नाथ प्रभु दर्शन कर तेरे, आज मैं धन्य हुआ ।
गुण स्मरण करने मात्र से, संसार दुःख ये दूर हुआ ।।
अरिहंतो को सुनने मात्र से, पुण्यबंध ही होता है ।
अरिहंतो की सुनने से जीवों, आत्म हित ही होता है ।।
आत्म हित करने को स्वामि, शरण मैं तेरी ही लूँ ।
नाथ प्रभु दर्शन …।।1।।
अनादि काल से कभी न जिय, अरहंतो के दर्श किए ।
एक बार भी दर्श किए तो, लौट न इस भव में दिखे ।।
इस भव से छुटकारा पाने, शरण मैं तेरी ही लूँ ।
नाथ प्रभु दर्शन…।।2।।
अनंत शक्ति के धारी प्रभुवर, कभी न पर का कर्त्ता माना ।
मैं हूँ अज्ञ, तुझको प्रभुवर, जगत का कर्त्ता माना ।।
कर्तृत्व बुद्धि का नाश करन को, शरण मैं तेरी ही लूँ ।
नाथ प्रभु दर्शन …।।3।।
AJ
रचनाकार: रीतेश जैन, शास्त्री (Reetesh Jain,Shastri), अमरमऊ