बहिन-भाई संवाद | Bahin-Bhai Samvad

बहिन –
सदियों की दुःख भरी गाथा, भैया मैं तुम्हें सुनाती हूँ।
पड़ विषयों के धोखे में मैं, भव-भव के दुःख उठाती हूँ ।। 1 ।।

अब तुमसे यह अरदास करूँ, मुझको कोई मार्ग बता दीजे ।
इन दुःखों से छुटकारा हो, मुक्ति की राह दिखा दीजे ।। 2 ।।

भैया-
भगिनी एक बात कहूँ तुझसे, यह दुःख नहिं भ्रम तेरा है।
यह बाह्य परिग्रह ना कुछ भी, इसने ना तुमको घेरा है ।। 3 ।।

जो क्षण-क्षण राग उठे तुमको, उसकी तुम दिशा बदल देना।
निज को पाने के लिए अरे ! तन-मन-धन अर्पण कर देना ।। 4 ।।

बहिन-
यह बात आपकी शिरोधार्य, पर भैया इतना कहती हूँ।
संस्कार पड़े जो सदियों के, उनमें ही पुनः अटकती हूँ।। 5 ।।

खुद राग करूँ, उसे पर का कहूँ, यह बात हृदय में खटकती है।
दुःख का कारण है राग मेरा, इतने तक दृष्टि जाती है ।। 6 ।।

भैया -
संस्कार कहाँ हैं सदियों के, पर्यायें सदा क्षणिक होती।
तुम तो हो शाश्वत ध्रुव अखण्ड, फिर तुमसे वह कैसे जुड़ती ।। 7 ।।

यदि राग जीव का होता तो, सिद्धों से दूर हुआ कैसे।
फिर कभी तीव्र और कभी मंद, ये परिपाटी दिखती कैसे ।। 8 ।।

बहिन-
नहीं अपने प्रभु को देखा है, पर उनकी याद सताती है।
आत्मा को पढ़ने-सुनने से तो क्षणिक शान्ति ही आती है ।। 9 ।।

स्थाई सुख मिले मुझको, व्यवधान बीच के टूटे सब।
सिद्धों सम पूर्ण निराकुल हो, ज्ञाता-दृष्टा हो देखूँ सब ।। 10 ।।

भैया-
तेरा प्रभु तो तेरे में है, चंचलता को कुछ कम कीजे।
निर्मल सुखमय शाश्वत स्वभाव उसका ही ध्यान सदा दीजे ।। 11 ।।

संकल्प-विकल्प तजो झूठे, थिरता स्वभाव में ही कीजे।
नहीं करने की कुछ चाह रहे, बस चेतन धन को पा लीजे ।। 12 ।।

बहिन-
है बात आपकी परम सत्य, सच्चे सुख का है मार्ग यही।
इसके चिंतन से पुण्य बंधे, अपनाने से हो मोक्ष मही ।। 13 ।।

अब अन्य विकल्पों को तज कर, इस पर तो अमल करूँगी मैं।
पर मोक्ष में सुख मिले कैसा ? इतना अब और सुनूँगी मैं ।। 14 ।।

भैया-
इन्द्रियातीत है सुख वहाँ, शब्दों से वर्णन नहीं होवे।
सब जग का सुख इकट्ठा हो, उसकी तुलना में कम होवे ।। 15 ।।

बस इतना कहना काफी है, उसको क्षण भर भी जो देखे।
सब जग की इच्छा त्यागे वह प्रतिक्षण अनिमेष उसे पेखे ।। 16 ।।

बहिन-
है धन्य-धन्य जिनधर्म, जिसे सुनने से अनुपम शांति मिली।
आत्मा साक्षात् झलकता है, मन की सारी ही भ्रान्ति मिटी ।। 17 ।।

निश्चय मुझको हो गया प्रभु, पाने से तृप्ति होवेगी।
दुःख का अस्तित्व नहीं होगा, परिणति निज में थिर होवेगी ।। 18 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह