भक्तामर स्तोत्र का मूल सन्देश
-प्रो. वीरसागर जैन
भक्तामर स्तोत्र में वैसे तो बहुत भाव भरे हुए हैं, हर श्लोक में ही कुछ-न-कुछ विशेष बात कही गई है, परन्तु यदि कोई व्यक्ति उस सबको न भी समझे और केवल उसके मूल सन्देश को ही ठीक से समझ ले तो वह अवश्य ही ज्ञानी, धर्मात्मा, सम्यग्दृष्टि बन सकता है | प्रतीत होता है कि हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने हमें इसीलिए भक्तामर स्तोत्र के नित्य पाठ की प्रेरणा दी है कि हम इसके मूल सन्देश को ठीक से समझें और उसे सदैव स्मरण में रखें, कभी भूलें-भटकें नहीं, किन्तु खेद है कि नित्य पाठ करते हुए भी अधिकांश लोगों का ध्यान इस मूल सन्देश की ओर नहीं जाता है और वे इसका उत्तम लाभ प्राप्त नहीं कर पाते हैं, अतः यहाँ उसे ही संक्षेप में लिखने का एक लघु प्रयास किया जाता है | भक्तामर स्तोत्र का वह मूल सन्देश इस प्रकार है-
- स्तुत्य/आराध्य के नाम पर विवाद मत करो, नाम में कुछ नहीं रखा, उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुगत, जिन अदि असंख्य नामों से कहा जा सकता है, अतः नाम की बजाय उसके स्वरूप का निर्णय करो |
- उसका स्वरूप भी, कैसे भी कहो, पर इतना सुनिश्चित है कि वह राग-द्वेष-अज्ञानरूप नहीं है, वीतराग-सर्वज्ञस्वरूप ही है | ( ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः )
- उसकी भक्ति-स्तुति का मुख्य प्रयोजन भी राग-द्वेष-अज्ञानरूप विकारी भावों से मुक्त होना ही है, अन्य कुछ नहीं | दूसरे शब्दों में कहा जाए तो स्वयं भी आराध्य के समान बन जाना (तुल्याः भवन्ति भवतो ननु तेन किंवा), मृत्युंजयी बनना (त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्युं), स्वाधीन लक्ष्मी की प्राप्ति होना (तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः ) ही भक्ति-स्तुति का मुख्य प्रयोजन है |
- सच्चा भक्त भगवान् से कोई सांसारिक आशा नहीं रखता | भगवान् भी कुछ देते-लेते नहीं | यह बात अलग है कि उसकी निष्काम भक्ति के प्रभाव से उसे सहज ही अनेक लौकिक लाभ भी स्वयमेव प्राप्त होते हैं और उसीप्रकार दुनिया के सारे भय भी स्वयमेव भयभीत होकर उससे दूर भाग जाते हैं |
- भगवान् की सच्ची/प्रभावशाली स्तुति तभी की जा सकती है जब हृदय में भक्ति भरी हो | ( त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् )
- तत्त्व/सत्य/ब्रह्म को किसी पन्थ, सम्प्रदाय आदि के दायरे में मत बांधो | वह आकाश के समान अत्यंत उदार है | उसे वाणी से कहा भी नहीं जा सकता, सुरगुरु भी नहीं कह सकते, वह तो अचिन्त्य-अवाच्य है, उसे कहने की सारी कोशिश ऐसी है जैसे कोई बालक जलप्रतिबिम्ब को चन्द्रमा समझकर पकड़ने की कोशिश करता है | फिर भी यदि कभी कोई उसके विषय में कुछ कहे तो समझो कि वह उसका एक ही पक्ष है, इसलिए उसमें आग्रह करके विवाद मत करो | विवाद निरर्थक व अनर्थक है |
- अप्रयोजनभूत विषयों में अधिक मत उलझो, मूल मुद्दे की बात करो | जिससे मुक्ति प्राप्त हो, जन्म-मरण का अभाव हो, दुःख मिटे, उत्तम सुख प्राप्त हो, उसी बात पर पूरा ध्यान दो |
- स्वयं को ज्ञानी समझने की भूल न करो | अल्पज्ञ हो, सर्वज्ञ नहीं | साधक हो, सिद्ध नहीं | सारी बातें आज ही समझ में नहीं आएंगी, धैर्य रखो | (अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम..)