देव-शास्त्र-गुरु का अर्घ्य
(गीता)
जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत, पुष्प चरु दीपक धरूँ ।
वर धूप निरमल फल विविध बहु, जनम के पातक हरूँ ।।
इह भाँति अर्घ्य चढ़ाय नित भवि, करत शिव पंकति मचूँ ।
अरहंत श्रुत सिद्धान्त गुरु निर्ग्रन्थ नित पूजा रचूँ ।।
वसु विधि अर्घ्य संजोयकै, अति उछाह मन कीन ।
जासों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षणभर निजरस को पी चेतन मिथ्यामल को धो देता है ।
काषायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है ।।
अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल-रवि जग-मग करता है ।
दर्शन-बल पूर्ण प्रगट होता यह ही अर्हन्त अवस्था है ।।
यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊँगा ।
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाऊँगा ।।
? ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
बहुमूल्य जगत का वैभव यह, क्या हमको सुखी बना सकता ।
अरे पूर्णता पाने में, इसकी क्या है आवश्यकता ।।
मैं स्वयं पूर्ण हूँ अपने में, प्रभु है अनर्घ्य मेरी माया ।
बहुमुल्य द्रव्यमय अर्घ्य लिये, अर्पण के हेतु चला आया ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंच परमेष्ठी का अर्घ्य
जल चन्दन अक्षत पुष्प दीप, नैवेद्य धूप फल लाया हूँ ।
अब तक के संचित कर्मों का, मैं पुंज जलाने आया हूँ ।।
यह अर्घ्य समर्पित करता हूँ, अविचल अनर्घ्य पद दो स्वामी ।
हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुःख मेटो अन्तर्यामी ।।
ॐ ह्रीं श्री पंच-परमेष्ठिभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सिद्ध परमेष्ठी का अर्घ्य (संस्कृत)
(वसन्तति.१४)
ज्ञानोपयोगविमलं विशदात्मरूपं,
सूक्ष्मस्वभावपरमं यदनन्तवीर्यम् ।
कर्मोघकक्षदहनं सुखसस्य बीजं,
वन्दे सदा निरुपमं वर सिद्धचक्रम् ।।
(अनुष्टुप)
कर्माष्टक विनिर्मुक्तं मोक्ष-लक्ष्मी-निकेतनम् ।
सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यं पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सिद्ध परमेष्ठी का अर्घ्य (हिन्दी)
जल पिया और चन्दन चरचा, मालायें सुरभित सुमनों की ।
पहनी, तंदुल सेये व्यंजन, दीपावलियों की रत्नों की ।।
सुरभी धूपायन की फैली, शुभ कर्मों का सब फल पाया ।
आकुलता फिर भी बनी रही, क्या कारण जान नहीं पाया ।।
जब दृष्टि पड़ी प्रभुजी तुम पर, मुझको स्वभाव का भान हुआ ।
सुख नहीं विषय भोगों में है, तुमको लख यह सद्ज्ञान हुआ ।।
जल से फल तक का वैभव यह मै आज त्यागने हूँ आया ।
होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चौबीस तीर्थंकर का अर्घ्य
जल फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ्य करों ।
तुमको अरपों भवतार, भव तरि मोक्ष वरों ।।
चौबीसों श्री जिनचन्द, आनन्द कन्द सही ।
पद जजत हरत भव-फन्द, पावत मोक्ष मही ।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादिवीरान्तेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
समुच्चय पूजन का अर्घ्य
अष्टम वसुधा पाने को, कर में ये आठों द्रव्य लिये ।
सहज शुद्ध स्वाभाविकता से, निज में निज गुण प्रकट किये ।।
यह अर्घ्य समर्पण करके मैं, श्री देव-शास्त्र-गुरु को ध्याऊँ ।
विद्यमान श्री बीस तीर्थंकर, सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अनन्तानन्त सिद्धपरमेष्ठिभ्यश्च अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
विदेहक्षेत्र में विद्यमान बीस तीर्थंकरों का अर्घ्य
जल फल आठों दर्व अरघ कर प्रीति धरी है ।
गणधर इन्द्रनिहूतैं थुति पूरी न करी है ।।
‘‘द्यानत’’ सेवक जानके (हो) जगतैं लेहु निकार ।
सीमंधर जिन आदि दे (स्वामी) बीस विदेह मँझार ।।
श्री जिनराज हो भव तारण तरण जिहाज ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सीमंधर भगवान का अर्घ्य
निर्मल जल सा प्रभु निज स्वरूप, पहिचान उसी में लीन हुए ।
भव-ताप उतरने लगा तभी, चन्दन-सी उठी हिलोर हिये ।।
अभिराम-भवन प्रभु अक्षत का, सब शक्ति-प्रसून लगे खिलने ।
क्षुत्-तृषा अठारह दोष क्षीण, कैवल्य प्रदीप लगा जलने ।।
मिट चली चपलता योगों की, कर्मों के ईंधन ध्वस्त हुए ।
फल हुआ प्रभो! ऐसा मधुरिम, तुम धवल निरंजन स्वस्थ हुए ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
महावीर भगवान का अर्घ्य
इस अर्घ्य का क्या मूल्य है अनर्घ्य पद के सामने?
उस परम-पद को पा लिया, हे पतित-पावन आपने ।।
संतप्त-मानस शान्त हों, जिनके गुणों के गान में ।
वे वर्द्धमान महान जिन विचरैं हमारे ध्यान में ।।
ॐ ह्रीं श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंच-बालयति का अर्घ्य
सजि वसु विधि द्रव्य मनोज्ञ, अर्घ्य बनावत हैं ।
वसुकर्म अनादि संयोग, ताहि नसावत हैं ।।
श्री वासु-पूज्य-मल्लि-नेमि, पारस वीर अति ।
नमूँ मन-वच-तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ।।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंच-बालयति तीर्थंकरेभ्यो नमः अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
नन्दीश्वर द्वीप का अर्घ्य
यह अरघ कियो निज हेत तुमको अरपतु हों ।
‘‘द्यानत’’ कीज्यो शिवखेत, भूमि समरपतु हों ।।
नन्दीश्वर श्री जिनधाम, बावन पूँज करों ।
वसुदिन प्रतिमा अभिराम, आनन्द भाव धरों ।।
ॐ ह्रीं श्री नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपंचासज्जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो अनर्घ्यं पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दशलक्षण का अर्घ्य
आठों दरव संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाह सों ।
भव आताप निवार, दशलक्षण पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादि दशलक्षणधर्मांगाय अनर्घ्यं पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रत्नत्रय का अर्घ्य
आठ दरव निरधार, उत्तम सो उत्तम लिये ।
जनम रोग निरवार, सम्यक् रत्नत्रय भजूँ ।।
ॐ ह्रीं सम्यक् रत्नत्रयाय अनर्घ्यं पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक्दर्शन का अर्घ्य
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।
सम्यक्दर्शनसार, आठ अंग पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यग्ज्ञान का अर्घ्य
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।
सम्यग्ज्ञानविचार, आठ भेद पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं अष्टाविध सम्यग्ज्ञानाय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र का अर्घ्य
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।
सम्यक् चारित सार, तेरह विधि पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक्चारित्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३८८ से ३९२