श्री-श्रुतमुनि-विरचिता आस्रव - त्रिभङ्गी संदृष्टि-सहिता
पणमिय सुरेंदपूजियपयकमलं वड्ढमाणममलगुणं ।
पच्चयसत्तावण्णं वोच्छे हं सुणह भवियजणा ॥1॥
अर्थ: निर्मलगुणों के धारक तथा इन्द्रों के द्वारा पूजित हैं पद कमल जिनके ऐसे वर्द्धमान स्वामी को नमस्कार कर, सत्तावन आस्रवों को कहूँगा। उन्हें भव्यजन सुनों।
मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य आसवा होंति।
पण बारस पणवीसा पण्णरसा होंति तब्भेया ॥2॥
अर्थ: मिथ्यात्व के पाँच, अविरति के बारह, कषाय के पच्चीस और योग के पन्द्रह इस प्रकार आस्रव के सत्तावन भेद होते हैं।
मिच्छोदयेण मिच्छत्तमसद्दहणं तु तच्चअत्थाणं ।
एयंतं विवरीयं विणयं संसयिदमण्णाणं ॥3॥
अर्थ: मिथ्यात्व कर्म के उदय से मिथ्यादृष्टि जीव पदार्थों का विपरीत श्रद्धान करता है। वह मिंथ्यात्व एकांत, विपरीत, वैनयिक, संशय और अज्ञान के भेद से पाँच प्रकार का होता है।
छस्सिंदिएसुऽविरदी छज्जीवे तह य अविरदी चेव।
इंदियपाणासंजम दुदसं होदित्ति णिद्दिट्ठं ॥4॥
अर्थ: पाँच इन्द्रियों के विषय, छठवाँ मन - इस प्रकार इन्द्रिय असंयम के छह भेद, पंच स्थावर तथा त्रस जीवों की हिंसा इस प्रकार प्राणी असंयम के छह भेद, इस प्रकार दो प्रकार की अविरति बारह भेद रूप होती है यह जिनेन्द्र देव के द्वारा कहा है।
अणमप्पच्चक्खाणं पच्चक्खाणं तहेव संजलणं।
कोहो माणो माया लोहो सोलस कसायेदे ॥5॥
अर्थ: अनन्तानुबंधी - क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यान - क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यान - क्रोध, मान, माया, लोभ तथा संज्वलन - क्रोध, मान, माया, लोभ इस प्रकार कषाय के ये सोलह भेद हैं।
हस्स रदि अरदि सोयं भयं जुगुंछा य इत्थिपुंवेदं ।
संढं वेदं च तहा णव एदे णोकसाया य ॥६॥
अर्थ: हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये नौ नोकषाय जानना चाहिए।
मणवयणाण पउत्ती सच्चासच्चुभयअणुभयत्थेसु ।
तण्णामं होदि तदा तेहिं दु जोगा हु तज्जोगा ॥७॥
अर्थ: मन और वचन की सत्य, असत्य, उभय और अनुभय रूप पदार्थों में प्रवृत्ति - उनके नामानुसार सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग उभय मनोयोग और अनुभय मनोयोग तथा सत्य, असत्य, उभय और अनुभय रूप वचनयोग कहलाती है।
ओरालं तंमिस्सं वेगुव्वं तस्स मिस्सयं होदि।
आहारय तंमिस्सं कम्मइयं कायजोगेदे ॥८॥
अर्थ: औदारिक, औदारिक मिश्र, वैक्रियिक, वैक्रियिकमिश्र, आहारक, आहारकमिश्र तथा कार्मण काययोग इस प्रकार सात प्रकार का काययोग होता है।
मिच्छे खलु मिच्छत्तं अविरमणं देससंजदो ¹त्ति हवे।
सुहुमो त्ति कसाया पुणु सजोगिपेरंत जोगा हु² ॥9॥
अर्थ: निश्चय से मिथ्यात्व गुणस्थान में मिथ्यात्व, देशसंयम अर्थात् पंचम गुणस्थान तक अविरति, सूक्ष्मसांपराय अर्थात् दशमें गुणस्थान तक कषाय तथा सयोग केवली गुणस्थान तक योग रूप आस्रव पाया जाता है।
मिच्छदुगविरदठाणे मिस्सदुकम्मइयकायजोगा य।
छट्टे हारदु केवलिणाहे ओरालमिस्सकम्मइया ॥10॥
अर्थ: मिथ्यात्व, सासादन और अविरत नामक चतुर्थ गुणस्थान में औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, वैक्रियिक काययोग, वैक्रियिक मिश्र काययोग, छठवें गुणस्थान में आहारक काययोग और आहारक मिश्र काययोग तथा (सयोग) केवली भगवान के औदारिक मिश्र और कार्मण काययोग पाया जाता है।
पंच चदु सुण्ण सत्त य पण्णर दुग सुण्ण छक्क छक्केक्कं ।
सुण्णं चदु सगसंखा पच्चयविच्छित्ति णायव्वा ॥11॥
अर्थ: प्रथम गुणस्थान से लेकर सयोग केवली गुणस्थान तक क्रमशः पाँच, चार, शून्य, सात, पन्द्रह, दो, शून्य, छह, छह बार एक-एक, एक, शून्य, चार और सात की आस्रव व्युच्छित्ति जानना चाहिए।
मिच्छे हारदु सासणसम्मे मिच्छत्तपंचकं णत्थि।
अण दो मिस्सं कम्मं मिस्से ण चउत्थए सुणह ॥12॥
अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान में आहारक काययोग और आहारक मिश्र काययोग, सासादन गुणस्थान में पंच मिथ्यात्व, मिश्र गुणस्थान में अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र, कार्मणकाययोग रूप आस्रवों का अभाव है तथा चतुर्थ गुणस्थान में किसी भी आस्रव का अभाव नहीं होता है। आगे के गुणस्थान संबंधी आस्रव अभावों को सुनों।
दो मिस्स कम्म खित्तय तसवह वेगुव्व तस्स मिस्सं च।
ओरालमिस्स कम्ममपच्चक्खाणं तु ण हि पंचे ॥13॥
अर्थ: पंचम गुणस्थान में औदारिक मिश्र काययोग, आहारक मिश्र काययोग, त्रसवध, वैक्रियिक काययोग, वैक्रियिक मिश्र काययोग, औदारिक मिश्र काययोग तथा अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ इन आस्रवों का अभाव है।
इत्तो उवरिं सगसगविच्छित्तिअणासवाण संजोगे।
उवरूवरिं गुणठाणे होंतित्ति अणासवा णेया ॥14॥
अर्थ: पंचम गुणस्थान से आगे के गुणस्थानों में अपने-अपने गुणस्थान में होने वाली व्युच्छित्ति रूप आस्रवों का सद्भाव तथा इसके ऊपर के गुणस्थानों में उन आस्रवों का अभाव होता है अर्थात् जिन आस्रवों की पूर्व के गुणस्थानों में व्युच्छित्ति होती है उनका ही आगे के गुणस्थानों में अभाव होता है। ऐसा जानना चाहिए।
मिच्छे पणमिच्छत्तं साणे अणचारि मिस्सगे सुण्णं ।
अयदे विदियकसाया तसवह वेगुव्वजुगलछिदी ॥15॥
अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान में पाँच मिथ्यात्व, सासादन गुणस्थान में अनन्तानुबंधी चतुष्क, मिश्र गुणस्थान में शून्य, चतुर्थ गुण स्थान में अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ, त्रसवध, वैक्रियिक काययोग और वैक्रियिक मिश्र काययोग की आस्रव व्युच्छित्ति हो जाती है ।
अविरयएक्कारह तियचउक्कसाया पमत्ते णत्थि।
अत्थि हु आहारदुगं हारदुगं णत्थि सत्तट्ठे ॥16॥
अर्थ: प्रमत्त गुणस्थान में ग्यारह अविरति और प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय ये पन्द्रह आस्रव नहीं हैं। आहारक काययोग, आहारक मिश्रकाययोग का आस्रव होता है। आहारक काययोग, आहारक मिश्र काययोग का सप्तम और अष्टम गुणस्थान में आस्रव नहीं है।
