अपूर्व अवसर पद्यानुवाद | Apoorv Avsar Padyanuvad

अपूर्व अवसर पद्यानुवाद | Apoorv Avsar Padyanuvad

अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥टेक ॥
यह अपूर्व अवसर मेरा कब आएगा,
कब होऊँगा बाह्यान्तर निर्ग्रन्थ मैं।
सब प्रकार के मोहबन्ध को तोड़कर,
कब विचरूंगा महत् पुरुष के पन्थ में ॥
भव्य दिगम्बर मुनि मुद्रा को पाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१ ॥
पर भावों से उदासीनता ही रहे,
मात्र देह तो हो संयम हित साधना।
अन्य किसी कारण से अन्य न ग्राह्य हो,
हो न देह के प्रति ममत्व की भावना ॥
यह वैराग्य हृदय में जब बस जाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥२॥
दर्शन मोह व्यतीत हो गया ज्ञान यह,
देह भिन्न है मैं तो चेतन शुद्ध हूँ।
चारित्र मोह विशेष क्षीण अनुभव करूँ,
मैं तो शुद्ध स्वरूप ज्ञानघन बुद्ध हूँ।
यह दृढ़ निश्चय अन्तस्तल में छाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥३॥
आत्मस्थिरता मन-वच काया योग की,
मुख्य रूप से रहे देह पर्यन्त हो।
कितने भी उपसर्ग घोर परिषह बने,
तो भी मेरी स्थिरता का ना अन्त हो ॥
निज स्वभाव में हृदय कमल मुसकाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥४ ॥
संयम के हित होवे योग प्रवर्तना,
जिन आज्ञानुसार करूँ पुरुषार्थ मैं।
क्षण-क्षण घटते रहें विकल्प निमित्त के,
करूँ अन्त में निज स्वरूप चरितार्थ मैं ॥
आत्मज्ञान ही मुझे मोक्ष पहुँचाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥५ ॥
पंच विषय में राग-द्वेष कुछ हो नहीं,
पंच प्रमाद न करूँ बनूँ न मलीन मैं।
द्रव्य क्षेत्र औ काल भाव प्रतिबन्ध बिन,
वीतलोभ बन विचरूं उदयाधीन मैं ॥
सम्यक्दर्शन ज्ञानचरित्र निभाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥६ ॥
क्रोध भाव हो तो मैं नाशूँ क्रोध को,
मान भाव यदि हो तो रहूँ विनीत हो।
माया जागे तो माया को क्षय करूँ,
लोभ जगे सन्तोष भाव की जीत हो ॥
चार कषायों में ना मन अटकाएगा।
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥७ ॥
नग्न दिगम्बर मुण्डभाव अस्नानता,
अदन्त धोवन आदि महान् प्रसिद्ध हैं।
केश रोम नख आदि अङ्ग शृङ्गारना,
द्रव्य-भाव संयममय मुनि ज्यों सिद्ध हैं ॥
यह मनुष्य भव सफल अरे हो जाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥९ ॥
शत्रु मित्र के प्रति वर्तुं समदर्शिता,
मान अमान न छोड़ स्वयं स्वभाव का।
जन्म-मृत्यु पर हर्ष शोक कुछ हो नहीं,
बन्ध मोक्ष के प्रति वर्तुं समभाव को ॥
उग्र निर्जरा द्वारा कर्म झराएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१० ॥
एकाकी विचरूं निर्जन शमशान में,
वन पर्वत में मिलें सिंह संयोग से।
आसन रहे अडोल न मन में क्षोभ हो,
परम मित्र मम जानूँ पाये योग से ॥
तत्त्व भावना हृदय रात-दिल भाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥११ ॥
घोर तपश्चर्या से मन को खेदना,
नहीं सरस भोजन से मिले प्रसन्नता।
रजकण से लेकर वैमानिक ऋद्धि तक,
सब पुद्गल पर्याय रूप की भिन्नता ॥
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध आत्मगुण गाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१२ ॥
इस प्रकार चारित्र मोह को जीत लूँ,
आऊँ जहाँ अपूर्व करण का भाव हो।
श्रेणी क्षपक चढूँ निज में आरूढ़ हो,
नित्य निरंजन अतिशय शुद्ध स्वभाव हो ॥
ज्ञान सूर्य का विमल उजाला छाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१३॥
मोह स्वयंभूरमण उदधि को पार कर,
क्षीण मोह गुणस्थान निकट हो जाएगा।
वीतराग पूर्ण स्वरूप निज आत्म में,
केवल ज्ञान निधान प्रगट हो जाएगा।
रागादिक अष्टादश दोष मिटाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१४॥
चार घातिया कर्म नष्ट अब हो गए,
भव का बीज मिट इस भव से खो गए।
सर्व भाव ज्ञाता दृष्टा सह शुद्धता,
कृत कृत्य प्रभु वीर्य ज्ञान निज हो गए ॥
यह सर्वज्ञ स्वरूप मुझे मिल जाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१५ ॥
वेदनीय आदिक चउ कर्म रहे अभी,
जली हुई रस्सीवत छाया मात्र है।
देहायुष आधीन रहेंगे जब तलक,
आयु पूर्ण टूटता देह का पात्र है॥
ज्ञान शिरोमणि परम शांत रस पाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१६॥
मन-वच-काया से कर्मों की वर्गणा,
छूटे जहाँ सकल पुद्गल सम्बन्ध सब ।
यही अयोगी गुणस्थान हो जाएगा,
महा भाग्य सुखदायक पूर्ण अबन्ध अब ॥
जन्म-मृत्यु से रहित अवस्था पाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१७॥
रहा नहीं परमाणु मात्र का स्पर्श भी,
पूर्ण कलङ्क विहीन अडोल स्वरूप हो।
शुद्ध निरंजन चेतन मूर्ति अनन्य मय,
अगुरु लघु सु अमूर्त सहज पद रूप हो ॥
अविचल अविकल स्वयं सिद्ध गुण गाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१८॥
पूर्व प्रयोगादिक कारण के योग से,
ऊर्ध्व गमन हो सिद्धालय सुनिवास हो।
सादि अनन्त अनन्त समाधि सुखी सदा,
अनन्त दर्शन-ज्ञान अनन्त प्रकाश हो ॥
अविनाशी अधिकार परम पद पाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥१९॥
जो जाना सर्वज्ञ देव ने ज्ञान में,
उसे न तीर्थङ्कर की वाणी कह सकी।
अनुभव गोचर मात्र ज्ञान है यह अरे,
उस स्वरूप को किसकी वाणी कह सकी ॥
सब कुछ स्वागत अनुभव से दरशाएगा,
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥२०॥
यही परम पद प्राप्त कर सकूँ ध्यान में,
मनन चिन्तवन आत्म मनोरथ रूप को।
तो यह निश्चय ‘राजचन्द्र’ मन में धरो,
प्रभु आज्ञा से पाऊँ स्वयं स्वरूप को ॥
यही मार्ग जीवन को सफल बनाएगा,
समयसार का सार मुझे मिल जाएगा।
अपूर्व अवसर ऐसा कब प्रभु आएगा ॥२१॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: पं. राजमल पवैया जी

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