बारह मासा (सीता सती का) | Barah Masa (Sita Sati ka)

बारह मासा (सीता सती का) | Barah Masa (Sita Sati ka)

बिन कारन स्वामी क्यों तजी, बिनवै जनक दुलारि ॥टेक ॥
१. आषाढ़ मास
आसाढ़ घुमडि आए बादरा, घन गरजे चहुँ ओर।
निर्जन बन मैं स्वामी तुम तजो, बैंठन कूँ नहिं ठौर ॥१ ॥
क्या हम सत गुरू निंदियौ, क्या दियौ सतियन दोष ।
क्या हम सत संयम तज्यौ, किस कारन भए रोष ॥२ ॥
क्या पर पुरुष निहार के, पर भव कियौ है निदान।
क्या इस भव इच्छा करी, क्या मैं कियौ अभिमान ॥३ ॥
कटुक वचन स्वामी नहिं कहे, हिंसा करम न कीन ।
परधन पर चित नहिं दियौ, क्यों मन भयो है मलीन ॥४॥
२. श्रावण मास
श्रावण तुम सङ्ग वन विषै, विपति सही भगवान्।
पाय पयादी बन-बन मैं फिरी, तनिक राखी मोरी कान ॥१ ॥
स्वसुर दिसौठा जिस दिन तुम दियौ, कियौ भरत सरदार।
ता दिन विकल्प नहिं कियो, तजि संपति भई लार ॥२ ॥
जनक पिता की मैं हूँ लाड़ली मात विदेहा की बाल
भ्रात प्रभामण्डल बली, विपत भरूँ बेहाल ॥३॥
मात मन्दोदरी गर्भ से, जन्मी रावण गेह ।
परभव करम सँयोग से, रावण कियौ है संदेह ॥४॥
३. भादौ मास
भादौं पण्डित पूछियो, पण्डित करी है विचार।
कन्या के कारण राजा तुम मरो, दीनीं तुरत बिसार ॥१ ॥
गाड़ धरि मन्जूष मैं, जनक नगर बन बीच।
हल जोतत किरसान के, लई करम ने खींच ॥२॥
मरण दिवो नहिं ता दिना, करम लिखे दुख एह।
करी नजर राजा जनक के, पाली पुत्र सन्देह ॥३॥
जनक स्वयम्वर जब कियो, लिए सब भूप बुलाय।
दरशन करि थारे बश भई पड़ी चरणविच आय ॥४॥
४. कुवार मास
क्वार मास फिर गए भूप सब, मो कारण कियौ जुद्ध।
बहुत बली मारे रणविषै, ठायौ धनुष प्रबुद्ध ॥१ ॥
खरदूषण के युद्ध में, आयौ रावण दौड़ ।
छलकर धोखा प्रभु कूँ दियौ, नाद बजायौ घनघोर ॥२ ॥
जल्दी पधारौ प्रभु मैं घिर गयौ, तुम जानी भगवान्।
कष्ट पडयौ जी मेरे भ्रात पै, उपज्यौ मोह महान् ॥३ ॥
मोहि लकोई पात बटोर कै, करम लिखी कछु और।
आप पधारे अपने वीर पै, आ गयो रावण चोर ॥४॥
चील झपट्टा करि कै ले गयौ, मो कूँ अचक उठाय।
देखी नाथ जटायु ने, क्या तुम जानत नाहिं ॥५ ॥
झपट-झपट वाके सिर हुयौ, मुकुट खसोटयौ मूँछ उपारि।
मारि तमाचा डारा भूमि मैं, पंछी खाईजी पछार ॥६॥
लछमन तुमहिं निहारि कै, बात कही करि गौर।
बिनहिं बुलाए आए भ्रात क्यों, है कछु कारन और ॥७॥
काहू छलिया नैं ये कछु छल कियौ, कै कछु कर्म चरित्र।
नाहिं पिछान्यौ जावै जुद्ध में, कौन है बैरी कौन है मित्र ॥८ ॥
