्रकार के प्रयोजनों की सिद्धि होती है।
यही कारण है कि पहले कोई भी प्राणी किसी भी प्रकार के दुःख से कितना ही अधिक दुःखी होकर मुनिराजों/आचार्यों के पास आता था तो वे उसे वैद्य, वकील, पुलिस आदि के पास न भेजकर केवल एक जिनेन्द्रदेव की भक्ति करने का उपदेश देते थे और उसी से उसके सर्व दुःख दूर हो जाते थे।
कैसे हो जाते थे- यह एक अलग विषय है, क्योंकि जिनेन्द्रदेव तो पूर्ण वीतराग हैं, परन्तु होते अवश्य थेइसमें सन्देह नहीं, क्योंकि इसके हजारों प्रमाण शास्त्रों में भरे पड़े हैं। यह एक बहुत बड़ा विज्ञान था जिसे हम आज भूल चुके हैं। आवश्यकता है उसे सावधानीपूर्वक समझने की।
आचार्यकल्प पं. टोडरमलजी ने इस प्रश्न का उत्तर स्वयं ही प्रश्न उठाकर इस प्रकार दिया है-
"इहां कोऊ कहै कि इनिकरि ऐसे (वीतराग-विज्ञानरूप) प्रयोजनकी तौ सिद्धि ऐसें हो है परन्तु जाकरि इंद्रियजनित सुख उपजै दुःख विनशे ऐसे भी प्रयोजनकी सिद्धि इनिकरि हो है कि नाहीं।
ताका समाधान-जो अरहंतादिविषै स्तवनादिरूप विशुद्ध परिणाम हो है ताकरि अघातिया कर्मनिकी साता आदि पुण्यप्रकृतिनिका बंध हो है। बहुरि जो वह परिणाम तीव्र होय तौ पूर्वे असाताआदि पापप्रकृति बँधी थीं तिनिकों भी मंद करै है अथवा नष्टकरि पुण्यप्रकृतिरूप परिणमावै है। बहुरि तिस पुण्यका उदय होतें स्वयमेव इन्द्रियसुखकों कारणभूत सामग्री मिलै है। अर पापका उदय दूर होतें स्वयमेव दुःखकों कारणभूत सामग्री दूर हो है। ऐसें इस प्रयोजन की भी सिद्धि तिनकरि हो है। अथवा जिनशासनके भक्त देवादिक हैं ते तिस भक्तपुरुषकै अनेक इन्द्रिय-सुखकों कारणभूत सामग्रीनिका संयोग करावै हैं, दुःखकों कारणभूत सामग्रीनिकों दूरि करें हैं। ऐसें भी इस प्रयोजनकी सिद्धि तिनि अरहंतादिकनिकरि हो है।"
-(मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृ. 10)
इसप्रकार पं. टोडरमलजी ने अरिहन्तादि की भक्ति-स्तुति से लौकिक प्रयोजन की सिद्धि होने के तीन कारण बताए हैं-
- पुण्य प्रकृतियों का बन्ध-उदय।
- पूर्वबद्ध पाप प्रकृतियों का पुण्यप्रकृति रूप परिणमन।
- जिनशासन के भक्त देवादि द्वारा सहायता।
इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं। जैसे एक कारण कुछ ऐसा भी होता है कि-
जिसप्रकार अधिक मिर्च डल जाने से दाल बहुत तीखी हो जाए, खाई ना जा सके तो अब मिर्च तो उसमें से अलग की नहीं जा सकती है, किन्तु यदि उसमें थोड़ा गुड़ मिला दिया जाए तो वह तीखी लगना बन्द हो जाती है और आसानी से खाने योग्य बन जाती है। उसी प्रकार जिनेन्द्रदेव की भक्तिरूप धर्मध्यान से असह्य दुःख-संकट भी आसानी से सहन करने योग्य बन जाते हैं।
इसी प्रकार के और भी अनेक कारण हो सकते हैं, जो अत्यन्त सूक्ष्म होने से हमारी समझ में नहीं आ सकते, परन्तु आगमाधार से इतना सुस्पष्ट है कि जिनेन्द्रदेव की भक्ति से लौकिक और पारमार्थिक दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होते ही हैं।
जिनेन्द्र-भक्ति की उभयलोक-हितकारिता को जिनवाणी में किसान आदि के उदाहरणों द्वारा भली-भाँति स्पष्ट किया गया है। यथा-
किसान तो धान के लिए खेती करता है, भूसे के लिए नहीं, परन्तु धान के साथ भूसा भी स्वयमेव उसे मिलता ही है, उसी प्रकार ज्ञानीजन तो जिनेन्द्रदेव की भक्ति पारमार्थिक लाभ के लिए करते हैं, लौकिक लाभ के लिए नहीं किन्तु उससे उन्हें पारमार्थिक लाभ के साथ लौकिक लाभ भी स्वयमेव होते ही हैं।
तथा जैसे कोई अज्ञानी किसान केवल भूसे के लिए ही खेती करे तो उसे धान तो मिलेगा नहीं, भूसा भी उतना अधिक और वैसा उत्तम नहीं मिल पाएगा, उसी प्रकार लौकिक लाभ के लिए ही जिनेन्द्रभक्ति करने वाले को लौकिक लाभ भी वैसा नहीं होता, जैसा पारमार्थिक लाभ के लिए भक्ति करने वाले को होता है। इसीलिए पं. टोडरमलजी ने लौकिक लाभ के लिए भक्ति करने का निषेध किया है। यथा-
“बहुरि इस (लौकिक) प्रयोजनके अर्थि अरहंतादिककी भक्ति किएं तीव्र-कषाय होनेकरि पापबन्ध ही हो है तातें आपकों इस प्रयोजनका अर्थी होना योग्य नाहीं। जातें अरहंतादिककी भक्ति करतें ऐसे प्रयोजन तौ स्वयमेव ही सधै हैं।”
आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने इस बात को इस प्रकार कहा है- -(मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृ. 11)
इतश्चिन्तामणिर्दिव्यः इतः पिण्याकखण्डकम् ।
ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वाद्रियन्तां विवेकिनः॥
-(इष्टोपदेश, 20)
अर्थात् एक तरफ दिव्य चिंतामणि है और दूसरी तरफ खली का टुकड़ा। धर्मध्यान से जब यह दोनों ही प्राप्त होते हैं, तो बताओ ज्ञानी किसे चाहेगा?
अर्थात् पारमार्थिक लाभ ही दिव्य चिन्तामणि के समान है और विवेकी जीव उसी को चाहते हैं; किन्तु लौकिक लाभ भी, तुच्छ होते हुए भी, भक्तों को प्राप्त होते ही हैं और जब तक मोक्ष प्राप्त न हो तब तक वे प्राप्त होते ही रहेंगे। अनादिकाल से आज तक प्राणी जिनेन्द्रदेव की भक्ति के सहारे ही अपने दुःख-संतापों को शान्त करते आये हैं। धर्म उन्हें तत्काल फल देता है इसीलिए प्रिय है। उधार वाला धर्म किसी को प्रिय नहीं हो सकता। जिनेन्द्रभक्ति जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर हमें एक बार पुनः गहराई से चिन्तन करना चाहिए।
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