भक्तामरस्तोत्र : एक नया चिन्तन | Bhaktamarastotr Ek Naya Chintan

भक्तामरस्तोत्र : एक नया चिन्तन

-प्रो. वीरसागर जैन

कहते हैं कि राजा भोज ने आचार्य मानतुंग स्वामी को 48 तालों में कैद कर दिया था और मानतुंग स्वामी ने भक्तामरस्तोत्र की रचना कर उन 48 तालों को तोड़ गिराया था । आइये, आज हम इसका सही अर्थ समझते हैं । प्रायः लोग इसका सही अर्थ नहीं समझते हैं और इसे सीधे-सीधे ऐसा ही समझ लेते हैं कि राजा भोज ने आचार्य मानतुंग स्वामी को 48 तालों में कैद कर दिया होगा और मानतुंग स्वामी ने भक्तामरस्तोत्र की रचना करके जादू की तरह उन 48 तालों को तोड़ गिराया होगा । लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है । यह एक लाक्षणिक प्रयोग है, साहित्यिक प्रयोग है । वैसा ही, जैसा कि प्रायः सभी चमत्कारों के सन्दर्भ में सिद्ध होता है । अन्य चमत्कारों की चर्चा हम फिर कभी करेंगे, अभी फ़िलहाल भक्तामरस्तोत्र की घटना को समझते हैं ।

भक्तामरस्तोत्र का रचनाकाल (विक्रम की सातवीं शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक जो भी हो) भारतवर्ष में दर्शनशास्त्र का स्वर्णयुग था । उस समय दर्शनशास्त्र अपनी सर्वोच्च स्थिति में था । उस युग में सभी सम्प्रदायों में एक से बढकर एक दार्शनिक उत्पन्न हो रहे थे । वे तर्क की प्रतिष्ठा को बहुत बढ़ा रहे थे । न्यायशास्त्र बहुत अधिक विकसित हो रहा था । चारों ओर खूब शास्त्रार्थ हो रहे थे । सर्वत्र बौद्धिकता का साम्राज्य स्थापित हो रहा था । छोटे-छोटे मतभेदों के कारण नये-नये सम्प्रदाय-उपसम्प्रदाय जन्म ले रहे थे । तत्त्वनिरूपण में अनेकानेक वाद स्थापित हो रहे थे- द्वैतवाद, अद्वैतवाद, नित्यवाद, क्षणिकवाद, भाववाद, अभाववाद, सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद, अनात्मवाद, शून्यवाद, उच्छेदवाद, ब्रह्मवाद, मायावाद आदि । पुनश्च, इनमें भी एक-एक में से अनेक शाखाएँ विकसित हो रही थीं । जैसे कि अद्वैतवाद में भी अनेक प्रकार के अद्वैत बन गये थे - विशिष्टाद्वैत, शब्दाद्वैत, विज्ञानाद्वैत, चित्राद्वैत आदि ।

ऐसी स्थिति में सामान्य व्यक्ति, अल्पबुद्धि जनता बहुत असमंजस में पड़ गई । बहुत तर्क करना उसके वश का नहीं था । कौन विद्वान् सत्य है और कौन असत्य, यह निर्णय करने की भी उसमें क्षमता नहीं थी । वह धर्म के लिए क्या करे, किसकी माने, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।

प्रतीत होता है कि ऐसी स्थिति में राजा भोज ने सभी दार्शनिकों को अपने दरबार में आमंत्रित किया होगा और समुचित निष्कर्ष प्रस्तुत करने को कहा होगा, किन्तु वहाँ भी वे सब दार्शनिक विविध तर्कों द्वारा अपने-अपने वाद को ही सत्य और अन्य के वाद को असत्य सिद्ध कर रहे होंगे ।

बहुत अधिक प्रयास करने पर भी राजा भोज की विश्वविख्यात विद्वत्सभा में भी उनका कोई समाधान नहीं निकल पा रहा होगा । अन्त में राजा भोज ने आचार्य मानतुंग को बुलाकर उनको ही यह गुरुतर दायित्व सौंपा होगा, कहा होगा कि अब आपको ही इन 48 मत-मतान्तरों की उलझन को सुलझाना है ।

