बाहुबली भगवान् से मेरी बात हो गई | Bahubali Bhagavan Se Meri Bat Ho Gai

बाहुबली भगवान् से मेरी बात हो गई

-प्रो. वीरसागर जैन

मैं अभी गत माह श्रवणबेलगोला गया था । विन्ध्यगिरि पर विराजमान भगवान् बाहुबली की विश्वविख्यात प्रतिमा के दर्शन कर मैं अत्यन्त मग्न हो गया । मेरे परिणामों में गहन से गहनतर मग्नता होती चली गई। बहुत समय व्यतीत हो जाने पर भी मेरा वहाँ से लौटने का मन नहीं कर रहा था । अतः मैं वहीं बैठकर मेरे पास ‘समयसार’ था, उसका स्वाध्याय करने लग गया । पहली गाथा से आरम्भ कर जैसे ही मैं गाथा क्रमांक 29, 30 पर पहुँचा कि अचानक साक्षात् बाहुबली भगवान् प्रकट हो गये और बड़े हर्ष की बात कि मेरी उनसे बातचीत भी गई । मैं उस बातचीत को यहाँ अविकल रूप से सभी के हितार्थ लिखने की कोशिश करता हूँ।

सर्व प्रथम मैंने बाहुबली भगवान् को प्रणाम कर निवेदन किया - “हे भगवान् ! आजकल आपके लाखों-करोड़ों भक्त आपकी जय-जयकार कर रहे हैं, आप सभी का ध्यान रखकर कल्याण कीजिएगा ।”

भगवान् बोले - "क्या कहते हो ? लाखों-करोड़ों भक्त ? कहाँ हैं मेरे लाखों-करोड़ों भक्त ?”

मैं बोला :- “भगवन् ! आपका महामस्तकाभिषेक हो रहा है, और इस निमित्त प्रतिदिन लाखों की संख्या में भक्तगण आ रहे हैं। आपकी जय-जयकार करते हुए वे सब विन्ध्यगिरि पर चढ़ते हैं, आपके दर्शन करते हैं, आपका मस्तकाभिषेक करते हैं और आपकी पूजा भी करते हैं ।”

भगवान् बोले :- “लेकिन इन सबमें मेरे भक्त कहाँ हैं ? कितने हैं ?”

मैं साश्चर्य बोला - “भगवान् ! ये सब आपके ही तो भक्त हैं। यदि नहीं तो इतनी दूर-दूर से धनादि खर्च कर यहाँ क्यों आते ?”

भगवान् बोले - “देखो, तुम समयसार का स्वाध्याय कर रहे हो, क्या तुमको भी ये समझाना पड़ेगा कि ये सब लाखों-करोड़ों लोग किसके भक्त हैं? मेरे भक्त हैं या फिर किसी अन्य के भक्त हैं ? मेरी स्तुति कर रहे हैं या किसी अन्य की स्तुति कर रहे हैं ?”

मैंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया - “भगवन् ! मैं कुछ समझा नहीं, जरा स्पष्ट करके समझाइये।”

वे बोले - “पढ़ो समयसार की इन 28, 29, 30वी गाथाओं को, क्या लिखा है इनमें ?”

मैंने पढ़कर सुनाया उक्त गाथाओं को -

" इणमण्णं जीवादो देहं पोग्गलमयं थुणित्तु मुणी ।
मण्णदि हु संथुदो बंदिदो मए केवली भगवं ।।

तं णिच्छये ण जुज्जदि ण सरीरगुणा हि होंति केवलिणो।
केवलिगुणा थुणदि जो सो तच्चं केवलिं थुणदि ।।
णयरम्मि वण्णिदे जह ण वि रण्णो वण्णणा कदा होदि।
देहगुणे थुव्वंते ण केवलिगुणा थुदा होंति ।।"

अर्थ- जीव से भिन्न इस पुद्गलमय देह की स्तुति करके कोई ऐसा मानता है कि मैंने केवली भगवान् की स्तुति की और वन्दना की। परन्तु यह निश्चय से उचित नहीं है, क्योंकि शरीर के गुण केवली भगवान् के गुण नहीं होते । अतः जो केवली भगवान् के गुणों की स्तुति करता है वही परमार्थ से केवली भगवान् की स्तुति करता है। जैसे नगर का वर्णन करने पर राजा का वर्णन करने नहीं होता, उसी प्रकार देह के गुणों की स्तुति करने पर केवली भगवान् के गुणों की स्तुति नहीं होती ।

यहाँ मुझे रोककर भगवान् बोले - “अब तुम्हारी समझ में आया कुछ कि ये लाखों-करोड़ों लोग किसके भक्त हैं ? किसकी स्तुति करते हैं, मेरी अथवा शरीर की ?”

