हे प्रभु! इस संसार में बसकर / रहकर मैंने बहुत दुःख पाए हैं। मैंने मिथ्यात्व को हृदय में धारण कर रखा है, जिसके कारण सम्यक् आचरण को मैं जान ही नहीं सका ।
अनादि से मैं नरक-निगोद में भटकता हुआ, रुलता हुआ चला आ रहा हूँ। अनेक बार देव भी हुआ, मनुष्य भी हुआ और आत्मस्वभाव को भूलकर अनेक प्रतिकूल स्थितियों को धारण करता रहा।
जिन क्रियाओं का परिणाम ही दुःख का कारण है, दुःख का भंडार है, उनको मैं सुखकारक जानता रहा, समझता रहा। भ्रमरूपी शराब के नशे में मत्त होकर सुध गँवाकर दुःखी हुआ और सत्य व्यवहार से विचलित रहा अर्थात् सत्य को नहीं जान सका।
जिनवाणी को मैंने जाना नहीं, सुना-समझा नहीं। जो कुमति का नाश करनेवाली है, उससे बचानेवाली, उसे दूर करनेवाली है। द्यानतराय कहते हैं कि अब मुझे उस पर श्रद्धा जागृत हो गई है जिससे दुःख मिटने लगे हैं और सुख का सार समझ में आने लगा है।