द्रव्य सुभाव बिना जग माहिं, पर यै रूप कछू थिह नांहिं।
तन धन आदि दीखे जेह, काल अगनि सब ईंधन तेह ॥१ ॥
भव वन भ्रमत निरन्तर जीव, याहि न कोई शरन सदीव।
व्योहारे परमेष्ठी जाप, निहचै शरन आपको आप ॥२ ॥
सूर कहावै जो सिर देय, खेत तजै जो अपयश लेय।
इस अनुसार जगत की रीत, सब असार सब ही विपरीत ॥३ ॥
तीन काल इस त्रिभुवन माहिं, जीव संगाती कोई नाहिं।
एकाकी सुख दुख सब सहैं, पाप पुण्य करनी फल लहै ॥४॥
जितने जग संजोगी भाव, ते सब जिय सों भिन्न सुभाव।
नित संगी तन ही पर सोय, पुत्र सुजन पर क्यों नहिं होय ॥५ ॥
अशुचि अस्थि पिंजर तन यह, चाम वसन बेढ्या घिन गेह।
चेतन राँचि तहाँ नित रहे, सो बिन ज्ञान गिलानि न गहै ॥६ ॥
मिथ्या अविरत जोग कषाय, ये आस्त्रव कारन समुदाय।
आस्रव कर्म बंध को हेत, बंध चतुरगति के दुख देत ॥७॥
समिति गुप्ति अनुपेहा धर्म, सहन परीषह संजम पर्म।
ये संवर कारन निर्दोष, संवर करे जीव को मोष ॥८ ॥
तप बल पूर्व कर्म खिर जाहिं, नये ज्ञान वश आवें नाहिं।
यही निर्जरा सुख दातार, भव कारन तारन निरधार ॥९ ॥
स्वयं सिद्ध त्रिभुवन थित जान, कटि कर धेरैं पुरुष संठान।
भ्रमत अनादि आतमा जहाँ, समकित बिन शिव होय न तहाँ ॥१० ॥
दुर्लभधर्म दशाङ्ग पवित्त, सुखदायक सहगामी नित्त।
दुर्गति परत यही कर गहै, देय सुरग शिव थानक यहै ॥११॥
सुलभ जीव को सब सुख सदा, नौ ग्रीवक ताँई संपदा।
बोध रतन दुर्लभ संसार, भव दरिद्र दुख मेटन हार ॥१२॥