आत्महित का दुर्लभ अवसर महाभाग्य से पाया है।
जैन धर्म, जिन-श्रुत को पाकर मन मेरा हुलसाया है॥
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को पाकर मन में अति बहुमान जगा।
कोटि जन्म का संचित पुण्य था जब मैंने यह धर्म लखा॥
सच्ची समझ न थी मुझको, मूढ़ों की तरह मैं भटक रहा।
तीन मूढ़ताओं में फँसकर जग-जालों में लटक रहा॥
धर्म हमारा चिर साथी है जिसको न पहचाना था।
व्यवहार मात्र को धर्म मान, मैं मूढ़ बना मस्ताना था॥
पर का कर्ता स्वयं को माना, इधर-उधर मैं भटक रहा।
मिथ्यात्व के गोते खाकर भव-जालों में लटक रहा॥
सिद्ध समान स्वपद है मेरा, जब मुझको इसका भान हुआ।
‘मैं भी जिन-सम बन सकता हूँ’, ऐसा निज श्रद्धान हुआ॥
सच्ची श्रद्धा जागी प्रभुवर, इस नरभव को सार्थक करना है।
प्रभु सम मैं हूँ—ऐसा निज लखकर, मोक्ष-लक्ष्मी को वरना है॥
रचनाकार: तन्मय जैन (Tanmay Jain), ग्वालियर
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