चौपाई
विषयारम्भ परिग्रह त्यागी, ज्ञान-ध्यान में परिणति पागी।
वे मुनिवर सबको सुखदाई, परिषहजय की करूँ बड़ाई ।।
१. क्षुधा परीषह
भूख लगे आहार न पाय, अनाहारी चिद्रूप लखाय।
ज्ञानामृत भोजी मुनिराय, सहें परीषह शिवसुखदाय ।।
२. तृषा परीषह
तृषा सतावे कोपे पित्त, नहीं दीनता लावें चित्त।
भेदज्ञान करते मुनिराय, समता रस से तृप्त रहाय ॥
३. शीत परीषह
अस्पर्शी ज्ञायक भगवान्, ध्यावें साधु परम सुखदान।
शीत परीषह से नहीं डरें, निरावरण निर्भय नित रहें।
४. उष्ण परीषह
रहते आत्म गुफा के माँहिं, मोह ताप जिनके उर नाहिं।
सहज शान्त समता के धनी, उष्ण परीषह जीतें मुनी ॥
५. डंसमशक परीषह
डंसमशक जब तन में लगें, ज्ञानरूप में मुनिवर पगें।
बहे ज्ञानधारा उर माँहिं, परीषह में उपयोग सु नाहिं ॥
६. नग्न परीषह
निर्विकार शोभे परिणाम, यथाजात तनरूप ललाम।
ध्यावें अपने को अशरीर, नग्न परीषह जीतें वीर ॥
७. अरति परीषह
पापोदय का कार्य विचार, वर्ते सहजहि जाननहार।
अरति तजैं संयम दृढ़ रहैं, ते मुनि कर्म कालिमा दहैं।
८. स्त्री परीषह
स्वानुभूति रमणी में तृप्त, करे न नारी चित संतप्त।
ब्रह्मचर्य से चिगें न लेश, परमधीर मुनिवर जगतेश ॥
९. चर्या परीषह
अनियत वासी करें विहार, ईर्या समिति सहित अविकार।
चर्या परीषह सों नहिं डरें, मुक्ति मार्ग जग में विस्तरें ॥
१०. आसन परीषह
अंतर समता से नहिं चिगें, बाहर आसन से नहिं डिगें।
धनि मर्यादा पालन-हार, धर्मतीर्थ विस्तारन-हार ।।
११. शयन परीषह
भूमि काष्ठ पाषाण पै सोवें, सावधान नहिं गाफिल होवें।
निद्रा अल्प न करवट फेरें, अन्तर्मुख हो निजपद हेरें ।।
१२. आक्रोश परीषह
सुन दुर्वचन क्षमा उर लावें, ज्ञानी मुनि आक्रोश न आवें।
धन्य-धन्य सबके उपकारी, वन्दनीय चैतन्य-विहारी ।।
१३. बध-बंधन परीषह
पापोदय में कोई मारे, बांधे अग्नि में परजारे।
तहाँ तपोधन क्षोभ न करते, ध्यान विपाकविचय वे करते ।।
१४. याचना परीषह
निज में ही संतुष्ट यतीश्वर, पर की चाह न करते गुरुवर।
नहीं औषधि भी वे याचें, परम विरक्त शान्त रस राचें ॥
१५. अलाभ परीषह
पर से लाभ न हानि मानें, सहज पूर्ण प्रभुता पहिचानें।
पर-अलाभ प्रति सहज उपेक्षा, भावें वे द्वादश अनुप्रेक्षा ॥
१६. रोग परीषह
रोगादिक देहाश्रित जानें, कायर होकर दुःख नहिं मानें।
तप से कर्म निर्जरित करते, क्लेश जगत् के भी वे हरते ॥
१७. तृणस्पर्श परीषह
काँटे आदि पैर में लगते, उड़कर, आँखों में भी चुभते।
फिर भी पर-सहाय नहीं चाहें, सहज ज्ञानसिन्धु अवगाहें ॥
१८. मल परीषह
आजीवन स्नान न करते, मलिन देह को भिन्न सु लखते।
निर्मल आतम सदा निहारें, निर्मल सहज परिणति धारें ॥
१९. सत्कार-पुरस्कार परीषह
नहीं सत्कार चाहें मुनि-ज्ञानी, निजपर रीति भिन्न पहिचानी।
तिरस्कार नहिं करें किसी का, प्रभुतारूप लखें सबही का ।।
२०. प्रज्ञा परीषह
ज्ञान विशिष्ट उग्र तप धारें, वादी देख हार स्वीकारें।
महाविनय मुनि तदपि सु धारें, निजरत्नत्रय निधि विस्तारें ॥
२१. अज्ञान परीषह
जब क्षयोपशम मंद जु होवे, शक्ति ज्ञान विशेष न होवे।
भेदज्ञान से सुतप बढ़ावें, सहज पूर्ण शुद्धातम ध्यावें॥
२२. अदर्शन परीषह
जो ऋद्धि अतिशय नहीं होवें, तो भी निजश्रद्धा नहीं खोवें।
तत्त्व विचार सहज ही करते, शुद्ध स्वरूप चित्त में धरते ॥
ऐसे मुनिवर को शिर नावें, साक्षात् दर्शन कब पावें।
यही भाव मन माँहीं आवें, धनि निर्ग्रन्थ दशा प्रगटावें ॥
विषयों की अब नहीं कामना, शाश्वत पद की करूँ साधना ।
निजानन्द में तृप्त रहूँ मैं, अक्षय प्रभुता प्रगट करूँ मैं ॥
Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह
खोज: Bais Parishah