भाई ! ज्ञानी सोई कहिए | Bhai ! Gyaani soi kahiye

भाई ! ज्ञानी सोई कहिए |
करम उदय सुख - दुःख भोगे तैं, राग विरोध न लहिये || टेक ||

कोऊ ज्ञान क्रिया तैं कोई, शिवमार्ग बतलावै |
नय निहचै व्यवहार साधिकै, दोऊ चित्त रिझावै || १ ||

कोऊ कहै जीव छिनभंगुर, कोई नित्य बखानै |
परजय दरवित नय परमानै, दोऊ समता आनै || २ ||

कोई कहै उदय है सोई, कोई उद्यम बोलै |
‘घानत’ स्यादवाद सु तुला में, दोनों बातें तौलैं || ३ ||

Artist- पं. घानतराय जी

अर्थ

अरे भाई! ज्ञानी उसे ही कहते हैं जो कर्मोदय के कारण होनेवाले सुख व दुःख को समता से अर्थात् बिना राग-द्वेष के सहन करता है।

कोई ज्ञानार्जन के द्वारा, कोई क्रिया के द्वारा मोक्ष-मार्ग बतलाता है पर जो निश्चय और व्यवहारनय के अभ्यास से निश्चय और व्यवहार दोनों ही दृष्टि से चित्त में प्रसन्न रहता है वही ज्ञानी है।

कोई व्यवहार से जीव को क्षणभंगुर कहता है तो कोई निश्चय से उसे नित्य कहता है। पर जो पर्याय और द्रव्य दोनों को नय प्रमाण से जानकर समता धारण करता है वही ज्ञानी है।

कोई कर्माधीन उदय को प्रमुख मानता है तो कोई पुरुषार्थ को प्रमुख मानता है। द्यानतराय कहते हैं कि जो स्याद्वादरूपी तराजू में दोनों को तोलता है वही ज्ञानी है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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