बारह भावना (कविवर पण्डित दीपचन्द जी) | Barah Bhavna (Kavivar Pt. Deepchand Ji)

बारह भावना (कविवर पण्डित दीपचन्द जी) | Barah Bhavna (Kavivar Pt. Deepchand Ji)

द्रव्यदृष्टि से वस्तु थिर, पर्यय अथिर निहार।
तासे योग वियोग में, हर्ष विषाद निवार ॥१ ॥
शरण न जिय को जगत में, सुर नर खगपति सार।
निश्चय शुद्धातम शरण, परमेष्ठी व्यवहार ॥२ ॥
जन्म जरागद मृत्यु भय, पुनि जहँ विषय-कषाय।
होवे सुख दुःख जीव को, सो संसार कहाय ॥३॥
पाप-पुण्य फल दुःख सुख, सम्पत विपत सदीव।
जन्म-जरा-मृतु आदि सब, सहै अकेला जीव ॥४॥
जा तन में नित जिय बसै, सो न अपनो होय ।
तो प्रतक्ष जो पर दरब, कैसे अपनो होय ॥५ ॥
सुष्ठु सुगन्धित द्रव्य को, करे अशुचि जो काय ।
हाड़ माँस मल रुधिर थल, सो किम शुद्ध कहाय ॥६ ॥
मन-वच-तन शुभ अशुभ ये, योग आस्त्रव द्वार ।
करत बन्ध विधि जीव को, महा कुटिल दुःखकार ॥७॥
ज्ञान विराग विचार के, गोपै मन वच काय ।
थिर है अपने आप में, सो संवर सुखदाय ॥८ ॥
पाँचों इन्द्रिय दमन कर, समिति गुप्ति व्रत धार ।
इच्छा बिन तप आदरै, सो निर्जरा निहार ॥९ ॥
पुद्गल धर्म अधर्म जिय, काल जिते नभ माँहि ।
नराकार सो लोक में, विधि वश जिव दुःख पाँहि ॥१० ॥
सबहि सुलभ या जगत में, सरु परपद धन धान ।
दुर्लभ सम्यग्बोधि इक, जो है शिव सोपान ॥११ ॥
जप तप संयम शील पुनि, त्याग धर्म व्यवहार ।
‘दीप’ रमण चिद्रूप निज, निश्चय वृष सुखकार ॥१२॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: कविवर पण्डित दीपचन्द जी