५. कार्तिक मास
कार्तिक तुरत पठाइया, उलाट तुम्हें थारे भ्रात।
बिना ही बुलायें आए आप क्यूं, शत्रु करेंगे उतपात ॥१ ॥
आएजी तुरत रक्षा करन कूँ, हम सें धरि प्रभु प्यार।
बिखरे ही पाए पत्ते बेल सब, खाई आप पछार ॥ २ ॥
भ्रात हटाई आकै मूर्छा, सकल शत्रु गण जीत।
परौ जटायु देख्यौ सिसकतौ, श्रावक धर्म पुनीत ॥३॥
जन्म सुधार्यो वाको आपनें, मोबिन पायौ नहिं चैन।
डारी डारी ढूंढ़ी दोऊँ मिल बन विषै, रोय सुजाए तुम नैन ॥४ ॥
धीर बन्धाई लछमन भुजबली, बहुत करी थारी सेव।
विपट कटेंगी प्रभु समता धरो, तदपि न माने थे तुम देव ॥५ ॥
ल्याऊँ काढ़ि पताल से, ल्याऊँ पर्वत फोर ।
खबर मिलै तो सब कुछ मैं करूँ, चीर बगाऊँ थारा चोर ॥६ ॥
फेर मिले जी प्रभु सुग्रीव सैं, साहसगति दियौ मारि।
पाय सुतारा ल्यायौ हनुमान् कूँ, ढूढ़न भेज्यौ मोहि सकार ॥७ ॥
६. अगहन मास
अगहन खबर मंगाय कैं, मोढिग भेज्यौ तुम हनुमान्।
कूदि समन्दर गयो गढ़ लंक में, भेजी अँगूठी तुम भगवान् ॥ १ ॥
तुम बिन बैठ रो रही बाग मैं, राम ही राम पुकार।
अन्न कियौ ना पानी मैं पियौ, परवश हुई थी लाचार ॥२ ॥
मुख धुलवायौ श्री हनुमान् ने, तुमरी आज्ञा के परमान।
प्राण बचाए मेरे विपत मैं, करवायौ जलपान ॥३ ॥
तुरत ही भेज्यौ तुमरे चरण में चूड़ामणि दियौ तारि।
गाय फँसी है गाढ़ी गार में, खैचि निकारौं जी भरतार ॥४ ॥
७. पौष मास
पौष चढ़ जी गढ़ लंक पैं, भारत कियौ भगवान्।
गारत किये लाखों सूरमा, मारि कियौ घमसान ॥१ ॥
काट्यौ सिर लंकेश को, लक्ष्मी धर वर वीर।
कूद पड़े जी जोधा लङ्क मैं, लवण समुन्दर चीर ॥२॥
ल्याए तुरत छुड़ाय कै, अशरण शरण अधार।
इतनी करि ऐसी क्यों करी, घर से दई क्यों निकार ॥३ ॥
पग भारी जी गिर-गिर मैं पडूं शरण सहाय न कोय।
अपनी कही ना मेरी तुम सुनी, बहुत अंदेशा है मोहि ॥४॥
८. माघ मास
माघ प्रभुजी पाला पड़ रहा, पौढन कूँ नहीं सेज।
ओढ़न कूँ नहीं काँवली, दई क्यों विपति में भेज ॥१॥
सिंह दहाडैं कूकैं भेड़ियो, मारें गज चिंघाड़।
थर-थर काँपैं थारी कामनी, स्यालन रही है दहाड़ ॥२।
नाचें भूत पिशाच गए, रूण्डमुण्ड विकराल ।
सनन-सनन सारा बन करें, काँटे चुर्भे कराल ॥३ ॥
कित बैठूं लेटू कित प्रभु पास खवास न कोय।
अन्न करूँ न पानी मैं पिऊँ, बालक कूँ दुःख होय ॥४॥
तुम सब जानों प्रभु मेरे हालकूँ, अष्टम वलि अवतार।
तुम सूरज मैं पट बीजनी, क्या समझाऊँ भरतार ॥५॥
समरथ हो प्रभू क्यों कसी, प्रगट कियों क्यों न दोष।