मैं दंग रह गया। मुख से निकला - “अहो भगवन् !”

अब उन्होंने ही बात आगे बढ़ाई- “देखो ! इनमें से अधिकांश लोग तो सिर्फ मूर्ति और उसकी कारीगरी के गीत गाकर ही रह जाते हैं, जबकि मेरा उसमें कुछ भी नहीं है। यदि आगे चलें तो भी बहुत लोग मुझे ‘बाहुबली’-‘बाहुबली’ कहते हैं। जबकि ‘बाहु’ तो शरीर की हैं, पुदगल की हैं। मैं शरीर ही नहीं हूँ तो ‘बाहुबली’ कैसे हो सकता हूँ ? मैं तो आत्मबली हूँ । पर्याय से भी देखो तो ज्ञानबली हूँ । परन्तु बाहुबली तो मैं कदापि नहीं हूँ।”

मैं क्या बोलता ? इस अमृतवर्षा में स्नान करता हुआ मैं स्वयं को धन्य-धन्य मान रहा था । उनकी ऐसी बातें सुनकर मेरे मुँह से बार-बार यही निकल रहा था - “वाह भगवन् ! वाह वाह !” और वे करुणा-विगलित हो मुझे समझाए चले जा रहे थे-

"अब तुम ही बताओ मेरे भक्त कितने हैं ? कितने हैं जो मुझ ‘आत्मबली’ को सही से जानते भी हैं ? मेरी भक्ति और स्तुति की बात तो दूर गई । अरे, बहुत से लोग तो मुझे युद्धों से जानते हैं, जो कि कषायों का खेल था और जो एकदम निन्द्य और हेय था। मैं उसे अपनी शान नहीं समझता, दोष ही समझता हूँ। मैंने उसे ही त्यागने के लिए संयम-तप और साधना अंगीकार की थी, परन्तु लोग हैं कि आज भी मुझे युद्धों से ही महान् मान रहे हैं।

अतः मेरा भक्त तो वस्तुतः वही है जो मुझे सही रूप में जानता हो; मुझे बाहुबली नहीं, आत्मबली मानता हो; मेरे अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य आदि गुणों को पहचानता हो; मेरी वीतराग निर्मल अवस्था की जय-जयकार करता हो । पाषाण और शरीरादि की स्तुति मेरी स्तुति कदापि नहीं हो सकती ।"

उक्त वार्ता से यह भलीभाँति स्पष्ट है कि यदि हमें वास्तव में बाहुबली भगवान् के भक्त बनना है, उनका वास्तविक स्तुति-गान करना है तो हमें उनके शरीरादि समस्त बाह्य संयोगों से ऊपर उठकर उनके असली आन्तरिक स्वरूप को समझना होगा । बहिर्मुखी दृष्टि जो अनादि काल से है, उसे छोड़कर अन्तरात्मा बनना होगा। जो मूर्ति या शरीरादि के गुणों की स्तुति करते हैं वे बहिरात्मा हैं और जो उनके निर्मल आत्मिक गुणों की स्तुति करते हैं, वे अन्तरात्मा हैं।

महाकवि धनंजय ने भी ‘विषापहार-स्तोत्र’ में इसी प्रकार की एक महत्त्वपूर्ण बात कही है -

“तस्यात्मजस्तस्य पितेति देव, त्वां येऽवगायन्ति कुलं प्रकाश्य ।
तेऽद्यापि नन्वाश्मनमित्यवश्यं पाणौ कृतं हेम पुनस्त्यजन्ति।।”

अर्थात् - हे जिनेन्द्रदेव ! जो लोग ‘आप उसके पुत्र हो’ या ‘उसके पिता हो’ इत्यादि प्रकार से आपके कुलादि की स्तुति करते हैं, वे वस्तुतः आपका अपमान करते हैं, और हाथ में आए हुए स्वर्ण को भी पत्थर समझकर त्याग देते हैं।

सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि देव-दर्शन को जैन दर्शन में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रिया माना गया है और उसका जीव के मुक्तिमार्ग में महान् योगदान होता है। वैसे तो प्रायः सभी लोग प्रतिदिन जिनेन्द्र-दर्शन करते हैं, पर वास्तव में सच्चा जिनेन्द्र-दर्शन वही करता है जो प्रतिमा में परमात्मा के और परमात्मा में निजात्मा के दर्शन करता है।