ऐसी स्थिति में आचार्य मानतुंग स्वामी अपना आहार-विहार आदि छोड़कर वहीं जमकर बैठ गये होंगे और हो सकता है कि इसमें उन्हें अनेक दिन लग गये हों । आखिरकार उन्होंने भक्तामरस्तोत्र की रचना की ।

भक्तामरस्तोत्र को भलीभांति सुनने-समझने के बाद वहाँ उपस्थित सभी 48 तरह के दार्शनिकों ने कहा होगा कि यह तो एकदम सीधी-सच्ची मूलभूत बात है, इसमें हमको क्या आपत्ति हो सकती है ? कोई आपत्ति नहीं है, यह हमें स्वीकार्य है | और सभी ने उसको सहर्ष स्वीकार कर लिया होगा |

बस, इसी बात को जनता ने कहा होगा कि देखो राजा भोज ने मानतुंग स्वामी को 48 तालों में कैद कर दिया था और उन्होंने भक्तामरस्तोत्र की रचना करके उन 48 तालों को तोड़ गिराया |

48 की संख्या को यहाँ हम मुहावरा भी समझ सकते हैं | वैसे ही जैसे कि आजकल 36 का चलता है | कहते हैं कि 36 मत हो रहे हैं। हो सकता है कि इसी बात को उस काल में 48 की संख्या से कहा जाता हो |

अब यहाँ यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि भक्तामरस्तोत्र में ऐसी क्या बात कही गई है कि जिसे सभी दार्शनिकों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया |

दरअसल, जब मानतुंग स्वामी ने सभी दार्शनिकों का पक्ष (वाद-विवाद) सुना तो वे बड़ी करुणा से भर गये | वे बहुत ही गहरे चिन्तन में डूब गये | सोचने लगे कि अहो, सामान्य लोगों ने तो धर्म को आडम्बरों में छुपा ही रखा है, बड़े-बड़े विद्वानों ने भी उसे वाद-विवाद की भूलभुलैया में उलझा रखा है | कितने आश्चर्य की बात है कि जो दर्शनशास्त्र/न्यायशास्त्र सुलझाने के लिए बना है, लोग उसी से उलझने-उलझाने का कार्य भी कर रहे हैं। जो धर्म सर्व आकुलताओं (दुखों) को दूर करने के लिए बना है, लोग उसी से स्वयं को और पर को आकुलता उत्पन्न कर रहे हैं | धर्म तो सदा निराकुल/आनन्दित रहने का नाम है, समस्त कषायों से दूर रहने का नाम है, आत्मा की शुद्धि का नाम है | धर्म तो बहुत ही सीधा-सच्चा, सरल-सुबोध, सत्य-सनातन एवं अत्यंत संक्षिप्त है | उसमें वाद-विवाद की कोई आवश्यकता ही नहीं है | वह तो सर्वहितकर एवं सर्वस्वीकार्य ही होता है |

और उन्होंने एक ऐसी विधि से भक्तामरस्तोत्र की रचना की, जिसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती | भक्तामरस्तोत्र में उन्होंने व्यक्ति, जाति, लिंग, वर्ण आदि सभी सीमाओं से पार उस अनन्त अचिन्त्य अव्यय परमात्मा की आराधना प्रस्तुत की जिसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश्वर, योगीश्वर, पुरुषोत्तम, बुद्ध, जिनेन्द्र आदि हजारों नामों से पुकारा जा सकता है | उनके अनुसार नाम में कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु होना वह ‘ज्ञानस्वरूपममलं’ अर्थात् वीतराग-सर्वज्ञ (ज्ञानस्वरूप सर्वज्ञ, अमल=वीतराग) होना चाहिए | वह कथमपि रागद्वेषादि से सहित नहीं हो सकता | इस सम्बन्ध में छन्द 24 पठनीय है-

“त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं, ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनंगकेतुम् ।
योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं, ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ||"