धोखा दे क्यो धक्का दियौ, आवै नहीं सन्तोष ॥६ ॥
९. फाल्गुन मास
फागन आई जी अठाइयाँ, अपने करम कूँ दे दोष।
ध्यान धरयौ भगवान् को, बैठि रही मन मोस ॥ १ ॥
अरज करे प्रभु की हजूर मैं, ममता भाव निवार।
तुम ही पिता हो प्रभु तुम मात हो, तुम हो भ्रात हमार ॥२ ॥
निर्धन के प्रभु तुम धनी, निर्जन के हो परिवार।
इकवर राम मिलाइयो, दीजियो दोष उतार ॥ ३ ॥
तुम हो राजा प्रभु जी धरम के, हम कूँ लगायो परजा दोष ।
शील में मेरे सब सन्से करें, राम रुसाये हो गये रोष ॥४॥
त्याग दिये है प्रभु हम रामजी, त्याग दियो है सब संसार।
गर्भवती हू कर्म संयोग से, इससे हुई हूँ लाचार ॥५ ॥
जिस दिन प्रभु पल्ला पाक हो, मिले मोहि भरतार।
भरम मिटा के धारूँ धरम को, त्यागूँ सब संसार ॥६ ॥
राम मनावैं तौ भी ना मनूँ, कर जाऊँ बन को विहार।
कर पै श्री रघुवीर के, चोटी धरूँगी उपाड ॥७ ॥
भावें यों सती जी बैठी भावना, ध्यावें पद नवकार।
पाप घट्यो प्रगट्यो पुण्य फल, सुन लई तुरत पुकार ॥८ ॥
पुण्डरीक पुर नगर को बज्रजंघ भूजाल।
आ गये पुण्य संजोग तें, गज पकड़न वाही काल ॥९ ॥
ढूँढत गज पति बन विषै, भनक पड़ी वाके कान।
कोई सतवन्त रोवे बन विषै, किन ये सताई जी अज्ञान ॥१०॥
दोष लगायो कैंसे पूछिये, गज तजि उतरयो धीर।
विनय सहित दुःख पूछिये चल्यो, आवे जैसे भैना के घर वीर ॥११॥
तुम हो बहिन मेरी धर्म की, विपत कहों समझाय।
मात-पिता परिवार से, दूंगो बहन मिलाय ॥१२ ॥
जनक पिता की हूँ मैं लाडली, भ्रात भामण्डल धीर।
स्वसुर हमारे दसरथ नृपबली, भर्ता सिरी रघुवीर ॥१३॥
रावण हरि करि ले गयो दोष धरे संसार ।
शील में मेरे सब संसे करें, दीनी राम निकार ॥१४॥
सुनत कथा जी छाती थर हरी, टपकें असुबन धार।
हा हा रे कर्म तें ए क्यों कसी, कियों तुरत उपगार ॥१५ ॥
देव धरम दिये बीच में, बहन बनाई तत्कार ।
पुन्डरीकपुर ले गयो, करि के गज असवार ॥१६ ॥
पुत्र भए दो लव कुश बली, शिवगामी अवतार ।
बज्रजंघ रक्षा करी, पाली किये हुशियार ॥१७॥
१०. चेत्र मास
चैत मास नारद मुनि मिलै, चरन पड़े दोऊ वीर।
राम लखन किसी सम्पदा, हूज्यो थारे घर वर वीर ॥ १ ॥
पूछिये अपनी मात से, राम लखन माता कौन।
टस-टस लागे आँसू टपकने, मस्यो मन धस्यो मौन ॥२ ॥
नारद मुनि समझाइयें, पिछले सकल वृतान्त।
सुनत उठे जोधा खड्ग ले, बैंठ विमाण तुरन्त ॥३॥
घेरि अजुध्या रण भेरी दई, काँपे सुरग पाताल।
सोच भयो श्री रघुवीर के, आये कौन अकाल ॥४॥
