'अशुद्धं पुस्तकं शत्रुः' | Ashuddhan Pustakan Shatruh

‘अशुद्धं पुस्तकं शत्रुः’

-प्रो. वीरसागर जैन

पुस्तकें पाठकों की परम मित्र होती हैं, किंतु आजकल बहुत-सी पुस्तकें इतनी अशुद्ध छपने लगी हैं कि अर्थ का अनर्थ हो रहा है। ऐसी पुस्तकों को परम मित्र कदापि नहीं कह सकते, अपितु परम शत्रु ही कहना होगा।

शास्त्रों में भी अशुद्ध पुस्तक को शत्रु कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार अच्छी पुस्तकें मनुष्य का परम हित करने से उसकी परम मित्र सिद्ध होती हैं, उसीप्रकार अशुद्ध पुस्तकें मनुष्य का अहित करने वाली होने से परम शत्रु भी सिद्ध होती हैं।

आश्चर्य होता है कि आज कम्प्यूटर युग में जबकि काम करना बहुत सरल हो गया है, तब भी पुस्तकें शुद्ध नहीं छप पा रही हैं और उनमें अशुद्धियों की भरमार होती है। पहले के जमाने में लोग लैटर प्रेस से बड़ी कठिनाई से पुस्तकों का मुद्रण कर पाते थे, तब भी पुस्तकें प्रायः बहुत शुद्ध छपती थीं और उसके बाद भी जो अशुद्धियाँ रह जाएं तो उनके लिए उसमें अशुद्धि-पत्र भी खेद सहित प्रकाशित किया जाता था, किंतु आजकल तो मानों कोई थोड़ा भी परिश्रम नहीं करना चाहता। दो-चार दिन की मेहनत में ही झट से कोई भी कैसी भी पुस्तक छपाकर ‘पुस्तक-निर्माता’, ‘पुस्तक-प्रकाशक’ आदि का श्रेय ले लेना चाहता है। अच्छी तरह से प्रूफरीडिंग भी कोई करना-कराना नहीं चाहता। यह सब भारी प्रमाद है, घोरातिघोर अपराध है, हमें इसको गंभीरता से लेना होगा, अन्यथा भविष्य में शास्त्रों की रक्षा करना ही असंभव हो जाएगा, शास्त्र शस्त्र बन जाएंगे।

वैसे तो अशुद्ध पढ़ना-बोलना, लिखना-लिखाना, छपाना-बेचना सभी बड़े दोष हैं, घोर अपराध हैं, परन्तु अशुद्ध पुस्तकों का प्रकाशन और वितरण तो सबसे ही बड़ा अपराध है, मूलभूत अपराध है। उसी से अशुद्धि असंख्यगुणित होकर प्रचलित-प्रसारित होती है। अशुद्धि की परम्परा का मूल कारण अशुद्ध प्रकाशन ही है।

यद्यपि अशुद्ध-उच्चारण करने वालों को भी कान खोलकर समझ लेना चाहिए कि यह बहुत बड़ा अपराध है। इसे सम्यग्ज्ञान का दोष या अतिचार बताया गया है। इससे ज्ञानावरण कर्म का आस्रव भी होता है। इसीलिए तो पूजा-पाठ-स्वाध्याय के अंत में सदैव माँ सरस्वती से जाने-अनजाने में हुए अपने समस्त अशुद्ध उच्चारण के लिए क्षमा-याचना की जाती है। यथा-

“अक्खरपयत्थहीणं मत्ताहीणं च जं मए भणिदं।
तं खमऊ णाणदेव य मज्झ वि दुक्खक्खयं दिंतु॥” -ज्ञानपीठ पूजांजलि, पृ.107

“यदर्थमात्रापदवाक्यहीनं, मया प्रमादाद्यदि किंचनोक्तम्।
तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवि, सरस्वती केवलबोधलब्धिम्॥” -सामायिक पाठ

“अक्षर पद मात्रा से दूषित जो कुछ कहा गया मुझसे।
क्षमा करो प्रभु सो सब करुणा करि पुनि छुड़ाहु भवदुख से॥” -विसर्जन पाठ ‘वृहत्कल्पसूत्र’ आदि में अशुद्ध उच्चारण करने वाले को बड़े प्रायाश्चित्त का भागी बताया गया है, उसकी सर्व दीक्षा ही निरर्थक कही गई है। यथा-

“हीनाक्षरेऽधिकाक्षरे च अर्थव्याप्तिः, अर्थस्य विसंवादः। अर्थस्य विसंवादे चरणस्य विसंवादः। चरणविसंवादात् न मोक्षः, मोक्षाभावः। मोक्षाभावे सर्वा दीक्षा निरर्थिका ।”

अशुद्ध उच्चारण करने से शरीर में भी अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है- ऐसा ‘चरक संहिता’ में लिखा है। इसके अतिरिक्त अशुद्ध उच्चारण से प्रमाद, बुद्धिहीनता, कुटिलता आदि अनेक दोष उत्पन्न होते हैं। अशुद्ध उच्चारण से वक्ता अशुद्धता का आदी बन जाता है। वह उस शब्द को सदा ही अशुद्ध बोलता है। जैसे- कुछ लोग ‘वीतराग भेंट्यो अब, मेटो राग कुटेव’ को सदैव ‘वीतराग मेटो अबै, भेंट्यो राग कुटेव’ बोलते हैं। अतः प्रयत्न करके अशुद्धियों का निवारण कर देना चाहिए। बहरहाल, पुस्तकों का अशुद्ध प्रकाशन और वितरण तो वाकई बहुत बड़ा अपराध है। सामाजिक, राष्ट्रीय, धार्मिक, साहित्यिक सभी प्रकार का अपराध है। इससे व्यक्ति का ही अहित नहीं होता, अपितु समूचे साहित्य-जगत्, समाज और राष्ट्र की भी महान् हानि होती है।

मैं तो समझता हूँ कि अशुद्ध पुस्तकों का प्रकाशन और वितरण एक अक्षम्य अपराध है, दण्डनीय अपराध है। अशुद्ध पुस्तकों के प्रकाशकों को दंडित करने की समाज में कोई व्यवस्था होनी चाहिए। किन्तु दण्डित करना तो दूर, आश्चर्य है कि आज अशुद्ध पुस्तकों के प्रकाशकों से कोई कुछ नहीं कहता। पत्रकार बन्धु भी आजकल उनके बारे में कुछ नहीं कहते। पहले तो पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकार महोदय ही ‘पुस्तक-समीक्षा’ लिखकर अशुद्ध पुस्तकों की अच्छी खबर लेते थे, परन्तु आजकल तो उन्होंने भी इधर ध्यान देना छोड़ दिया है। वे ‘पुस्तक-समीक्षा’ स्तंभ में पुस्तक का केवल बाह्य परिचय मात्र देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, समीक्षा बिलकुल नहीं करते। इससे भी आजकल अशुद्ध पुस्तकों की बाढ़ आने लगी है।

अशुद्ध पुस्तकों के साथ एक और भी बड़ी भारी दिक्कत यह होती है कि उन अशुद्ध पुस्तकों का शुद्ध अंश भी विश्वसनीय नहीं रहता। कदम-कदम पर ऐसा लगता रहता है कि कहीं यह भी अशुद्ध नहीं छप गया हो। जैनेन्द्र सिद्धांत कोश (4/273) में लिखा है कि “एक अशुद्धि सौ शुद्धियों का घात कर देती है।”

अतः सभी पुस्तक-प्रकाशकों से निवेदन है कि वे इस संबंध में विशेष सावधानी रखने का प्रयास करें। पुस्तक की प्रतियाँ संख्या में भले ही कम प्रकाशित हों, पर पुस्तक का शुद्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। अतः कैसे भी करके प्रकाशन से पूर्व किसी अच्छे प्रूफरीडर विद्वान् को वह पुस्तक दिखा लेना चाहिए और भले ही थोड़ा समय लगे, पर पुस्तक शुद्ध ही प्रकाशित होना चाहिए। इसी से समाज और साहित्य की उन्नति होगी।

कुछ लोग यश के लिए जल्दी-जल्दी बहुत लेखन-प्रकाशन करते हैं, पर वे नहीं जानते कि घटिया प्रकाशन से यश नहीं, अपयश मिलता है। यश के लिए कार्य चाहे एक ही हो, पर श्रेष्ठ होना चाहिए।