शत इन्द्रनि के मुकुट जु नये, पाप विनाशक जग के भये
ऐसे चरण ऋषभ के नाय, जो भवसागर तिरन सहाय॥१॥
तत्त्व ज्ञान से जो थुति भरी, बुद्धि चतुर सुरपति सो करी
ते पद सब जन के मन हरें, सो थुती हम उस जिन की करें॥२॥
ज्यों नभ में शशि को लख बाल, पकड़न चाहें होय खुश्याल
त्यों मैं थुति वरणों मति हीन, जिसमें गणधर थके प्रवीण॥३॥
हे गुण निधि तुम गुण शशि कान्त, कहि न सके ऋषि सुर लौकांत
प्रलय पवन उद्धत दधि नीर, तर सकता को भुजबल वीर॥४॥
मै मति हीन रंच नहीं डरों, भक्ति भाव वश तुम थुति करों
तुमहिं कहो जिन निज सुत काज, मृग न लड़ें मृगपति से गाज॥५॥
अल्प शास्त्र का ज्ञात जान, हँसी करेंगें बहु श्रुतवान
पर मो बुद्धि करे वाचाल, कोयल को ज्यों मधु ऋतु काल॥६॥
यह थुति अल्प रचित भगवान्, तुम प्रसाद हो निपुण सामान
ज्यों जल कमल पत्र पे परे, मोती वत् सो शोभा धरे॥७॥
तुम थुति गावत ही क्षण माहि -जन्म जन्म के पाप नशाहिं
ज्यों दिनकर के उदय वशात, अंधकार तत्काल नशात॥८॥
तुम निर्दोष रहो थुति दुर, कथा मात्र से ही अधचूर
ज्यों रवि दूर किरण के जोर, कमल प्रफुल्लित सरवर ओर॥९॥
क्या अचरज जो तुम सम बनें, कारण निश दिन तुम गुण भनें
ज्यों निरधन धनपति को पाय, धनी होए तो कहे बड़ाय॥१०॥
शांति रूप तुम मूरत धनी, क्या अद्भुभूत परमाणु बनी
वे परमाणु रहे ना शेष, इससे तुम सम दुतिय ना भेष॥११॥
तुम मुख उपमा सब जग वरे,सुर नर नाग नयन मन हरे
तुम सम उपमा चन्द न रखे, वह दोषी दिन फीका दिखे॥१२॥
सब शशि मंडल मे शशि कला,त्यों तुम गुण सब जग मे फला
जो ऐसे के आश्रित होय, उस विचरत को रोके कोय॥१३॥
देवांगना न मन को हरें, क्या अचरज हम इसमें करें
प्रलय पवन से अचला चले, किन्तु मेरु गिरी रंच न हिलें॥१४॥
तेल न बत्ती धुआं न पास, जगमग जगमग जगत् प्रकाश
प्रलय पवन से बुझे न खंड, ज्ञान दीप तुम जले अखंड॥१५॥
राहू ग्रसे न हो तू अस्त, युगपत भाषे जगत् समस्त
तुझ प्रभाव नहीं बद्दल छिपे, तू रवि से अधिकारी दिपे॥१६॥
ताप विनाशक तू नित दिपे, राहू ग्रसे न बद्दल छिपे
तुम मुख सुन्दर ज्योति अमंद, शांति विकासी अद्भूत चंद॥१७॥
क्या दिन रवि क्या निश शशि होय, जब तेरा मुख जग तम खोय
जब पक जाय धान्य सब ठाम, फिर घनघोर घटा बे काम॥१८॥
जो सु ज्ञान सोहे तुम माहिं, हरि हरादि पुरुषों में नाहिं
सूर्यकांत में जो थुति कढ़े, सो नं कांच मे रवि से बढ़े॥१९॥
हरि हरादि उत्तम इस रीति, उनको लख तुमसे है प्रीति
तुमरी रति से फल यह हमें, जो न भावांतर पर मे रमें॥२०॥
तुम को इकटक लखे जु कोय, अवर विषें रति कैसे होय
को कर पान मधुर जल क्षीर, फिर क्यों पीवे खारा नीर॥२१॥
सब नारी जननी सुत घने, पर तुमसे सुत नाहीं जने
सर्व दिशा से तारे मान, किन्तु पूर्व दिश उगें भान॥२२॥
परम पुरुष जाने मुनि तुमें, तम से परे तेज रवि समें
तुम्हे पाय सब मृत्यू हरें, मोक्ष मार्ग इससे नहीं परें॥२३॥
तुम अचिन्त्य व्यापक ध्रुव एक, मुनिवर विदित असंख्य अनेक
