अपनी स्वभाव परिणति से बिछड़ गए हम,
इसलिए ज्ञान पाने में पिछड़ गए हम ।।
दुष्टा विभाव परिणति ने कुमति हमें दी ।
जिनकुल को प्राप्त करके भी बिगड़ गए हम ।।
मिथ्यात्व मोह मद की मदिरा ही हमने पी।
गति चार में ही भ्रम-भ्रम कर जकड़ गए हम ।।
अपनी ही भूल से तो पाया इतर निगोद ।
परिणति विभाव पाकर के उधड़ गए हम ।।
निज आत्म ज्ञान ही प्रभो हमको बचाएगा।
अज्ञान की शिला पर ही रगड़ गए हम ।।
अंजन गिरि के जिनगृह में सुना है उपदेश ।
अतएव प्रभु कृपा से ही सुधर गए हम ।।