जियो और जीने दो, जग को तुमने यह सिखलाया है।
हर प्राणी को जीने का है, अधिकार सहज बतलाया है।।
हिंसा केवल वध न हो, यह भावों तक भी जाती है।
राग द्वेष उत्पन्न न हो, सच्ची अहिंसा वह कहलाती है।।
राग द्वेष की अग्नि बुझाकर, समता का दीप जलाएँ हम।
सब जीवों को एक समान ही ,सिद्ध स्वरूप दिखाएँ हम।।
तुमने ही यह बतलाया, निज आत्म में ही रमण करो।
बाहर कुछ मत ढूंढो तुम, बस अंदर में पहचान करो।।
निज आत्मा की पहचान करे जो, मिटता चार गति का भार।
स्वयं को जो जान सके, वह ही होता भव से पार।।
तुमने पथ ऐसा दर्शाया, हर प्राणी में वह क्षमता है।
स्वयं को जो पहचान सके, वह ही पाता सच्ची प्रभुता है।।
रचनाकार: आगम कुमार जैन (Aagam Kumar Jain), दमोह
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