असाधारणधर्मवचनं लक्षणम् | Asadharanadharmavachanan Lakshanam

असाधारणधर्मवचनं लक्षणम्

-प्रो. वीरसागर जैन

श्रीमदभिनव धर्मभूषण यति द्वारा रचित ‘न्यायदीपिका’ ग्रन्थ में लक्षण का लक्षण समझाते समय एक प्रकरण आया है कि ‘असाधारणधर्मवचनं लक्षणम्’ -यह मान्यता समीचीन नहीं है | अधिकांश पाठकों को इसे समझने में बहुत कठिनाई होती है, अतः यहाँ इसी पर किंचित् सरलता के साथ विचार करते हैं |

‘असाधारणधर्मवचनं लक्षणम्’ - लक्षण का यह लक्षण मुख्यतः नैयायिकों द्वारा माना गया है, परन्तु इसे जैन ग्रन्थ ‘प्रमाणमीमांसा’ में भी हेमचन्द्रसूरि ने प्रस्तुत किया है, अतः यहाँ उसी का निराकरण किया जा रहा है। न्यायदीपिकाकार धर्मभूषण यति के अनुसार लक्षण का यह लक्षण समीचीन नहीं है, क्योंकि इसमें गहराई से देखा जाए तो अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भव - ये तीनों दोष आते हैं | यथा-

1. अव्याप्ति- लक्षण दो प्रकार के होते हैं- आत्मभूत और अनात्मभूत, किन्तु ‘असाधारणधर्मवचनं लक्षणम्’- यह लक्षण केवल आत्मभूत लक्षणों में ही घट सकता है, अनात्मभूत लक्षणों में नहीं घट सकता, क्योंकि अनात्मभूत लक्षण वस्तु का असाधारणधर्म नहीं होते | इस प्रकार यह लक्ष्य के एकदेश में ही पाए जाने के कारण अव्याप्ति दोष से दूषित है |

2. अतिव्याप्ति- वस्तु के अनेक धर्म ऐसे होते हैं जो उसके असाधारणधर्म होते हैं, किन्तु फिर भी वे उसका लक्षण नहीं बन पाते हैं, क्योंकि वे अन्य वस्तुओं में भी पाए जाते हैं | जैसे कि क्रोध जीव का असाधारणधर्म है, फिर भी वह जीव का लक्षण नहीं बनता, शावलेयत्व गाय का असाधारणधर्म है, फिर भी वह गाय का लक्षण नहीं बनता, इत्यादि | इनमें तो बल्कि अव्याप्त नाम का दोष आता है | इसप्रकार यह लक्षण अपने लक्ष्य के बाहर लक्षणाभास में भी चला जाता है, इसलिए अतिव्याप्ति दोष से दूषित है।

3. असम्भव- असाधारणधर्मवचन को लक्षण मानने पर लक्ष्य और लक्षण में सामानाधिकरण्य के अभाव का भी प्रसंग उपस्थित होता है, इसलिए यह लक्षण असम्भव दोष से भी दूषित है |

शंका- सामानाधिकरण्य क्या होता है और यहाँ उसके अभाव का प्रसंग कैसे उपस्थित होता है, कुछ समझ में नहीं आया | कृपया स्पष्ट करें |

समाधान- सामानाधिकरण्य मुख्यतः व्याकरण का विषय है | सामानाधिकरण्य शब्द का अर्थ है- समानाधिकरण का भाव अर्थात् समानाधिकरणपना | यह समानाधिकरणपना या सामानाधिकरण्य दो प्रकार का होता है- शाब्द सामानाधिकरण्य और आर्थ सामानाधिकरण्य | दो वस्तुओं का एक ही आधार पर रहना आर्थ सामानाधिकरण्य है | जैसे कि रूप और रस | रूप और रस एक ही अर्थ (पदार्थ/वस्तु) के आधार पर रहते हैं, अतः इसे आर्थ सामानाधिकरण्य कहते हैं | तथा जब दो शब्दों का अर्थ/वाच्य एक ही हो तो उसे शाब्द सामानाधिकरण्य कहते हैं | जैसे कि घट और कलश | घट और कलश -इन दोनों शब्दों का अर्थ/वाच्य एक ही है, अतः इसे शाब्द सामानाधिकरण्य कहते हैं | यहाँ ऐसे और भी अनेक दृष्टान्त दिए जा सकते हैं, परन्तु अभी इतना ही पर्याप्त है।

