बारह भावना (कविवर बुधजन जी) | Barah Bhavna (Kavivar Budhjan Ji)

बारह भावना (कविवर बुधजन जी) | Barah Bhavna (Kavivar Budhjan Ji)

(हरिगीतिका)
जेती जगत में वस्तु तेती अथिर परिणमती सदा।
परिणमन राखन नाहिं समरथ इन्द्र चक्री मुनि कदा।।
सुत नारि यौवन और तन धन जानि दामिनि दमक सा।
ममता न कीजे धारि समता मानि जल में नमक सा ॥१ ॥
चेतन अचेतन सब परिग्रह हुआ अपनी थिति लहै।
सो रहै आप करार माफिक अधिक राखे ना रहै ॥
अब शरण काकी लेयगा जब इन्द्र नाहीं रहत हैं।
शरण तो इक धर्म आतम याहि मुनिजन गहत हैं॥२॥
सुर नर नरक पशु सकल हेरे, कर्म चेरे बन रहे।
सुख शासता, नहिं भासता, सब विपति अति में सन रहे ॥
दुःख मानसी तो देवगति में, नारकी दुःख ही भरै।
तिर्यंच मनुज वियोग रोगी शोक संकट में जरै ॥३॥
क्यों भूलता, शठ फूलता है देख परिकर थोक को।
लाया कहाँ ले जायगा क्या फौज भूषण रोक को॥
जनमत मरत तुझ एकले को काल केता हो गया।
सङ्ग और नाहीं लगे तेरे सीख मेरी सुन भया ॥४॥
इन्द्रीन तैं जाना न जावै तू चिदानन्द अलक्ष है।
स्वसंवेदन करत अनुभव होत तब प्रत्यक्ष है ॥
तन अन्य जड़ जानो सरूपी तू अरूपी सत्य है।
कर भेदज्ञान सो ध्यान धर निज और बात असत्य है ॥५ ॥
क्या देख राचा फिरै नाचा रूप सुन्दर तन लहा।
मल मूत्र भाण्डा भरा गाढ़ा तू न जानै भ्रम गहा॥
क्यों सूग नाहीं लेत आतुर क्यों न चातुरता धरै।
तुहि काल गटकै नाहिं अटकै छोड़ तुझको गिर परै ॥ ६ ॥
कोई खरा कोई बुरा नहिं, वस्तु विविध स्वभाव है।
तू वृथा विकलप ठान उर में करत राग उपाव है॥
यूँ भाव आस्रव बनन तू ही द्रव्य आस्रव सुन कथा।
तुझ हेतु से पुद्गल करम बन निमित्त हो देते व्यथा ॥७॥
तन भोग जगत सरूप लख डर भविक गुरु शरणा लिया।
सुन धर्म धारा भर्म गारा हर्षि रुचि सन्मुख भया॥
इन्द्री अनिन्द्री दाबि लीनी त्रस रु थावर बन्ध तजा।
तब कर्म आस्स्रव द्वार रोकै ध्यान निज में जा सजा ॥८ ॥
तज शल्य तीनों बरत लीनो बाह्यभ्यंतर तप तपा।
उपसर्ग सुर-नर-जड़-पशूकृत सहा निज आतम जपा ॥
तब कर्म रस बिन होन लागे द्रव्य भावन निर्जरा।
सब कर्म हरकै मोक्ष वरकै रहत चेतन ऊजरा ॥९ ॥
विच लोकनन्ता लोक माँही लोक में सब द्रव भरा।
सब भिन्न भिन्न अनादि रचना निमित्त कारण की धरा ॥
जिनदेव भाषा तिन प्रकाशा भर्म नाशा सुन गिरा।
सुर मनुष तिर्यक् नारकी हुई ऊर्ध्व मध्य अधो धरा ॥१० ॥
अनन्तकाल निगोद अटका निकस थावर तन धरा।
भू वारि तेज बयार है कै बेइन्द्रिय त्रस अवतरा ॥
फिर हो तिइन्द्री वा चौइन्द्री पंचेन्द्री मन बिन बना।
मनयुत मनुष गति हो न दुर्लभ ज्ञान अति दुर्लभ घना ॥११ ॥
जिय न्हान धोना तीर्थ जाना धर्म नाहीं जप जपा।
तन नग्न रहना धर्म नाहीं धर्म नाहीं तप तपा॥
वर धर्म निज आतम स्वभावी ताहि बिन सब निष्फला।
‘बुधजन’ धरम निजधार लीना तिनहिं कीना सब भला ॥१२ ॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: कविवर बुधजन जी