अर्थ
अरे भाई ! मैंने अब यह जान लिया है कि पुद्गल चेतनारहित है, अचेतन है। मेरा आत्मा चेतन है। आत्मा व पुद्गल दोनों भिन्न हैं।
पुदगल दरब अचेत भिन्न है, मेरा चेतन वाना ॥ भाई. ।।
अनन्त कल्प दुःख सहन करते हुए बीत गए। मैंने दुःख को ही सुख मान लिया। सुख और दुःख दोनों कर्मों की अवस्थाएँ हैं। मैं तो कर्मों से अन्य हूँ, अलग हूँ, भिन्न हूँ।
कलप अनन्त सहत दुख बीते, दुखकौं सुख कर माना।
जहाँ सुबह/भोर थी वहाँ रात हो गई। रात के बाद फिर सुबह होगी, इस प्रकार सुख-दुख, पुण्य-पाप का क्रम चलता रहता है। पर ये भी अलग-अलग, भिन्न-भिन्न नहीं हैं, ये तो कर्म ही हैं। जब यह भूल मिट गई, श्री जिनेन्द्र के चरण-कमलों का आश्रय लिया और निज को पहचाना तब परमानन्द की प्राप्ति हुई।
सुख दुख दोऊ कर्म अवस्था, मैं कर्मनतें आना ॥ भाई. ॥ १ ॥
गूँगा यद्यपि गुड़ खाकर उसका स्वाद जानता है, पर उसे व्यक्त करने में, कहने में असमर्थ होता है। उसी भाँति मैंने चेतनरूप को जाना, पहचाना, अनुभव किया पर उस अनुभूति को वचनों द्वारा कहा नहीं जा सकता।
द्यानतरायजी कहते हैं कि लोक में प्रसिद्ध उक्ति है कि हंस और मेंढक दोनों जल में ही रहते हैं पर दोनों में बहुत अन्तर है, भेद है, इनका भेद (मेढक और हंस) जिसने देखा है, अनुभव किया है, वह ही वास्तविकता जानता है। उसी प्रकार जिसने आत्मा व जड़ के भेद को जान लिया, अनुभव कर लिया वह ही आत्मा को जानती हैं।
शब्दार्थ: कल्प - एक उत्सर्पिणी काल तथा एक अवसर्पिणी काल की कुल अर्वाधः बिहान = सुबह; पखाणा = कहावत, लोकोक्ति ।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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