जिनवाणी रस में लीन हुए
फिर रस न कोई सुहाता है ।
विषयों की अग्नि में झुलसा
आत्म निज सुख पाता है ।।
तत्त्व ज्ञान के बाण चला दो ।
दुख कषाय के शत्रु पर ।।
तू था प्रभु तू है प्रभु बस ।
स्वभाव से निश्चय कर ।।
जो बीता है वो निश्चित था ।
निश्चित है जो होना है ।।
हो निर्भार विकल्पों से ।
पुरुषार्थ सहज ही होना है ।।
दीन अनुभव कर कर के ।
दूर भये नित निज घर से ।।
श्रुत ज्ञान समागम पाने को ।
चक्रीधर भी भव भव तरसे ।।
जब द्रव्य द्रव्य का कर्ता नहीं ।
तो कौन जीव क्या काल विषम ।।
होता परिणमन सहज ही सब ।
कहती जिनवाणी सरल सुगम ।।
मान हीन तुलना पछताना ।
कण मिट्टी का कल गल जाना ।।
पर्यायों को गौण करे शिव ।
आत्म को शाश्वत पहचाना ।।
श्रद्धा है क्रमबद्ध पे ।
फिर क्यों बिलखे प्राणी ।।
मरीचि भी महावीर बने ।
जाने केवलज्ञानी ।।
मौन धरो, पुरुषार्थ करो ।
बस विकल्प को जान ।।
रहो शिव समता में सदा ।
आत्म में सुख मान ।।
AJ
रचनाकार: शुभम जैन (Shubham Jain), उदयपुर
Instagram: @shubhamsmJain93