बह्म जिनदास कृत आदिनाथ रास : एक संक्षिप्त अध्ययन
-प्रो. वीरसागर जैन
आश्चर्य की बात है कि हिन्दी-साहित्य के इतिहास-ग्रन्थों में जहाँ कहीं भी ‘रास’ संज्ञक रचनाओं का उल्लेख मिलता है, प्रायः सर्वत्र ही गिने-चुने पाँच-सात रासों का ही नाम मिलता है, जबकि जैन कवियों ने हजारों की संख्या में ‘रास’ संज्ञक रचनाओं का प्रणयन किया है। हिन्दी-साहित्य के इतिहास-ग्रन्थों में उनका नामोल्लेख तक नहीं मिलता, समीक्षण और मूल्यांकन तो दूर की बात है।
इन्हीं जैन कवियों में ब्रह्म जिनदास का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। ब्रह्म जिनदास पन्द्रहवीं शताब्दी के एक ऐसे महाकवि हैं जिन्होंने लगभग सत्तर (70) कृतियाँ तैयार कर माँ भारती के भण्डार को भेंट की है। रास-संज्ञक रचनाओं के प्रणयन में तो ब्रह्म जिनदास का स्थान और भी विशिष्ट या अनुपम है। गुणवत्ता एवं परिमाण- दोनों ही दृष्टियों से इनका रास-साहित्य अद्भुत है। ब्रह्म जिनदास की रास-संज्ञक रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
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आदिनाथ रास 9. सुदर्शन रास
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राम रास 10. जीवंधरस्वामी रास
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हरिवंशपुराण रास 11. जंबूस्वामी रास
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अजित जिनसेन रास 12. श्रेणिक रास
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हनुमंत रास 13. धन्यकुमार रास
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सुकुमालस्वामी रास 14. श्रीपाल रास
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नागकुमार रास 15. यशोधर रास
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चारुदत्त रास 16. भविष्यदत्त रास
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अंबिकादेवी रास 31. मौड़ सप्तमी कथा रास
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रोहिणी रास 32. निर्दोष सत्तमी कथा रास
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रात्रिभोजन रास 33. अक्षय दशमी रास
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गौतमस्वामी रास 34. दशलक्षण व्रत कथा रास
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भद्रबाहु रास 35. सोलह कारण व्रत रास
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समकित अष्टांग कथा रास 36. परमहंस रास
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सासरवासा को रास 37. प्रतिमा ग्यारह की रास 24. होली रास
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धर्मपरीक्षा रास
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बंकचूल रास
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पुष्पांजलि रास
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अनंतव्रत रास
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धनपाल रास