आचार्य मानतुंग स्वामी के अनुसार जो जीव एक बार ऐसे वीतराग-सर्वज्ञ देव को देख लेता है, जान लेता है, वह कभी भी रागद्वेषादि सहित देवों के प्रति आकर्षित नहीं हो सकता | क्या कोई व्यक्ति क्षीरसागर का अमृत पीने के बाद क्षार समुद्र का जल पिएगा ? कभी नहीं | क्या कभी काच का टुकड़ा मणि की बराबरी कर सकता है ? कभी नहीं | (देखें छन्दसंख्या 11 एवं 20 )

आचार्य मानतुंग स्वामी के अनुसार ऐसा परमात्मा ही सच्चा सूर्य है, सच्चा चन्द्र है, सच्चा दीपक है, क्योंकि वह बिना किसी बाधा/सहायता के सर्व लोक को प्रकाशित करता है | उस परमात्मा के समक्ष बाहरी सूर्य, चन्द्र, दीप आदि का कोई महत्त्व नहीं है | बस एक यह परमात्मा ही हमें भवसमुद्र से पार उतारने में समर्थ है | यही एक सच्चा आलम्बन है- ‘आलम्बनं भवजले पततां जनानाम्’ |

आचार्य मानतुंग स्वामी के अनुसार ऐसे परमात्मा का भक्त अत्यंत निःशंक निर्भय भी हो जाता है | उसे अत्यंत विषम परिस्थिति में भी किंचित् भी कोई कष्ट नहीं होता, चाहे आग हो या नाग, चाहे हस्ति हो सिंह, चाहे युद्ध हो या भयंकर रोग | वह तो सदा प्रसन्न ही रहता है | सारे भय ही बल्कि स्वयं भयभीत होकर उससे दूर भाग जाते हैं ।

आचार्य मानतुंग स्वामी के अनुसार ऐसे वीतराग-सर्वज्ञ परमात्मा का भक्त अन्त में स्वयं भी मृत्यु को जीतकर स्वाधीन सर्वोच्च लक्ष्मी की प्राप्ति कर लेता है, अनन्तानन्त काल के लिए स्वयं भी ‘ज्ञानस्वरूपममलं’ बन जाता है | (त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्युं/ तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किंवा/ तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः)

इसप्रकार हम देखते हैं कि भक्तामरस्तोत्र में कोई बड़ी-बड़ी दार्शनिक बातें नहीं की गई हैं, जैसी कि पूर्व के अन्य देवागमादि स्तोत्रों में होती आई है, अपितु एकदम बुनियादी मूलभूत तत्त्व की सीधी-सादी काम की बात की गई है | भक्तामरस्तोत्र ने अपने पाठक को न तो किसी बाह्य आडम्बर में उलझाया है और न ही दर्शनशास्त्र के तर्क-वितर्क में, अपितु उसे एक ही संक्षिप्त एवं सारगर्भित (short and sweet) सन्देश दिया है कि येन केन प्रकारेण राग-द्वेषादि विकारों से ऊपर उठकर वीतरागता की आराधना करो | यही धर्म है, यही धर्म का मर्म है ।

इसप्रकार भक्तामरस्तोत्र का सन्देश बहुत ही महत्त्वपूर्ण, संक्षिप्त एवं सारगर्भित है | भक्तामरस्तोत्र की यह घटना हम सबको भी यह महत्त्वपूर्ण सन्देश देती है कि हमें धर्म के नाम पर चलने वाले दुनिया भर के आडम्बरों और व्यर्थ के अप्रयोजनभूत वाद-विवादों से ऊपर उठकर मूलभूत तत्त्व पर ध्यान देना चाहिए | मूलभूत तत्त्व व्यक्ति, जाति, लिंग, भाषा, वेश, देश आदि सबसे ऊपर बहुत सीधा-सच्चा सरल-सुबोध एवं अत्यंत संक्षिप्त है | शेष सब अभिव्यक्ति के खेल मात्र हैं, हमें उनमें नहीं उलझना चाहिए अथवा स्याद्वाद से उनका समाधान कर लेना चाहिए |

सहज सरल जीवन की पोथी,
बड़ा कठिन अनुवाद हो गया |
पद पद के लघु विश्रामों पर,
कैसा घोर विवाद हो गया ||