यहाँ शाब्द सामानाधिकरण्य का ही प्रसंग है, आर्थ सामानाधिकरण्य का नहीं | जब भी किसी वस्तु का लक्षण बनाया जाता है तो उसमें शाब्द सामानाधिकरण्य अवश्य होता है, अन्यथा वह लक्षण पूरे लक्ष्य में घटित नहीं होगा, उसकी व्याप्ति मर्यादित हो जाएगी, उसमें अव्याप्ति दोष आ जाएगा | जैसे कि ‘नीलं कमलम्’ में सामानाधिकरण्य नहीं है, अतः नीलत्व सभी कमलों में नहीं पाया जाता, उसकी व्याप्ति मर्यादित (सीमित) हो गई | प्रायः विशेषण विशेष्य की व्याप्ति को मर्यादित कर देते हैं | जैसे कि काला घोड़ा | यहाँ घोड़ा व्यापक था किन्तु उसमें काला विशेषण लगने से उसकी व्याप्ति सीमित हो गई, वह सभी घोड़ों पर घटित नहीं हुई | इसी प्रकार यहाँ कहते हैं कि असाधारणधर्मवचन का अपने लक्ष्यरूप लक्षण के साथ सामानाधिकरण्य नहीं बैठता है, क्योंकि दोनों का अर्थ/वाच्य एक ही नहीं है, एक तो धर्म ही है, जबकि दूसरा (लक्षण) धर्मी है | धर्म का वचन करने से धर्म ही पकड़ में आएगा, धर्मी नहीं पकड़ में आ सकता | धर्मी पकड़ने के लिए धर्मवान् बोलना आवश्यक है |

इस प्रकार यहाँ इस लक्षण को असम्भव दोष से दूषित भी सिद्ध किया गया |

शंका- क्या लक्ष्य-लक्षण में सर्वत्र ही ऐसा सामानाधिकरण्य होना अनिवार्य है |

समाधान- हाँ, अनिवार्य है |

शंका- पुरुष का लक्षण दंड है-इसमें कैसे घटित होगा ?

समाधान- दण्ड नहीं, दण्डी है | दण्डी और पुरुष का बनाना है | जैसे कि ज्ञान आत्मा का लक्षण है, वहाँ वास्तव में ज्ञान नहीं ज्ञानी है और हमें ज्ञानी और आत्मा का सामानाधिकरण्य बनाकर देखना है, जो कि एकदम सही बैठ रहा है | इस प्रकार असाधारणधर्मवचन और लक्षण इन दोनों का सामानाधिकरण्य नहीं बैठ रहा है।

शंका- क्या किसी लक्षण में एक साथ तीनों दोष घटित हो सकते हैं ? क्योंकि जब हमने अव्याप्ति मान लिया तो उसकी एकदेश में व्याप्ति तो हमने स्वीकार कर ही ली, अब उसे असम्भव कैसे कह सकते हैं और यदि असम्भव कहते हैं तो अव्याप्ति कैसे कह सकते हैं ?

समाधान- यह प्रश्न उचित है, परन्तु विविध अपेक्षाओं से ऐसा घटित करने का प्रयास किया गया है, ताकि विपरीतता की कोई सम्भावना न रहे |

शंका- क्या किसी भी अपेक्षा से ऐसा नहीं कहा जा सकता कि असाधारणधर्म का वचन ही लक्षण का लक्षण है ?

समाधान- मुझे लगता है कि स्थूल अपेक्षा से यदि कोई विद्वान् ऐसा कहे कि असाधारणधर्म का वचन ही लक्षण का लक्षण है तो विशेष दोष नहीं है, तथापि विद्वज्जन ही इसका स्पष्ट समाधान कर सकते हैं, मैंने तो जैसा मुझे अभी समझ में आ रहा है, वैसा कहा है ।