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चंदनषष्ठी कथा रास
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चौदह गुणस्थानक रास
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अठावीस मूलगुण रास
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हादशानुप्रेक्षा रास
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कर्मविपाक रास
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समाकित मिथ्यात रास
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पंचपरमेष्ठी गुणवर्णन रास
यहाँ इनमें से ‘आदिनाथरास’ का संक्षिप्त अध्ययन करने का प्रयास किया जाता है।
नामकरण-
इस कृति का उल्लेख तीन नामों से प्राप्त होता है- 1. अदिनाथ रास, 2. आदिनाथपुराण रास एवं 3. आदिपुराण रास। परन्तु इसका वास्तविक नाम ‘आदिनाथ रास’ ही है, जैसा कि कवि ने स्वयं भी सूचित किया है तथा ग्रन्थ की अन्तिम प्रशस्ति में भी स्पष्ट लिखा है- ‘इति श्री आदिनाथ रास’।
आधार-ग्रन्थ-
प्रस्तुत कृति ‘आदिनाथ रास’ का मूल आधार-ग्रन्थ या उपजीव्य ग्रन्थ संस्कृत जैन महाकवि आचार्य जिनसेन द्वारा रचित ‘आदिपुराण’ है। 47 पर्वों में विभाजित यह ग्रन्थ भारतीय ज्ञानपीठ जैसी स्तरीय प्रकाशन संस्था से अनेक बार प्रकाशित हो चुका है। यह ग्रन्थ जैनधर्म-दर्शन-संस्कृति का विशाल रत्नाकर माना जाता है। अनेक हिन्दी-कवियों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएँ या वचनिकाएं लिखी हैं तथा इसके उपाख्यानों को लेकर स्वतन्त्र कृतियों का भी निर्माण किया है।
वैसे तो ‘आदिनाथ’ पर जैनसंस्कृति में ही नहीं, समूची विश्व संस्कृति में ही अनगिनत ग्रन्थ लिखे गये हैं, क्योंकि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को विश्व की प्रायः सभी संस्कृतियाँ किसी-न-किसी रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ आराध्य स्वीकार करती हैं। कोई उन्हें ‘ब्रह्मा’ कहता है, कोई ‘प्रजापति’, कोई 'महादेव, कोई ‘बाबा आदम’, कोई ‘रेशेफ’ और कोई ‘बुल गॉड’ इत्यादि। परन्तु ‘आदिनाथ रास’ का मूल आधार-ग्रन्थ आचार्य जिनसेन प्रणीत ‘आदिपुराण’ ही है, क्योंकि इसी कृति में आदिनाथ का प्रामाणिक एवं सर्वांगीण विशद विवेचन उपलब्ध होता है। आदिपुराण पर आधारित होने के कारण ही कहीं-कहीं इस कृति का उल्लेख ‘आदिपुराण रास’ नाम से भी मिलता है।
रचना का प्रयोजन -
‘आदिनाथ रास’ की रचना का प्रयोजन सरल-सुबोध हिन्दी भाषा में अधिकाधिक लोगों को आदिनाथ भगवान् के जीवन-चरित्र का ज्ञान कराना है। ब्रह्म जिनदास ने स्वयं कहा है कि जिसप्रकार बालक कठोर नारियल का उपयोग नहीं कर सकता, लेकिन उसे साफ करके उसकी गिरी उसे दी जाये तो वह बड़े आनन्द से उसका स्वाद लेता है, उसी प्रकार देश भाषा में कही गई बात सर्वजनसुलभ हो जाती है-
"कठिन नारियर ने दीजि बालक हाथि, ते स्वाद न जाणे।
छोल्या केल्यां द्राख दीजे, ते गुण बहु माणे ॥“1
ग्रन्थ की पाण्डुलिपि -
‘आदिनाथ रास’ अद्यावधि अप्रकाशित है। उसका कुछ अंश डॉ. प्रेमचन्द रांवका ने अपनी कृति ‘महाकवि ब्रह्म जिनदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ में प्रकाशित किया है, परन्तु वह अपर्याप्त है। किसी सुधी विद्वान् को इस कृति का व्यवस्थित संपादन करके प्रकाशन का प्रयल करना चाहिए। इस ग्रन्थ की पाण्डुलिपियाँ उदयपुर, जयपुर, आमेर आदि अनेक स्थानों पर उपलब्ध होती हैं। उदयपुर में उपलब्ध पाण्डुलिपि वहाँ के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन खण्डेवाल बीसपंथ मन्दिर, मण्डी की नाल में पाई जाती है।
ग्रन्थ का सामान्य परिचय -
‘आदिनाथ रास’ ब्रह्म जिनदास की एक बृहद् रचना है जो कुल मिलाकर 3458 श्लोक-प्रमाण है। इसमें प्रारम्भ में आदिनाथ के नौ पूर्व भवों का तथा उसके निमित्त से 14 कुलकरों एवं भोगभूमि आदि का सुन्दर विवेचन किया है। उसके बाद अयोध्या नगरी एवं नाभिराय-मरुदेवी के वैभव का वर्णन है। एक रात्रि में महारानी मरुदेवी सोलह शुभ स्वप्न देखती हैं और प्रातः नाभिराय से उनका फल पूछती हैं। इस पर नाभिराय प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के जन्म लेने की सुखद बात कहते हैं-
नाभि राजा तब वोलिया ए, मधुरिम सुललित वाणि तो।
फल सुणो राणी निरमला ए, सपन तणा सुजाणि तो॥
स्वपन फलि अति रूवडो, पुत्र होसे तुम्ह चंग।
तीर्थकर रलीयावणो, त्रिभुवन मांहि उत्तंग॥
प्रथम जिणेसर निरमलो, आदिनाथ गुणवंत।
सुरनर खेचर लगे, स्वामीय अति जयवंत॥2
‘आदिनाथ रास’ का यह स्थल अत्यन्त ममस्पर्शी है। इसमें नाभिराय प्रत्येक स्वप्न का पृथक्-पृथक् फल सुनाकर मरुदेवी के साथ हर्ष-विभोर हो उठते हैं। उसके बाद इन्द्र की आज्ञा से देवियाँ तीर्थंकर माता की सेवा करती हैं, कुबेर रत्नवृष्टि करता है, सर्वत्र आनन्द छा जाता है। चैत्र कृष्णा नवमी के दिन शुभ मुहूर्त में आदिनाथ का जन्म होता है। देवता आकर बड़े ही उत्साह से जन्म कल्याणक मनाते हैं। बालक का नाम ‘आदि जिनेश्वर’ रखा जाता है-
आदि जिणेसर नाम दीयो ए, देव सजन मिली जाणि।
आदि जुगादि स्वामि अवतर्या ए, तेह भणि सार्थक नाम।।
दश अतिशय स्वामि रूवडा ए, जिणवर सहज सभाव।
स्वेद मल थका बेगला ए, स्रोणित खीर समानि॥
सम चौरस अतिरूवडो ए, आदि संस्थान वखाणि।
संहनन पहिलो अति बलो ए, वज्र वृषभ गुण खाणि।3
आदिकुमार के युवा होने पर कच्छ-महाकच्छ की पुत्री सुनन्दा एवं सुमंगला से उनका विवाह हुआ। बाद में भरत, बाहुबली आदि 101 पुत्रों एवं ब्राह्मी, सुन्दरी नामक दो पुत्रियों का जन्म हुआ। आदि जिनेश्वर ने ब्राह्मी को अक्षर लिपि और सुन्दरी को अंक लिपि का ज्ञान दिया। भरत आदि पुत्रों को भी विविध कलाओं एवं शास्त्रों का ज्ञान कराया।
आदि जिनेश्वर जन्म से ही अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उनके पिता नाभिराय भी उनसे परामर्श लिया करते थे। भोगभूमि की व्यवस्था समाप्त होने एवं कर्मभूमि की व्यवस्था आरम्भ होने पर जब प्रजा में बड़ा संकट खड़ा हो गया तो आदिनाथ ने ही प्रजा का समुचित मार्गदर्शन कर उसे सुखी किया तथा सभी को असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या की शिक्षा देकर षट्कर्म की स्थापना की। कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र वर्ग की रचना भी की। इससे प्रसन्न होकर प्रजा ने उनकी प्रजापति, शंकर आदि नामों से उनकी पूजा की-
