अपनी प्रभुता | Apni Prabhuta

पर की महिमा गावे निशदिन, नहीं अपना कुछ ध्यान है।
अन्तर्मुख हो देख आत्मन्, आप स्वयं भगवान् है।।1।।

स्वयं पूर्ण है अपने में ही, सहज चतुष्टयवान है।
बिनमूरति-चिन्मूरति अनुपम, गुण अनन्त की खान है।।2।।

अपनी प्रभुता आप भूल कर, हुआ व्यर्थ हैरान है।
तू स्वाधीन अखण्ड प्रतापी, अक्षय प्रभुतावान है।।3।।

होकर दीन भटकता बाहर, अन्तर भरा निधान है।
सिद्ध प्रभु ज्यों सिद्धालय में, त्यों आतम अम्लान है।।4।।

जानो निमित्त अकिंचित्कर ही, होय ज्ञान से ज्ञान है।
मत उपयोग भ्रमाओ पर में, करो भेद-विज्ञान है।।5।।

ज्ञानानन्द स्वभावी आतम, धरो सहज श्रद्धान है।
निज के आश्रय से ही प्रगटे, अक्षय सुख अम्लान है।।6।।

चेतो! चेतो !! उत्तम अवसर, मोह महा दुखखान है।
मोहादिक के त्याग बिना, होवे न कदा कल्याण है।। 7।।

कर्त्ता पर का कोई न होवे, नहीं आदान-प्रदान है।
परिणति में भी कभी कदाचित् पर से लाभ न हानि है।। 8 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह