प्राणी वरत अठाई जे करें ते पावें भवपार॥टेक॥
जम्बू द्वीप सुहावणो लख योजन विस्तार।
भरतक्षेत्र दक्षिण दिशा पोदनपुर तहँ सार॥प्राणी॥१॥
विद्यापति विद्याधरी सोमा राणी राय।
समकित पालै मन बचै धर्म सुनै अधिकाय॥प्राणी॥२॥
चारणमुनि तहाँ पारणे आये राजा गेह।
सोमाराणी आहार दे, पुण्य बढ़ो अति नेह॥प्राणी॥३॥
ताहि समय नभ देवता चाले जात विमान।
जय जय शब्द भयो घनो मुनिवर पूछ्यो ज्ञान॥प्राणी॥४
मुनिवर बोले रानि सुन नन्दीश्वर की जात।
जे नर करहिं स्वभावसों ते पावें शिवकांत॥प्राणी॥५॥
ऐसो बच राणी सुनो मन में भयो अनन्द।
नन्दीश्वर पूजा करें ध्यावें आदि जिनन्द॥प्राणी॥६॥
कातिक फागुण साढ़ में पालें मन वच काय।
आठ दिवस पूजा करें तीन भवांतर थाय॥प्राणी॥७॥
विद्यापति सुन चालियो रच्यो विमान अनूप।
रानी वरजै राय कों तुम हो मानुष भूप॥प्राणी॥८॥
मानुषोत्र लंघव नहीं मानुष जेती जात।
जिनवाणी निश्चय कही तीन भुवन विख्यात॥प्राणी॥९॥
सो विद्यापति ना रहो चलो नन्दीश्वर द्वीप।
मानुषोत्र गिरसों मिलो जाय विमान महीप॥प्राणी॥१०॥
मानुषोत्र की भेंट तें परो धरनि खिर भार।
विद्यापति भव चूरियो देव भयो सुरसार॥प्राणी॥११॥
दीप नन्दीश्वर छिनक में पूजा वसु विध ठान।
करी सु मन-वच-काय ले माल लई कर मान॥प्राणी॥१२॥
आनन्द सों घर आइयो नन्दीश्वर कर जात।
विद्यापति को रूप धर राणी सों कहै बात॥प्राणी॥१३॥
राणी बोली सुन राजा यह तो कबहुँ न होय।
जिनवाणी मिथ्या नहीं निश्चय मन में सोय॥प्राणी॥१४॥
नन्दीश्वर की माल ले राय दिखाई आय।
अब तू साँचो जान मोहि पूजन कर बहु भाय॥प्राणी॥१५॥
रानी फिर तासों कहै नर भव परले नाहिं।
पश्चिम सूरज उदय हुए जिनवाणी शुचि ताहि॥प्राणी॥१६
रानीसों नृप फिर कही बावन भवन जिनाल।
तेरह-तेरह मैं वन्दे पूजन करि तत्काल॥प्राणी॥१७॥
जयमाला तहँ मो मिली आयो हूँ तुझ पास।
अब तू मिथ्या मान मत कर मेरा विश्वास॥प्राणी॥१८॥
पूरब दक्षिण में वन्दे पश्चिम उत्तर जान।
मैं मिथ्या नहिं भाष हूँ श्री जिनवरकी आन॥प्राणी॥१९॥
हे रानी तैं सच कही जिन वानी शुभ सार।
ढाई द्वीप न लंघई मानुष भव विस्तार॥प्राणी॥२०॥
विद्यापति तें सुर भयो रूप धरो शुभ सोय।
रानी की स्तुति करी निश्चय समकित तोय॥प्राणी॥२१॥
देव कहै अब रानि सुन, मानुषोत्र मिलो जाय।
तहँतें चय मैं सुर भयो, पूजे नंदीश्वर पाय॥प्राणी॥२२॥
एक भवांतर मो रह्यो, जिन शासन परमान।
मिथ्याती मानें नहीं, श्रावक निश्चय आन॥प्राणी॥२३॥
सुर चय नर हथनापुरी, राज कियो भरपूर।
परिग्रह तजि संयम लियो, कर्म महागिर चूर॥प्राणी॥२४॥
केवल ज्ञान उपाय कर मोक्ष गये मुनि-राय।
शाश्वत सुख विलसे जहाँ जामनमरन मिटाय॥प्राणी॥२५॥
अब रानी की सुन कथा, संयम लीनो सार।
तपकर चयकर सुर भयो,विलसे सुख विस्तार॥प्राणी॥२६॥
गजपुर नगरी अवतरो, राज, करै बहुभाय।
सोलहकारण भाइयो, धर्म सुनो अधिकाय॥प्राणी॥२७॥
मुनि संघाटक आइयो, माली सार जनाय।
राजा बन्दो भाव सों, पुण्य बढ़ो अधिकाय॥प्राणी॥२८॥
राजा मन वैरागियो, संयम लीनो सार।
आठ सहस नृप साथ ले, यह संसार असार॥प्राणी॥२९॥
केवलज्ञान उपाय के, दोय सहस निर्वान।
दोय सहस सुख स्वर्ग के, भोगे भोग सुथान॥प्राणी॥३०॥
चार सहस भूलोक में, हुंडे बहु संसार।
काल पाय शिवपुर गये, उत्तम धर्म विचार॥प्राणी॥३१॥
वरत अठाई जे करें, तीन जन्म परमान।
लोकालोक सु जान ही सिद्धारथ कुल कान॥प्राणी॥३२॥
भव समुद्र के तरण को, बावन नौका जान।
जे जिय करें सुभाव सों, जिनवर सांच बखान॥प्राणी॥३३॥
मन वच काया तें पढ़ें, ते पावें भव पार।
‘विनय कीर्ति’ सुखसों भजे, जन्म सुफल संसार॥३४॥
आष्टान्हिका पर्व
वर्ष में ३ बार आता है :
१. कार्तिक सुदी ८ से पूर्णमासी तक ८ दिन
२. फाल्गुण सुदी ८ से पूर्णमासी तक ८ दिन
३. आषाढ सुदी ८ से पूर्णमासी तक ८ दिन
इन दिनों में पूजन पाठ तथा सिद्धचक्र विधान करने का महान्
फल है।
Artist: विनय कीर्ति
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३७३ से ३७६