"जे जे काम करे जैसु, ते ते नाम हुआ सार।
सोनु घड़े सोनी हुवा, कास घडी ते कंसार॥
षटु कर्म थाप्या व्यवहार तणा ए, षटु कर्म धरम वीचारतों।
अशुभ कम शुभ करम जीव ए, बांधे छौडे अवार तो॥
धरमाधरमे प्रकासीया ए, स्वामीय आदि जिणंद तो।
आदि ब्रह्मातमा वामीया ए, स्वामीय परमाणंद तो॥
प्रजालोक प्रति पालिया ए, सुख दियो महंत तो।
प्रजापति तेह भणी हुवा ए, संकर नाम जयवंत तो॥4
एक दिन आदिनाथ की सभा में नीलांजना नृत्य कर रही थी कि उसकी आयु पूर्ण हो गई, उससे आदिनाथ को वैराग्य हो गया और उन्होंने अपने बड़े पुत्र भरत को अयोध्या का राज्य सौंपकर निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण कर ली-
“ॐ नमः सिद्धेभ्यः” कह्यौ गुणधार, हृदय कमलि गुण धारिया सार।
‘जथाजात रूप’ धरियो चंग, समता भाव लीयो उत्तंग॥
‘दिगंबर’ हुवा प्रथम जिनदेव, विभुवन भवीयण करे जिन सेव।
अनुपम रूप दीसे जयवंत, जय जयकार स्वपन करे संत॥5 निरन्तर ६ माह तक आदिनाथ कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानस्थ रहे। उनके पास जन्मजात शत्रु भी अपना वैरभाव छोड़कर प्रेम से रहने लगे और वनस्पतियाँ भी स्वतः ही पुष्पित-पल्लवित हो गई -
तीहां वनफलियो बहु फलें, वैरीय तणा मद गले।
वैर छांडी सवे एक हुवए, सही ए॥
हरण सींघ वाघ गाय ए, मौर भुजंग मौहयाए।
आवइ ए प्रीति करि तिहां ए, अतिघणी ए सही ए॥⁶
इसके बाद वे छः माह तक आहार हेतु विहार करते रहे, पर लोग आहार की विधि नहीं जानते थे, अतः उन्हें आहार नहीं मिला। वैशाख शुक्ला तृतीया को हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस ने जातिस्मरण द्वारा आहार की विधि को जाना और उन्हें इक्षुरस का पान कराया। तभी से यह पावन दिन अक्षयतृतीया के रूप में विख्यात हो गया।
आगे चलकर आदिनाथ ने केवलज्ञान को प्राप्त किया। देवताओं ने धर्मसभा की रचना की। भगवान् ने सभी प्राणियों को विस्तारपूर्वक धर्म का उपदेश दिया।
अन्त में योगनिरोध करके कैलाश पर्वत से उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया।
यही इस कृति की मुख्य कथावस्तु है, किन्तु प्रसंगवश इसमें भरत-बाहुबली के युद्ध एवं जय-पराजय आदि का भी वर्णन हुआ है।
मंगलाचरण -
‘आदिनाथ रास’ का प्रारम्भ मंगलाचरण से हुआ है, जिसमें कवि ने आदि जिनेश्वर, सरस्वती माता एवं अपने गुरु सकलकीर्ति भुवनकीर्ति को नमस्कार किया है -
'श्री आदिजिणेसवर आदि जिणेसर पाय प्रममेसुं।।
सरसति स्वामिणी वलि तवउं, बुधि सार हूँ मागुं निरमल।
श्री सकलकीरति पाय प्रणमीनि मुनि भुवनकीरति गुरु वांदु सोहजल।।7
रस-निरूपण -
‘आदिनाथ रास’ रस-निरूपण और भाव-विवेचन की दृष्टि से एक उत्कृष्ट कृति सिद्ध होती है। इसमें शृंगार, वात्सल्य, वीर, रौद्र आदि अनेक रसों का सुन्दर वर्णन हुआ है। उदाहरणार्थ कतिपय स्थल द्रष्टव्य है-