निकसे दोऊ भ्राता जुद्धकूँ, खूब मचाए घमसान।
राम लखन घबरा दिए, पटक्यों रथ काँटे बाण ॥५॥
हल मूसल ठाए राम ने, लछमन चक्र सम्भार।
सातबार फँक्यों तान के, वृथा गए सातों बार ॥६ ॥
हम हरिबल अक एकि घों, उपजो सोच अपार ।
आग बबूला होके फिर लियो, चक्र प्रलय करतार ॥७॥
तब नारद आए भूमि में, राम लखन ढिंग जाय।
बात कही सब समझाय के, किस पैं कोपे रघुराय ॥८ ॥
पुत्र तुमारे दोऊ भुजबली, लव अंकुश बलवन्त।
मात-विपत सुनि कोपियो, भाष्यो सकल वृतन्त ॥९॥
भरि आई छाती श्री रघुवीर की, रनकूँ दियो है निवार।
आय परे सुत चरन में, लीने दोऊ पुचकारि ॥१० ॥
११. बैशाख मास
मास बैंशाख बसन्त ऋतु, सुनि सीताजी की सार।
भाग पड़े हनुमत से बली, ल्याए करि मनुहार ॥ १ ॥
बज्रजंघ आयो धूम से, ल्यायो सब परिवार।
राम कहें मैं आने दूँ नहीं, सीता दई मैं निकार ॥२॥
जो आवैं तो आवो इस तरह, कूदे अग्नि मझार।
देय परीक्षा अपने शील को, होवे मेरी पटनार ॥३॥
सीता एहि पन धारियो, होवे कुण्ड तैयार।
अगन जलावो देरी मत करो, सो जोजन विस्तार ॥४॥
साड़ी कसि त्यारी करी, अंग ढको बड़ भाग।
कुण्ड खुदायों मन भावतो, चेतन कर दई आग ॥५॥
जाय चढ़ी ऊँचे दमदमे, देखे देव अपार।
सत मूरत सूरत सोहनी, मन में हरष अपार ॥६॥
देखें सुरगों के देवता, देखें भवन पतीस।
चन्द सूरज देखें ज्योंतीषी, देखें भूत पतीस ॥७॥
देखें सब विद्याधरा, देखें गण गन्धर्व।
क मर कसैं फौजें आ पड़ी देखें राजा सर्व ॥८॥
डीग अगन उठी गगन लों, तड़ तडाट भयो घोर।
कहत प्रजा श्रीराम से, क्यों प्रभु भये हो कठोर ॥९॥
बज्र बचें ना ऐसी अगन मैं, फाटे धरणि पताल।
पर्वत फटि मठ गिर पड़े, हे प्रभु कीजिए टाल ॥१०॥
राम खड्ग सूत्यो हाथ में, मत कोई कहो जी बनाय।
आज्ञा माने मेरी जानकी, देवे भरम मिटाय ॥११॥
हुक्म दिये रघुवीर ने, शील परीक्षा देय।
नातर क्यों आई तू यहाँ, परजा करे है सन्देह ॥१२॥
पंच परम गुरु बन्दि के, करि पति कूँ परिणाम।
छिमा ही कराई सब जीव सौ, देखे लछमन राम ॥१३॥
पुत्र जुगल छोड़े रोवते, सोहे शची समान।
हरष भरी सतवंती महा, बोली बचन महान् ॥१४॥
जो पर पुरूष निहारि के, मैं कछु किये है कुभाव।
भस्म अग्नि मोहि कीजिये, नातर जल होय जाय ॥१५॥
१२. जेठ मास
जेठ तपैं सुरज आकरै, नीचें अग्नि प्रचण्ड।
आस-पास जल-थल क्यार सब सूकिं गए बहु बनखण्ड ॥ १ ॥
कूद पड़ी जलती डीग में, शान्ति भई ततकाल।
उभरे कमल अकाश लों, लीनी अधर सहार ॥२ ॥
जल लहरावे बोले हंसनी, कर रही मीन कल्लोल।