छण्णोकसाय णवमे ण हि दसमे संढमहिलपुंवेयं ।
कोहो माणो माया ण हि लोहो णत्थि उवसमे खीणे ॥17॥
अर्थ: नवमें गुणस्थान में छह नोकषाय, दशवें गुणस्थान में नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, पुंवेद, संज्वलन क्रोध, मान, माया एवं उपशांत मोह और क्षीण मोह गुणस्थान संज्वलन लोभ में नहीं पाया जाता है।
अलियमणवयणुभयं णत्थि जिणे अत्थि सच्चमणुभयं।
मिस्सोरालयकम्मं अपच्चयाऽजोगिणो होंति ॥18॥
अर्थ: जिनेन्द्र भगवान (सयोगकेवली) के असत्य मनोयोग, उभय मनोयोग, असत्य वचनयोग और उभय वचनयोग नहीं है तथा सत्य, अनुभय मनोयोग- वचनयोग, औदारिकमिश्र और कार्मण काययोग का सद्भाव है एवं अयोग केवली के समस्त आस्रव अभाव रूप हैं।
पच्चयसत्तावण्णा गणहरदेवेहिं अक्खिया सम्मं ।
ते चउबंधणिमित्ता बंधादो पंचसंसारे ॥19॥
अर्थ: सत्तावन आस्रव (प्रत्यय) गणधर देव के द्वारा समीचीन प्रकार से कहे गये हैं। ये आस्रव, चारों प्रकार - प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबंध के कारण हैं तथा कर्मबंध से पंच प्रकार के संसार में परिभ्रमण होता है।
पणवण्णं पण्णासं तिदाल छादाल सत्ततीसा य ।
चउवीस दुवावीसं सोलसमेगूण जाव णव सत्ता ॥20॥
अर्थ: प्रथम गुण स्थान से सयोग केवली पर्यन्त क्रमशः पचपन, पचास, तेतालीस, छियालीस, सेतीस, चौबीस, बाईस, बाईस, सोलह, पन्द्रह, चौदह, तेरह, बारह, ग्यारह, दश, नौ, नौ तथा सात आस्रव (संख्या) जानना चाहिए।
दुगे सग चदुरिगिदसयं वीसं तियपणदुसहियतीसं च।
इगिसगअडअड़दालं पण्णासा होंति सत्तवण्णा ॥२१॥
अर्थ: प्रथम गुणस्थान से लेकर अयोग केवली पर्यन्त क्रमशः दो, सात, चौदह, ग्यारह, बीस, तेतीस, पेंतीस, पेंतीस, इकतालीस, ब्यालीस, तेंतालीस, चवालीस, पेतालीस, छयालीस, सेतालीस, अड़तालीस, अड़तालीस, पचास और सत्तावन आस्रव (प्रत्यय) अभाव रूप जानना चाहिए।
तिसु तेरं दस मिस्से सत्तसु णव छट्टयम्मि एक्कारा।
जोगिम्हि सत्तजोगा अजोगिठाणं हवे सुण्णं ॥२२॥
अर्थ: तीन गुणस्थानों में तेरह अर्थात् मिथ्यात्व, सासादन और अविरत गुणस्थान में तेरह, मिश्र में दस, सात गुणस्थानों में नौ अर्थात् देशविरत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्पराय, उपशान्तमोह तथा क्षीणमोह गुणस्थान में नौ का, प्रमत्तविरत में ग्यारह सयोगकेवली में सात एवं अयोगकेवली गुणस्थान में शून्य इस प्रकार उपर्युक्त गुणस्थानों में योग का सद्भाव होता है।
दुसु दुसु पणइगिवीसं सत्तरसं देससंजदे तत्तो।
तिसु तेरं णवमे सग सुहमेगं होंति हु कसाया ॥२३॥
अर्थ: दो गुणस्थानों में पच्चीस अर्थात् मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थान में पच्चीस कषाय, दो गुणस्थानों में इक्कीस अर्थात् मिश्र और अविरत गुणस्थान में इक्कीस कषाय, देशसंयम में सत्तरह, तीन गुणस्थानों तेरह अर्थात् प्रमत्तविरत, अप्रमत्तविरत और अपूर्वकरण गुणस्थान में तेरह अनिवृत्तिकरण में सात एवं सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में एक लोभ कषाय होती है।
विजिदचउघाइकम्मे केवलणाणेण णादसयलत्थे।
वीरविणे वंदित्ता जहाकमं मग्गणासवं वोच्छे ॥24॥
अर्थ: चार घातियाँ कर्मों का जिन्होने नाश कर दिया है, केवल ज्ञान के द्वारा जिन्होने समस्त पदार्थों का जान लिया है, ऐसे वीर जिन को प्रणाम कर, मैं क्रमानुसार मार्गणाओं में आस्रवों का कथन करूंगा।
मिस्सत्तियकम्मणूणा पुण्णाणं पच्चया जहाजोगा ।
मणवयणचउ-सरीरत्तयरहिता पुण्णगे होंति ॥२५॥
अर्थ: पर्याप्त जीवों के औदारिक मिश्र, वैक्रियिक मिश्र, आहारक मिश्र और कार्मण काययोग से रहित यथायोग्य आस्रव (प्रत्यय) होते हैं। अपर्याप्त जीवों के चार मनोयोग, चार वचनयोग, तीन (औदारिक, वैक्रियिक और आहारक) काययोग रूप प्रत्यय नहीं होते हैं।
इत्थीपुंवेददुगं हारोरालियदुगं च वज्जित्ता ।
णेरइयाणं पढमे इगिवण्णा पच्चया होंति ॥२६॥
अर्थ: प्रथम नरक में स्त्रीवेद, पुंवेद, औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, आहारक काययोग और आहारक मिश्र काययोग को छोड़कर इक्यावन आस्रव होते हैं।
विदियगुणे णिरयगदिं ण यादि इदि तस्स णत्थि कम्मइयं ।
वेगुव्वियमिस्सं च दु ते होंति हु अविरदे ठाणे ॥२७॥
अर्थ: सासादन गुणस्थानवर्ती जीव, नरक गति में नहीं जाता है इसलिए उसके सासादन गुणस्थान में कार्मण काययोग और वैक्रियिक मिश्र काययोग नहीं होता है। चतुर्थ गुणस्थान में कार्मण काययोग और वैक्रियिक मिश्र.काययोग पाया जाता है।
सक्करपहुदिसु एवं अविरदठाणे ण होइ कम्मइयं ।
वेगुव्वियमिस्सो वि य तेसिं मिच्छेव वोच्छेदो ॥२८॥
अर्थ: इसी प्रकार द्वितीयादि पृथ्वियों में चतुर्थ गुणस्थान में कार्मण काययोग और वैक्रियिक मिश्र काययोग नहीं होता है। इन दोनों योगों की मिथ्यात्व गुणस्थान में ही व्युच्छित्ति हो जाती है।
वेगुव्वाहारदुगं ण होइ तिरियेसु सेसतेवण्णा।
एवं भोगावणिए संढं विरहिऊण बावण्णा ॥२९॥
अर्थ: कर्मभूमि तिर्यंचों के वैक्रियिक, वैक्रियिक मिश्र काययोग, आहारक, आहारक मिश्र काययोग ये आस्रव (प्रत्यय) नहीं होते हैं शेष तिरेपन आस्रव (प्रत्यय) होते हैं। इसी प्रकार भोग भूमिज तिर्यंचों के उपर्युक्त तिरेपन आस्रव में से नपुंसकवेद को छोड़कर शेष बावन आस्रव होते हैं।
लद्धिअपुण्णतिरिक्खे हारदु मणवयण अट्ठ ओरालं।
वेगुव्वदुगं पुंवेदित्थीवेदं ण बादालं ॥३०॥
अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यंचों के आहारकद्विक - चार मनोयोग, चार वचनयोग, औदारिक काययोग, वैक्रियिकद्विक, पुंवेद, स्त्रीवेद को छोड़कर ब्यालीस आस्रव होते हैं।
मणुवेसु ण वेगुव्वदु पणवण्णं संति तत्थ भोगेसु ।
हारदुसण्ढविवज्जिद दुवण्णऽपुण्णे अपुण्णे वा ॥३१॥
अर्थ: कर्म भूमिज मनुष्यों के वैक्रियिक द्विक को छोड़कर, पचपन आस्रव होते हैं। भोग भूमिज मनुष्यों के उपर्युक्त पचपन में से आहारद्विक, नपुंसकवेद को छोड़कर बावन आस्रव (प्रत्यय) होते हैं तथा लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों में लब्ध्यपर्याप्त तिर्यंचों के समान 42 आस्रव जानना चाहिए।
देवे हारोराॅलियजुगलं संढं च णत्थि तत्थेव।
देवाणं देवीणं णेवित्थी णेव पुंवेदो ॥३२॥
अर्थ: देवगति में देवों में आहारकद्विक, औदारिकद्विक और नपुंसकवेद नहीं होता है। देवों में स्त्रीवेद तथा देवियों में पुंवेद नहीं होता है।
भवणतिकप्पित्थीणं असंयदठाणे ण होइ कम्मइयं।
वेगुव्वियमिस्सो वि य तेसिं पुणु सासणे छेदो ॥३३॥
अर्थ: भवनत्रिक तथा कल्पवासी स्त्रियों के असंयत गुणस्थान में कार्मण काययोग तथा वैक्रियिकमिश्र काययोग नहीं होता है क्योंकि द्वितीय सासादन गुणस्थान में ही उनकी व्युच्छित्ति हो जाती है।
एवं उवरि णवपणअणुदिसणउत्तरविमाणजादा जे ।
ते देवा पुणु सम्मा अविरदठाणुव्व णायव्वा ॥३४॥
अर्थ: ऊपर नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमानवासी देवों में जो देव होते हैं। उनके आस्रव देवगति में चतुर्थ गुणस्थान के आस्रव के समान जानना चाहिए क्योंकि वहाँ चतुर्थ गुणस्थान मात्र ही पाया जाता है।
पुंवेदित्थिविगुव्वियहारदुमणरसणचदुहि एयक्खे ।
मणचदुवयणचदुहि य रहिदा अडतीस ते भणिदा ॥३५॥
अर्थ: एकेन्द्रिय जीवों में पुंवेद, स्त्रीवेद, वैक्रियिकद्विक, आहारकद्विक, मन, रसना इन्द्रिय, घ्राण इन्द्रिय, चक्षु इन्द्रिय और श्रोत्र इन्द्रिय अविरति, चार मनोयोग तथा चार वचनयोग इन उन्नीस आस्रवों के बिना शेष अड़तीस आस्रव कहे गये हैं।
एयक्खे जे उत्ता ते कमसो अंतभासरसणेहिं ।
घाणेण य चक्खूर्हिं य जुत्ता वियलिंदिए णेया ॥३६॥
अर्थ: द्वीन्द्रियों में रसनेन्द्रिय अविरति व उभय वचनयोग को उपर्युक्त एकेन्द्रिय जीवों के अड़तीस आस्रवों में मिलाने से चालीस आस्रव होते हैं। त्रीन्द्रिय जीवों में घ्राणेन्द्रिय संबंधी अविरति मिलाने से इकतालीस आस्रव तथा चतुरिन्द्रिय जीवों में चक्षुरिन्द्रिय की अविरति मिलाने पर ब्यालीस आस्रव होते है।
इगविगलिंदियजणिदे सासणठाणे ण होइ ओरालं ।
इणमणुभयं च वयणं तेसिं मिच्छेव वोच्छेदो ॥३७॥
अर्थ: एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवों के सासादन गुणस्थान में औदारिक काययोग और अनुभय वचनयोग नहीं होता है क्योंकि इन दोनों की मिथ्यात्व गुणस्थान में व्युच्छित्ति हो जाती है। यहाँ पर जो मिथ्यात्व गुणस्थान में अनुभय वचनयोग की व्युच्छित्ति कही गई है, वह विकलेन्द्रियों के ही समझना चाहिए। क्योंकि एकेन्द्रिय जीवों के वचनयोग नहीं होता है।
पंचेदियजीवाणं तसजीवाणं च पच्चया सव्वे ।
पुढ़वीआदिसु पंचसु एइंदिय कहिद अडतीसा ॥३८॥
अर्थ: त्रसों और पंचेन्द्रिय जीवों में सभी आस्रव (प्रत्यय) गुणस्थानवत् जानना चाहिए। पृथ्वि आदि पंच स्थावरों में एकेन्द्रिय जीवों में कथित अड़तीस आस्रव जानना चाहिए।
हारदुगं वज्जित्ता जोगाणं तेरसाणमेगेगं ।
जोगं पुणु पक्खित्ता तेदाला इदरयोगूणा ॥३९॥
अर्थ: आहारक और आहारकमिश्र काययोग को छोड़कर शेष तेरह योगों में निज एक-एक योग जोड़कर शेष चौदह योगों से रहित (57-14) = 43 बन्ध प्रत्यय होते है, अर्थात् मिथ्यात्व 5, अविरति 12, कषाय 25 और स्वकीय योग = 43)
ओरालमिस्स साणे संढत्थीणं च वोच्छिदी होदि ।
वेगुव्वमिस्स साणे इत्थीवेदस्स वोच्छेदो ॥४०॥
अर्थ: औदारिक मिश्रकाययोग में सासादन गुणस्थान में नपुंसकवेद और स्त्रीवेद की व्युच्छित्ति हो जाती है। वैक्रियिकमिश्र काययोग में सासादन गुणस्थान में स्त्रीवेद के आस्रव की व्युच्छित्ति हो जाती है।
तेसिं साणे संढं णत्थि हु सो होइ अविरदे ठाणे ।
कम्मइए विदियगुणे इत्थीवेदच्छिदी होइ ॥४१॥
अर्थ: वैक्रियिकमिश्र काययोग में सासादन गुणस्थान में नपुंसकवेद नहीं पाया जाता है। तथा चतुर्थ गुणस्थान में नपुंसकवेद होता है। कार्मण काययोग में द्वितीय गुणस्थान में स्त्रीवेद की व्युच्छित्ति हो जाती है।
संजलणं पुवेदं हस्सादीणोकसायछक्कं च ।
णियएक्कजोग्गसहिया बारस आहारगे जुम्मे ॥४२॥
अर्थ: आहारक, आहारक मिश्र काययोग में चारों संज्वलन कषाय, पुंवेद, छः हास्यादि नोकषाय एवं स्वकीय एक योग सहित (4 + 7 + 1) बारह आस्रव होते हैं।
पुंवेदे थीसंढं वज्जित्ता सेसपच्चया होंति ।
इत्थीवेदे हारदु पुंसंढं च वज्जिदा सव्वे ॥43॥
अर्थ: पुंवेद में स्त्रीवेद और नपुंसकवेद को छोड़कर शेष सभी पचपन आस्रव होते हैं। स्त्रीवेद में आहारकद्विक, पुंवेद और नपुंसकवेद को छोड़कर शेष सभी तिरेपन आस्रव (प्रत्यय) होते हैं।
मिस्सदुकम्मइयच्छिदी साणे संढे ण होइ पुरसिच्छी ।
हारदुगं विदियगुणे ओरालयमिस्स वोच्छेदो ॥44॥
अर्थ (गाथा 44 से 45): स्त्रीवेद में सासादन गुणस्थान में औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मण काययोग की व्युच्छित्ति हो जाती है। नपुंसकवेद में पुंवेद, स्त्रीवेद एवं आहारकद्विक नहीं पाये जाते हैं तथा नपुंसकवेद में सासादन गुणस्थान में औदारिक मिश्र काययोग की व्युच्छित्ति हो जाती है एवं सासादन गुणस्थान में वैक्रियिक मिश्र को कम कर चतुर्थ गुणस्थान में जोड़ देना चाहिए। क्योंकि नपुंसक वेद में सासादन गुणस्थान में वैक्रियिकमिश्र काययोग नहीं पाया जाता है। (उपर्युक्त अर्थ गाथा 44 एवं गाथा 45 के दो चरणों से ग्रहण किया गया है)
तेसिं अवणिय वेगुव्वियमिस्स अविरदे हु णिक्खेवे।
कोहचउक्के माणादिबारसहीण पणदाला ॥45॥
माणादितिये एवं इदरकसाणहिं विरहिदा जाणे ।
कुमदिकुसुदे ण विज्जदि हारदुगं होंति पणवण्णा ॥46॥
अर्थ (गाथा 45 से 46): अनन्तानुबंधी - अप्रत्याख्यानादि चारों प्रकार के क्रोध में अपनी चार कषाय के अतिरिक्त अन्य बारह कषायों को कम करने पर शेष (57-12) = 45 आस्रव होते हैं। इसी प्रकार मानादि त्रय चतुष्क में अपनी चार कषायों के अतिरिक्त अन्य बारह कषायों को कम करने पर शेष पैंतालीस आस्रव जानना चाहिए। कुमति और कुश्रुतज्ञान में आहारकद्विक को छोड़कर शेष पचपन आस्रव होते हैं।
वेभंगे बावण्णा कमणमिस्सदुगहारदुगहीणा ।
णाणतिये अडदालं पणमिच्छाचउरणरहिदा ॥47॥
अर्थ: विभंगावधि ज्ञान में कार्मण काययोग, औदारिकमिश्र काययोग, वैक्रियिकमिश्र काययोग, आहारकद्विक बिना शेष बावन आस्रव होते हैं। मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी व अवधिज्ञानी जीवों के अनन्तानुबंधी चतुष्क और पाँच मिथ्यात्व को छोड़कर अड़तालीस आस्रव होते हैं।
मणपज्जवे संढित्थीवज्जिदसगणोकसाय संजलणं ।
आदिमणवजोगजुदा पच्चयवीसं मुणेयव्वा ॥४८॥
अर्थ: मनःपर्यय ज्ञान में स्त्रीवेद, नपुंसकवेद को छोड़कर शेष सात नोकषाय, संज्वलन चतुष्क, औदारिक काययोग, मनोयोग चार और वचनयोग चार ये बीस आस्रव होते हैं।
ओरालं तंमिस्सं कम्मइयं सच्चअणुभयाणं च।
मणवयणाण चउक्के केवलणाणे सगं जाणे ॥४९॥
अर्थ: केवलीज्ञान में सत्य, अनुभय मनोयोग तथा वचनयोग औदारिक, औदारिकमिश्र काययोग व कार्मण काययोग ये सात आस्रव होते हैं।
अडमणवयगोरालं हारदुगं णोकसाय संजलणं ।
सामाइयछेदेसु य चउवीसा पच्चया होंति ॥50॥
अर्थ: सामायिक, छेदोपस्थापना संयम में चार संज्वलन कषाय, नौ नोकषाय, चार मनोयोग, चार वचनयोग, आहारक काययोग, आहारकमिश्र काययोग इस प्रकार चौबीस आस्रव होते हैं।
वींसदि परिहारे संढित्थीहारदुगवज्जिया एदे ।
सुहुमे णवआदिमजोगा संजलणलोहजुदा ॥51॥
अर्थ: परिहारविशुद्धि संयम में ऊपर कथित चौबीस प्रत्ययों में से स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, आहारकद्विक को छोड़कर बीस आस्रव होते हैं। सूक्ष्मसांपराय संयम में आदि के नौ योग अर्थात् चार मनोयोग, चार वचनयोग, औदारिक काययोग एवं संज्वलन लोभ इस प्रकार ये दस आस्रव होते हैं।
एदे पुण जहखादे कम्मणओरालमिस्ससुजुत्ता।
संजलणलोहहीणा एगादसपच्चया णेया ॥५२॥
अर्थ: यथाख्यात संयम में ऊपर कथित सूक्ष्मसांपरायसंयम के दस आस्रवों में कार्मणकाययोग, औदारिकमिश्र काययोग जोड़ने पर एवं संज्वलन लोभ कम करने पर ग्यारह आस्रव जानना चाहिए।
तसऽसंजमवज्जिता सेसऽजमा णोकसाय देसजमे।
अट्ठंतिल्लकसाया आदिमणवजोग सगतीसा ॥५३॥
अर्थ: देशसंयम में त्रस अविरति को छोड़कर शेष ग्यारह अविरति, नौ नोकषाय, प्रत्याख्यान चतुष्क, संज्वलन चतुष्क, चार मनोयोग, चार वचनयोग इस प्रकार समस्त सेंतीस आस्रव होते हैं।
आहारयदुगरहिया पणवण्ण असंजमे दु चक्खुदुगे।
सव्वे णाणतिकहिदा अडदाला ओहिदंसणे णेया ॥५४॥
अर्थ: असंयम आहारद्विक से रहित पचपन आस्रव होते हैं। अचक्षु, चक्षुदर्शन में सभी 57 आस्रव होते है। अवधिदर्शन में मति, श्रुत, अवधि ज्ञान में कथित अड़तालीस आस्रव जानना चाहिये।
सगजोगपच्चया खलु केवलणाणव्व केवलालोए।
किण्हतिए पणवण्णं हारदुगं वज्जिऊण हवे ॥५५॥
अर्थ: केवलदर्शन में केवलज्ञान के समान सात आस्रव जानना चाहिये। कृष्ण, नील, कपोत इन तीन लेश्याओं में आहारकद्विक को छोड़कर पचपन आस्रव होते हैं।
किण्हदुसाणे वेगुव्वियमिस्सछिदी हवेइ तेउतिए।
मिच्छदुठाणे ओरालियमिस्सो णत्थि अविरदे अत्थि ॥५६॥
कृष्णादिकसासादने वैक्रियिकमिश्रच्छित्तिः भवेत् तेजस्त्रिके।
मिथ्यात्वद्विस्थाने औदारिकमिश्रं नास्ति अविरतेऽस्ति ॥
अर्थ: कृष्ण, नील लेश्या के सासादन गुणस्थान में वैक्रियिकमिश्र की व्युच्छित्ति होती है। पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या के मिथ्यात्व, सासादन गुणस्थान में औदारिक मिश्र नहीं है, किन्तु चतुर्थ गुणस्थान में है।
सुहलेस्सत्तिये भव्वे सव्वेऽभव्वे ण होदि हारदुगं।
पणवण्णुवसमसम्मे ते मिच्छोरालमिस्सअणरहिदा ॥57॥
अर्थ: शुभ तीन लेश्याओं अर्थात् पीत, पद्म और शुक्ल लेश्याओं में तथा भव्यों में सभी सत्तावन आस्रव होते हैं। अभव्य जीवों के आहारकद्विक को छोड़कर पचपन आस्रव होते हैं। औपशमिक सम्यग्दर्शन में ऊपर कहे पचपन आस्रवों में से पाँच मिथ्यात्व, औदारिकमिश्र, अनन्तानुबंधी चतुष्क से रहित पैंतालीस आस्रव होते हैं।
एदे वेदगखइए हारदुओरालमिस्ससंजुत्ता ।
मिच्छे सासण मिस्से सगगुणठाणव्व णायव्वा ॥५८॥
अर्थ: वेदक और क्षायिक सम्यग्दर्शन में ऊपर कहे गये पैंतालीस आस्रवों में आहारकद्विक, औदारिकमिश्र काययोग सहित अड़तालीस आस्रव होते हैं। मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र में अपने गुणस्थान के समान आस्रव जानना चाहिए। अर्थात् मिथ्यात्व में पचपन, सासादन में पचास एवं मिश्र में तेतालीस आस्रव होते हैं।
सण्णिस्स होंति सयला वेगुव्वाहारदुगमसण्णिस्स ।
चदुमणमादितिवयणं अणिंदियं णत्थि पणदाला ॥५९॥
अर्थ: संज्ञी मार्गणा में संज्ञी में सभी सत्तावन आस्रव होते हैं। असंज्ञी में चार मनोयोग, तीन वचनयोग (सत्य, असत्य, उभय), वैक्रियिकद्विक, आहारकद्विक तथा मन अविरति से रहित पैंतालीस आस्रव होते हैं।
कम्मइयं वजित्ता छपण्णासा हवंति आहारे।
तेदाला णाहारे कम्मेइयरजोगपरिहीणा ॥६०॥
अर्थ: आहारक जीवों में कार्मण काययोग के बिना शेष छप्पन आस्रव तथा अनाहारक जीवों में कार्मण काययोग के बिना शेष चौदह योगों को कम करने पर (57-14) = 43 आस्रव होते हैं। अर्थात् अनाहारक जीवों में कार्मण काययोग का सद्भाव पाया जाता है, किन्तु अन्य योगों का नहीं।
इदि मग्गणासु जोगो पच्चयभेदो मया समासेण ।
कहिदो सुदमुणिणा जो भावइ सो जाइ अप्पसुहं ॥61॥
अर्थ: इस प्रकार मार्गणाओं में योग आस्रव (प्रत्यय) भेद मुझ श्रुतमुनि के द्वारा संक्षेप से कहे गये। जो उपर्युक्त आस्रवों का भावपूर्वक चिन्तवन करता है, वह आत्म सुख को प्राप्त करता है।
पयकमलजुयलविणमियविणे-यजणकयसुपूयमाहप्पो ।
णिज्झियमयणपहावो सो वालिंदो चिरं जयऊ॥62॥
अर्थ: जिनके चरण कमल युगल नम्रीभूत शिष्य जनों के द्वारा की गई विशिष्ट पूजा से माहात्म्य को प्राप्त हैं तथा जिन्होंने कामदेव के मद के प्रभाव को जीत लिया है, वे बालचन्द्र मुनि चिरकाल तक जयवंत रहें।