(क) शृंगार रस -
आंगोपांग मोडे घणाए, हाव-भाव करे राग तो।
मन रीझे सभा तणो ए, रूध्या इन्दीय भाग तो।।
नीलंजस पात्र जाणीए, नाचे सरस अपार तो।
हाव-भाव रचना करए, मोह तणो विस्तार तो।।⁸
(ख) वात्सल्य रस -
चन्द्र कला जिवमाधीयुए, खेलइ सरस अपार।
मही मण्डल परि रीषता ए, जैसो मेदनि हार।।
हलु-हलु चाले सुंदरो ए, पग मूके जीम फूल।
काला वयण सुहावणा, सुललित बोलइ चंग।।9
(ग) रौद्र रस -
तव कोप्यो बाहुबलि राज, दूत जाउ तम्हे निज राजि।
बल जोउं तम्हे स्वामि तणो, बलि वलि वश्वाणो तम्हे घणो।।10
(घ) वीर रस -
वीर रस का स्थायी भाव ‘उत्साह’ है; जो कभी युद्ध के लिए, कभी दान के लिए, कभी दया के लिए, और कभी धर्म के लिए प्रकट हुआ है। ‘आदिनाथ रास’ के नायक में चारों प्रकार के वीर (युद्ध वीर, दानवीर, दया वीर धर्म वीर) के गुण मिल जाते हैं। अपने गृहस्थ जीवन में राजकुमार भरत-बाहुबली के युद्धों में वीर रस का निरूपण मिलता है। संयम मार्ग पर अग्रसर होना और आने वाले उपसर्ग एवं परिषहों को बाहदुरी से सहन करना भी वीरता है। प्राणि-मात्र के प्रति दया-भाव है यह दयावीरता है | राजा श्रेयांस आदिनाथ को इक्षुरस का आहार दान देते हैं तब वे ‘दानवीर’ बन जाते हैं¹¹ - (पृष्ठ 172)
वस्तु-वर्णन -
वस्तु-वर्णन की दृष्टि से भी ‘आदिनाथ-रास’ एक बेजोड कृति सिद्ध होती है । जन्म-वर्णन, नगर-वर्णन, सभा-वर्णन, वैराग्य-वर्णन, मोक्ष-वर्णन आदि के अनेक मनोरम दृश्य इस कृति में यत्र-तत्र उपलब्ध होते हैं। यथा-
(क) जन्मवर्णन -
मास नव हुवा गुणवंत, सात दिवस अधिका जयवंत।
चैत्र मास अधारा पाख, नवमी दिन कहीए गुणभास ॥
उत्तराषाढ नक्षत्र सविचार, ब्रह्म जोग कहीए गुणधार।
सुखे जन्म हुवो आनन्द, वाद्यो हरष तणा तीहां कंद।
सयल सजन आनंदीया, नीपनो जय-जयकार ।
जनम हुवो जिनवर तणो, प्रथम तीर्थंकर सार।।
दश दिशा हुई निरमली, सुगंध पवन झलकंत।
अंबर दीसे निरमलो, जसो मुनिवर चिंत।।
कुसुम वृष्टि हुई निरमली, गंधोदक बलि सार।
दुंदुभि बाजे सुरतणी, धवल मंगल सविचार ॥
तिन्नि ज्ञान करि लंकर्या, कंचन वरण सरीर।
रूपे मनमथ जीतीयो, प्रथम तीर्थकर धीर।।12
(ख) वैराग्य वर्णन -
"नीलांजसा तेणो खूटो आयु, मरण पामी ते सुंदरीए।
क्षीण मांहि जीव गयो बीजी ठामि, काले गई जम मंदिरीए॥
तब उपनो स्वामी वैराग्य, संसार सरीर भोग परिहरइ ए।
जो जो एह तणो रूप सौभाग्य, सरीर सहित मटी गयो ए।।…
धिग धिग ए संसार असार, थिर न दीसे मस्यो ए।
चिहुं गति मांहि सुख नवि ढोर, सयल दीसे क्षण भंगुरम् ।।
सरीर चपल जीम मेघ पटल, जल बुबुडा जीम जाणीयु ए।
धन यौवन उतावलो जाणि, नदी पुर जीम वनिय ए।।13
चरित्र-चित्रण
‘आदिनाथ राम’ मे कथानायक आदिनाथ एवं उनके माता-पिता मरुदेवी-नाभिराय, उनके पुत्र भरत-बाहुवली -इन पाँच पात्रों का विशेष रूप से चरित्र-चित्रण प्रभावशाली रूप से अंकित हुआ है। यद्यपि ब्रह्मी-सुन्दरी आदि अन्य पात्रों का भी यथोचित चरित्र-चित्रण मिलता ही है। चरित्र-चित्रण के माध्यम से ही कवि ने अपने कथानक के उद्देश्य को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करने में सफलता प्राप्त की है। चरित्र-चित्रण की कुशलता के कारण ‘आदिनाथ रास’ एक चरित्र-प्रधान काव्य ही बन गया है। आदिनाथ की उभयलोक-निपुणता पाठकों को अन्दर तक से प्रभावित कर देती है। कवि ने आदिनाथ के शारीरिक सौन्दर्य का भी अद्भुत वर्णन किया है। सौधर्म इन्द्र भी उनके शारीरिक सौन्दर्य को देखने के लिए सहस्र नेत्र धारण करता है। आदिनाथ का शरीर जन्म से ही दस अतिशय सहित है, उसमे स्वेद-मलादि नहीं होते। रक्त भी दूध के समान श्वेत है -
"दश अतिशय स्वामि रूवडा ए, सु जिणवर सहज सभाव।
स्वेद मल थका बेगला ए, सु सोणित खीर समानि ।14
प्रकृति-चित्रण-
‘आदिनाथ रास’ में प्रसंग पाकर प्रकृति-चित्रण भी अनेक स्थानों पर हुआ है, जो कहीं आलम्बन रूप में है तो कहीं उद्दीपन रूप में। आलम्बन रूप में प्रकृति का वर्णन दृष्टव्य है-
"वनस्पति अवकालि फलि, फल फूल सुरंग।
कोइल करे टडूंकडा, मोर लवे उत्तंग ।।
भमरा रण झण करे, सुआ करे कलि रेव ।
बहके परिमल अति धणो, सवे बहु देव।।"15
इसके अतिरिक्त कवि ने प्रकृति से उपमानों को भी ग्रहण किया है | यथा -
"बीज चन्द्र जिम वृद्धि करइ ए।
चन्द्र कला जिम वाधीयु ए।16
कहीं-कहीं अलंकारों के रूप में भी प्रकृति-चित्रण हुआ है -
"ज्ञान दिवाकर अगीयो, भवियण कमल विलास।
भावना परिमल गहगहे, आनंद निरमल वास ।।17
प्रतिपाद्य -
‘आदिनाथ रास’ में मुख्य कथावस्तु के अतिरिक्त अथवा उसके ब्याज से धर्म, दर्शन, संस्कृति, समाज, राजनीति आदि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का प्रतिपादन भी हुआ है जो अति संक्षेप में इस प्रकार है-
(क) दर्शन - ‘आदिनाथ रास’ मूलतः साहित्यिक कृति होते हुए भी जैनदर्शन का एक मुख्य ग्रन्थ भी है, अतः उसमें जैनदर्शन की मूल विचारधारा का प्रतिपादन भी हुआ है। कथानायक आदिनाथ को जब केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है तब कवि ने उनके मुख से प्राणिमात्र को जो दर्शनिक उपदेश दिलाया है उसमें जैनदर्शन के सात तत्त्व, नौ पदार्थ, षट्द्रव्य, चार अनुयोग, सम्यग्दर्शन, श्रावकाचार आदि विषयों का वर्णन किया है। जीवादि सप्त तत्त्वों का सच्चा श्रद्धान ही सम्यक्दर्शन है | उन सप्त तत्त्वों के नाम इस प्रकार हैं -
'जीव अजीव आश्रव बन्ध जाणो, संवरनिर्जरा मोक्ष बखाणो।
तत्त्व सात ए मानो।।
पाप पुन्य सहित सविचार, पदारथ कहीए गुणधार।
इम जाणो तम्हे सार।।18
‘आदिनाथ रास’ में उक्त सभी तत्त्वों का पृथक्-पृथक् वर्णन भी हुआ है | उदाहरणार्थ निर्जरा तत्त्व का वर्णन देखिये -
"तप जप ध्यान बले कर्म बालि, करम तणी निर्जरा सविचारि ।
करम तणो अपार ।। "19
इसीप्रकार जैनदर्शन के अनेक दार्शनिक विषयों का इस कृति में प्रतिपादन यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होता है। विशेषता यही है कि इन वर्णनों से कृति की साहित्यिकता में कोई कमी नहीं आई।