छत्र फिरै जी उसके सीस पे, इन्द्र चवर रहै ढोल ॥३॥
शीतल मन्द सुगन्ध जुत, मीठी-मीठी चले जी बयार।
बरखें मनु अमृत झड़ी, देव करें जैं-जैकार ॥४ ॥
धन्य सती धन सतवन्ती, धन-धन धीरज एह ।
धिक्-धिक् हम उनकों करे, जिनके मन सन्देह ॥५॥
सीता भावे मनमें भावना, यह संसार अनित्य ।
धर्म बिना तीनों लोक में, शरण सहाई ना मित्र ॥६ ॥
उलट-पुलट चाले हटरसा ये संसारी चक्र ।
एक अकेला भटके आतमा, क्या पशु-पंक्षी अरु क्या शक्र ॥७ ॥
अन कोई जग में आपना, अन हम काहू के मीत।
अशुचि अपावन तन विषै, करम करे विपरीत ॥८॥
संवर जल बिन ना बुझे, तृष्णा अगन प्रचण्ड।
कर्म खपाये बिन ना खपे, भटके सब ब्रह्मण्ड ॥९ ॥
दुर्लभ बोध जगत् में, दुर्लभ श्री जिनधर्म ।
दुर्लभ स्वपर विचार है, कर्म न डारो भर्म ॥१०॥
पर वश भोगी भारी वेदना, स्ववश सही नहिं रंच।
सास्वत सुख जासैं पावती, लई करम ने बन्च ॥११॥
अब मैं सब वेदना सही, कीनी धरम सहाय।
परतिज्ञा पूरी मैं करूँ, मोह महा दुःख दाय ॥१२॥
राम कहें प्यारी चल धरूँ, ल्या भुज में भुज डारि।
पाड़ि शिखा कर पैं धरि दई, त्यागौ हम संसार ॥१३॥
तुम त्यागी निरदोष कूँ, हम त्यागे लख दोस।
करके छिमा मैं संजम लियौ, करियौ मत अफसोस ॥१४ ॥
गई सती जी बन खण्ड कू भई अरजिका धीर।
उग्र-उग्र तप वो करे, सब दुःख सहे शरीर ॥१५ ॥
पूरी करि परजाय कूँ, अच्युत सुरग मंझार ।
इन्द्र भए जी पुन्य संजोग से, भोगे सुक्ख अपार ॥
बिन कारण स्वामी क्यों तजी, बिनवै जनक दुलारी ॥१६ ॥
उपसंहार
पढ़ियो भाई भावसो, गावो बाल गोपाल ॥
भावोजी धरम की ही भावना, सिर पर गरजत काल ॥१ ॥
शील महातम मैं कह्या, या सम धरम न कोय।
शील रतन मोटा रतन, जाते जग यश होय ॥२॥
पर भव में सुख सम्पदा, इन्द्रादिक पद पाय।
काटि करम शिव सुन्दरि वरे, जन्म-मरण छुटि जाय ॥३ ॥
वंश बढ़े सब संकट कटे, सोग वियोग न कोय।
रोग मिटे जो सेवो संतजन, पाप सकल गेरे धोय ॥४॥
नैनानन्द प्रबन्ध यह, दया सिन्धु सुतहेत।
गायो ध्याय जिनेन्द्र कूँ, पद्मपुराण उपेत ॥५ ॥
संवत विक्रम भूपको, नवशत एक हजार।
तापर षट् चालीस धर (१९४६) लीज्यो सुघड़ संभाल ॥६ ॥
माघ शुक्ल पून्यो के दिनां, पूरे किए बारह मास।
दया-सिन्धु जिन धर्म कूँ, कीज्यौ पुत्र प्रकाश ॥७॥
मत पड़ियो बेटा कुपन्थ में, तजियो मत जिन धर्म।
कर लीज्यो बेटा नरभव को सफल, रख लीज्यो मेरी शर्म ॥८ ॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: श्री नयनानन्द जी