बसि, संसार में मैं पायो दुःख अपार | Basi, sansar me main paayo dukh apar

बसि संसार में मैं पायो दुःख अपार |
मिथ्याभाव हिये धरयो, नहिं जानो सम्यक् चार || टेक ||

काल अनदिहिं हौं रुल्यौ हो, नरक निगोद मंझार |
सुरनर पद बहुत धरे पद, पद प्रति आतम धार || १ ||

जिनको फल दुखपुञ्ज है हो, ते जानें सुखकार |
भ्रम मद पीय विकल भयो नहिं, गह्यो सत्य व्योहार || २ ||

जिनवाणी जानी नहीं हो, कुगति विनाशन हार |
‘घानत’ अब सरधा करी, दुख मेटि लह्यो सुखसार || ३ ||

Artist- पं. घानतराय जी

खोज: Basi, sansar me main payo dukh apar

अर्थ

हे प्रभु! इस संसार में बसकर / रहकर मैंने बहुत दुःख पाए हैं। मैंने मिथ्यात्व को हृदय में धारण कर रखा है, जिसके कारण सम्यक् आचरण को मैं जान ही नहीं सका ।

अनादि से मैं नरक-निगोद में भटकता हुआ, रुलता हुआ चला आ रहा हूँ। अनेक बार देव भी हुआ, मनुष्य भी हुआ और आत्मस्वभाव को भूलकर अनेक प्रतिकूल स्थितियों को धारण करता रहा।

जिन क्रियाओं का परिणाम ही दुःख का कारण है, दुःख का भंडार है, उनको मैं सुखकारक जानता रहा, समझता रहा। भ्रमरूपी शराब के नशे में मत्त होकर सुध गँवाकर दुःखी हुआ और सत्य व्यवहार से विचलित रहा अर्थात् सत्य को नहीं जान सका।

जिनवाणी को मैंने जाना नहीं, सुना-समझा नहीं। जो कुमति का नाश करनेवाली है, उससे बचानेवाली, उसे दूर करनेवाली है। द्यानतराय कहते हैं कि अब मुझे उस पर श्रद्धा जागृत हो गई है जिससे दुःख मिटने लगे हैं और सुख का सार समझ में आने लगा है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 253।

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