(ख) संस्कृति- ‘आदिनाथ रास’ में प्राचीन भारतीय संस्कृति का मनोरम चित्रण हुआ है। गर्भ, जन्म, विवाह, वर्ण-व्यवस्था, शृंगार, वस्त्राभूषण, कला, नृत्य, संगीत, युद्ध, आदि अनेक सामाजिक प्रसंगों का इस कृति में सजीव चित्रण हुआ है। कथानायक आदि जिनेश्वर का जन्मोत्सव और नामकरण समारोह देवों द्वारा भी मनाया गया है। आदिजिनेश्वर ने अपने पुत्र-पुत्रियों को अनेक विद्याओं और कलाओं का ज्ञान कराया। चौसठ विद्याओं एवं बहत्तर कलाओं की शिक्षा तभी से प्रारम्भ होती है। आदिजिनेश्वर ने प्रजा को भी असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य एवं शिल्प इन षट्कर्मों की शिक्षा दी तथा क्रमानुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र -इन चार वर्णों की स्थापना की। आदिनाथ के विवाह-प्रसंग पर और नीलांजना के नृत्य वाले प्रसंग पर तत्कालीन समाज की नृत्य-संगीत में अभिरुचि का परिज्ञान होता है। भरत-बाहुबलि का युद्ध तत्कालीन अहिंसक युद्ध-संस्कृति का चित्रण करता है। इसीप्रकार अन्य भी अनेक सांस्कृतिक तत्त्व इस कृति में यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते हैं।
कला पक्ष -
‘आदिनाथ रास’ का न केवल भाव पक्ष, अपितु कलापक्ष भी बेजोड़ है। उसकी भाषा-शैली अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ सिद्ध होती है।
(क) भाषा - ‘आदिनाथ रास’ की भाषा ब्रज- मिश्रित राजस्थानी है जिसे कवि ने ‘देस भाषा’ कहा है। कवि का उद्देश्य है कि संस्कृत-कवियों की उत्कृष्ट बात को सरल-सुबोध भाषा में इस प्रकार कहा जाये कि वह साधारण जनता तक सहजता से पहुंच जाये।
(ख) गुण - ‘आदिनाथ रास’ की भाषा में अवसर के अनुकूल माधुर्य, प्रसाद एवं ओज गुणों का भी प्रयोग हुआ है। उदाहरणार्थ माधुर्य गुण का एक प्रयोग दृष्टव्य है -
"चन्द्रकला जिम वाधीयु ए, खेलइ सरस अपार।
मही मंडल परि रिषता ए, जैसो भेद निहार।।
हलु हलु चाले सुंदरो ए, पग मुके जीम फूल।
काला वयण सुहावणा, सुललित बोलइ चंग।।20
(ग) शब्द-भण्डार - ‘आदिनाथ रास’ का शब्द-भण्डार भी बड़ा विशाल है। तत्सम, तद्भव एवं देशज शब्दों के प्रयोग में तो कवि अत्यन्त कुशल प्रतीत होता है। कृति के तद्भव शब्द प्राकृत-अपभ्रंश की यात्रा करके आये लगते हैं। यथा-
"सजल सयल आनंदीया, नीपनो जय-जयकार।
जनम हुवो जिणवर तणो, प्रथम तीर्थकर सार।
तिन्नि ज्ञान करि लंकरया, कंचन वरण सरीर।
रूपे मनमथ जीतियौ, प्रथम तीर्थकर धीर।। "21
(घ) लोकोक्ति-मुहावरे - ‘आदिनाथ रास’ में भावों की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए अनेक लोकोक्ति-मुहावरों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। यथा -
"सरीर चपल जीम मेष पटल।
जल बुदुडा जीम जाणीय ए॥ "22 (ड़) सूक्तियाँ - ‘आदिनाथ रास’ की भाषा इतनी सुगठित है कि उसमें सूक्तियों का भी सहज निर्माण हो गया है। यथा -
"सीयल सरीरह आभरण, सोने भारी अंग।
मुख मंडण सांचो वयण, विण तंबोल हरंग।।
जिहां धर्म तिहां जय, जिहां पाप तिहां विणास तो।
इम जाणी तम्हे धर्म करो, कहे ब्रह्मचारी जिणदास तो ।।23
(च) अलंकार - ‘आदिनाथ रास’ में बलात् तो अलंकारो का प्रयोग नहीं है, लेकिन सहजतापूर्वक अनेक अलंकार प्रयुक्त हो गये हैं। यथा-
