भाई-
अरे बहिन तुम अब सुनो, दृढ़ श्रद्धा उर धार।
महावीर ने जो कहा, तीन लोक में सार।। 1।।
बहिन-
महावीर के पास क्या ? खुद ही हैं निर्ग्रन्थ।
विषय रूप सुख है नहीं, वीतराग वह पंथ ।। 2।।
भाई-
किस भ्रम में भूली हुई, मान विषय में सुख।
करो सुआदर आत्म का, जिसमें सच्चा सुख।। 3।।
बहिन-
इष्ट विषय तो सुखमय, इनसे तृप्ति पाय।
भोग वस्त्र भोजन बिना, आकुलता उपजाय।। 4।।
भाई-
यदि विषयों में सुख हो, तो क्यों छोड़ो भ्रात।
भोजन पर भोजन करो, खाते क्यों थक जात।। 5।।
सुखाभास सेवत समय, फल में है दुःखदाय।
आकुलता के बीज हैं, त्यागे श्री मुनिराय।। 6।।
बहिन-
धन से सब सुख प्राप्य है, ज्ञानी भी मिल जाय।
पूजा दानादिक करें, स्वर्ग मिले अधिकाय।। 7।।
भाई-
सच्चा सुख वहाँ भी नहीं, आकुलता तत्काल।
तहँ तैं चय संसार में, होय दुःखी बेहाल।। 8।।
बहिन-
तो फिर सुख क्या भ्रातजी ? किस विधि प्राप्ति होय।
जानो दुःखमय विषय सब, सुखमय कभी न कोय ।। 9।।
भाई-
सुख तो तेरा रूप है, सहज प्राप्त हो जाय।
जिस क्षण इच्छाएँ तजे, निज में ही प्रकटाय ।। 10।।
इसीलिए प्रभु वीर ने, दिया यही संदेश।
शुद्धातम अनुभव करो, जिससे सुख हमेश।। 11।।
ज्ञान बिना सुख है नहीं, कुछ भी करो उपाय।
सुख चाहत भी दुःख बढ़े, दुःख अन्त नहीं आय ।। 12 ।।
बहिन-
आत्मज्ञान कैसे मिले ? भ्रात बताओ पाथ।
मैं अनाथ थी आज तक, अब प्रभु निकट सनाथ।। 13।।
भाई-
अरे ! बहिन श्रद्धा सहित, करो सदा स्वाध्याय।
तत्त्व पठन-पाठन-श्रवण, चिंतन-ध्यान लगाय।। 14।।
निज स्वभाव जिससे दिखे, ज्ञान उसी का नाम।
वीतराग-विज्ञान से, सहज मिले शिवधाम ।। 15 ।।
बहिन-
स्वाध्याय भी मैं करूँ, ध्यान हृदय में लाय।
पर इस चंचल चित्त में, बहु विकल्प हो जाय।। 16।।
भाई-
एक प्रश्न मैं पूछता ? कौन विकल्प सताय।
उलझे मन किस वस्तु में, जिससे दुःख न मिटाय ।। 17 ।।
बहिन-
परमेष्ठी को जपत भी, दीखे तन-धन-धाम ।
विषय ध्यान में आत हैं, होय लक्ष्य तब वाम।। 18।।
भाई-
इनमें ही तव रुचि लगी, इनमें सुःख दिखाय।
महिमामय ये ही दिखें, आत्म-तत्त्व क्यों पाय।। 19 ।।
ध्यान-ज्ञान बिन है नहीं, निर्णय करो स्वरूप।
समझो महिमा आत्म की, पाओ सुख अनूप ।। 20।।
जैसे व्यापारी सजग, रहे समय व्यापार ।
भूख-प्यास निद्रा नशे, दीखे धन ही सार।। 21।।
त्यों ही ज्ञानी है सजग, सुख देखे निज माँहि ।
बाह्य दृष्टि छूटे स्वयं, सब परभाव पलाँहि ।। 22 ।।
कहने का तात्पर्य है, जितने उठे विकल्प।
अधिके ज्ञानाभ्यास से, रहें न अन्य विकल्प।। 23।।
बहिन-
अब मम दृष्टि खुल गई, छूटा सब मिथ्यात्व।
भाव धर्म समझा सभी, पाया निज का सत्व।। 24।।
ध्रुव स्वभाव का लक्ष्य ले, करूँगी ध्यानाभ्यास ।
वीरनाथ अवलम्ब ले, बैठूँ प्रभु के पास।। 25।।
जो मम सच्चे तात हैं, बतलाया सुखधाम ।
ऐसे त्रिभुवन नाथ को, भक्ति सहित प्रणाम।। 26।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह