अशुचि काया | Ashuchi Kaaya

मिथ्यात्व जगत् का मूल है, ये ही दुःखमय शूल है।
काया को ही अपना माना, ये ही हमारी भूल है।। 1।।

इसी भूल से जग में फँसा है, पर से राग बढ़ाता है।
क्षणभंगुर काया के कारण, निज सर्वस्व लुटाता है।। 2।।

पर ये पुद्गल और तू चेतन, इससे तब क्या नाता है।
तू तो जाता अन्य जगह, यह यहीं पड़ा रह जाता है ।। 3 ।।

अत्यन्त अशुचि मल का घर है, इसका श्रृंगार विफल ही है।
क्षीरोदधि से धोने पर भी, यह रहता सदा समल ही है ।। 4 ।।

अतएव ममत्व हटा करके, अब आत्म स्वरूप विचारो तुम।
संसार त्याग कर तप करना, अरु अपना कार्य सम्हारो तुम ।। 5 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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