ब्रह्मा ईश्वर आद्य अनंत, अमल ज्ञान मय कहते संत॥२४॥
तुम सुबुद्दी से बुद्ध प्रसिद्ध, अघ संहारक शंकर सिद्ध
धर्म प्रवर्तक ब्रह्मा आप, जग पालक नारायण थाप॥२५॥
तुम्हे नमों हे पर दुख हार, तुम्हें नमों जग भूषण सार
तुम्हे नमो जग नायक धार, तुम्हे नमों भव शोषण हार॥२६॥
क्या अचरज सब गुण तुम पास, जबकि न उनको अन्य निवास
दोष गर्व बहु थल को पाय, सपने भी तुम पास न आय॥२७॥
तरु अशोक ऊँचे के तीर, तुमरो सोहे विमल शरीर
ज्यों तम हर अरु तेजस खास, रवि दीखे घन घट के पास॥२८॥
रतन जड़ीत सिंघासन ऊप, तुम तन सोहे कनक स्वरुप
पूरब दिश उदयाचल पास, सोहे किरण लता रवि खास॥२९॥
कुंद पुष्प सम चौसठ चमर, तुम तन ऊपर ढोरें अमर
शशि सम श्वेत बहे जल धार, ऊँचे कनक मेरु दिश चार॥३०॥
शशि सम तीन छत्र सिर आप, जो रोके रवि का आताप
मोती झालर शोभे घना, जिससे प्रकटे ईश्वर पना॥३१॥
दश दिश मे धुनि उच्च अभंग, जग जन को सूचक शुभ संग
तुमरी बोलें जय जय कार, नभ मे यस को बजे नकार॥३२॥
पारी जात सुन्दर मंदार, वर्षे फूल अनेक प्रकार
मंद पवन गंधोदक झिरें, मानों तुम बच नभ से खिरें॥३३।
तुम भामंडल तेज अपार, जीते सब जग तेजस धार
कोटि सूर्य से बढ़ कर कांति लज्जित भई चन्द्र की शांति॥३४॥
स्वर्ग मोक्ष पथ सूचक शुद्ध, तत्त्व कथन में सबको बुद्ध
प्रकट अर्थ तुम धुनि से होय, सब भाषा गुण परजय जोय॥३५॥
फूले कनक कमल की ज्योति , चहुँ ओर त्यों नख द्युति होति
ऐसे चरण धरो तुम जहाँ, झटपट कमल रचें सुर तहां॥३६॥
जैसा विभव तुम्हारे लार, वैसा विभव न कोई धार
जैसे तम हर सूर्य प्रकाश, तैसा अन्य न ज्योतिष पास॥३७॥
हो उन्मत मद झरे अपार, जो क्रोधित सुन अलि गुंजार
ऐसा सुर गज सन्मुख आय, भय न करे तुम आश्रित पाय॥३८॥
खेंचे कुम्भस्थल गज मत्त, भूमें बिखरे मोती रत्त
ऐसा सिंह न पकडे खाय, जो तेरे पद आश्रित आय॥३९॥
प्रलय पवन सम अग्नि हले, तड़तड़ाय दावानल जले
जगदाहक सन सन्मुख आय, तब तुम थुति जल देई बुझाय॥४०॥
लाल नेत्र अरु काला अंग, धाय उच्च फण कुपति भुजंग
उसको लांघे निर्भय राम, जिस पर अहिऔषध तुम नाम॥४१॥
हय उछलें गज गरजें घोर, सेना चढ़ी नृपति के जोर
तुम कीर्तन से शीघ्र पलाय, ज्यों रवि ऊगत तम विनशाय॥४२॥
भाले छिदें बहें गज रक्त, चल फिर सकै न जोधा मत्त
तब रिपु प्रबल न जीता जाये, सो जय तुम पद आश्रय पाय॥४३॥
दधि मे मगर मच्छ उद्दण्ड, -बद्वानल या पवन प्रचंड
अथवा नाव भंवर मे आय,तब तुम सुमिरत विघ्न नाशाय॥४४॥
घोर जलोदर पीड़ा सहे, आयु न आशा चिन्ता रहे
जब तन लेपे तुम पद धूल, कामदेव सम होय समूल॥४५॥
नख शिख अंग सांकलें ठिलीं, दृढ़ बेडिनि सों टांगें छिलीं
जब तुम नाम मंत्र सुमिराय, बंधन रहित शीघ्र हो जाय॥४६॥
गज केहरि दावानल नाग, रण दधि रोग बन्ध बहु लाग
ये भय भजें स्वयं भय खाय, जब इनको तुम व्रतधर पाय॥४७॥
तुम स्तोत्र जिनेश महान्, भक्ति विवश कछु रचा अजान
पर जो पाठ पढ़े मन लाय, ‘मानतुंग’ अरु लक्ष्मी पाय॥४८॥
स्रोत: जैन भजन पूजा पाठ, पृष्ठ ९४८ से ९५६