भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
जे जे अपना मान रहे थे, तिन सबने निरवेरा।
प्रात: समय नृप मन्दिर ऊपर, नाना शोभा देखी ।
पहर चढ़े दिन काल चालतें, ताकी धूल न पेखी ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
राज कलश अभिषेक लच्छमा, पहर चढ़ें दिन पाई ।
भई दुपहर चिता तिस चलती, मीतों ठोक जलाई ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
पहर तीसरे नाचें गावैं, दान बहुत जन दीजे ।
सांझ भई सब रोवन लागे, हा-हाकार करीजे ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
जो प्यारी नारीको चाहै, नारी नरको चाहै।
वे नर और किसीको चाहैं, कामानल तन दाहै ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
जो प्रीतम लखि पुत्र निहोरें, सो निज सुतको लोरै ।
सो सुत निज सुतसों हित जोरें, आवत कहत न ओरैं ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
कोड़ाकोड़ि दरब जो पाया, सागरसीम दुहाई।
राज किया मन अब जम आवै, विषकी खिचड़ी खाई ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा
तू नित पोखै वह नित सोखै, तू हारै वह जीतै ।
द्यानत’ जु कछु भजन बन आवै, सोई तेरो मीतै ।
भाई कौन कहै घर मेरा, भाई कौन कहै घर मेरा ।।
रचयिता: द्यानतराय जी
विशेष सहयोग:- सुमित जी शास्त्री, मुंबई