पुनरुक्ति - हलु हलु चाले सुंदरो ए, सु पग मूके जिम फूल।24
उत्प्रेक्षा - रूप जोवन अति रूवडो ए, जाणइ बीजो इन्द्र।25
एक जिहवा किम बोलीया ए, उपमा रहीत जिणंद।।
उदाहरण - पुत्र करी अति सोहीया, आदि जिणंद गुणवंत तो।
जीम चन्द्र नक्षत्र करि, पूनिम तणो जयवंत तो।।26
विरोधाभास - जिम जिम दान घटे रूबडो, तिम तिम परमाणंद।
श्रेयांस मनि बीपजि, वाधे धरमह कंध ।।27
उपसंहार -
इसप्रकार हम देखते हैं कि ब्रह्म जिनदास द्वारा रचित ‘आदिनाथ रास’ भाव एवं कला दोनों ही दृष्टियों से एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति सिद्ध होती है, जिसे हिन्दी-साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में समुचित स्थान उपलब्ध होना चाहिए, ताकि उसका अध्ययन-अध्यापन गतिमान हो सके।
कृतज्ञता-
प्रस्तुत निबन्ध को तैयार करने में मुझे डॉ. प्रेमचन्द रॉवका के ग्रन्थ ‘महाकवि ब्रह्म जिनदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ से बड़ी सहायता प्राप्त हुई है, एतदर्थ मैं उनका कृतज्ञ हूँ।
पाद-टिप्पणी
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आदिनाथ रास, छन्द 3
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आदिनाथ रास, 26 दूहा 1, 2
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आदिनाथ रास, भास मलहंताडांनी, 5
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आदिनाथ रास, दूहा, भास रासनी
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आदिनाथ रास, छन्द 27, 28 6. आदिनाथ रास, भास सहीनी, 9
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आदिनाथ रास, मंगलाचरण
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आदिनाथ रास, भास रासनी, 22, 23
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आदिनाथ रास, दूहा 6-7
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आदिनाथ रास, भास चौपाईनी 6
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आदिनाथ रास, भास रासनी 25
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आदिनाथ रास, भास चैपाईनी 29 - 30 और दूहा 1-4
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आदिनाथ रास, भास जसोघरनी 15-17
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आदिनाथ रास, भास मलहंताडांनी, 6
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आदिनाथ रास, दूहा - 1 व 2
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आदिनाथ रास, दूहा 3
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आदिनाथ रास, दूहा 4
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आदिनाथ रास, चौपाई 10-11
-
आदिनाथ रास, भास तीन चौबीसीनी, 25
-
आदिनाथ रास, 6-7
-
आदिनाथ रास, 1-4
-
आदिनाथ रास, भास रासनी, 14
-
आदिनाथ रास, दूहा 1
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आदिनाथ रास, भास रासनी, 3
-
आदिनाथ रास, भास रासनी,
-
आदिनाथ रास, भास रासनी,
-
आदिनाथ रास, भास रासनी,