बहिष्कार नहीं करोगे, तुम्हारा कोई कार्य सफल नहीं हो सकता। सफलता, माया और धोखेमें नहीं है। उसका मार्ग सत्याग्रह है। अरे भाई, अपना मन स्वच्छ रखो ।
“जप तप तीरथ जज्ञ व्रतादिक, आगम अर्थ उचरना रे।
अरे भाई, यदि तुमन अपने अन्तस्से वासना और कषायोंका कीचड़ साफ़ नहीं किया-क्रोध, अहंकार, माया और लोभको बराबर पकड़े रहे तो तुम्हारा समस्त जप, तप, तीर्थ-गमन, यज्ञ, व्रताचरण और शास्त्रोपदेश एकदम निष्फल है और ऐसी स्थितिमें अन्य कोई मार्ग ही नहीं है कि तुम इन्हीं वासनाओं और कषायोंके दलदलमें फंसे रहो और मरते जाओ । इस संकटसे उन्मुक्त होनेका मार्ग तो अन्तः शुद्धि ही है। अरे भाई, अपना मन स्वच्छ रखो ।
“बाहिर भेष क्रिया उर शुचि सों, कीयें पार उतरना रे ।
अरे भाई, तुम जितनी वाह्य क्रियाओंका आचरण करते हो और उच्चतम वेषोंको अङ्गीकार करते हो- इस सबकी सफलता तुम्हारी मानसिक शुद्धि पर अवलम्बित है। अपनी मनःशुद्धिके बलपर ही तुम अपना चरम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हो। यदि तुमने अपना मन साफ़ नहीं किया उसमें स्वार्थ और वासनाओंको बराबर प्रश्रय दिये रहे तो विश्वास रक्खो, तुम्हारा बाह्य आचार और वेष-परिधान लोक-रंजन) के सिवाय और कुछ न होगा। महान् शास्त्रोंका भी यही मथितार्थ है।