अपने चेतन में तुम डोलो | Apne chetan men tum dolo

इतने भव हैं तुमने खोए, अब क्या हीरा भी खो दोगे ।
तीन जगत का सबसे सुंदर, पड़ा है गहरे कूप में कबसे ।।
रस्सी ले सम्यक्त्व की गहरी, मार छलांग तू योद्धा जैसी ।
अंधकार में एक किरण है, जिससे भव की मिटती फेरी ।।
कर्मों की संतति को तोड़ो, वही पुरानी रीति छोड़ो ।
अपने चेतन में तुम डोलो, अपने चेतन में तुम डोलो ।।

मेरु सम आदि न अंत, वज्रमयी तेरा अंतःस्थल ।
नदियों सम तेरी पर्यायें, बहती जायें बहती जायें ।।
ध्रुव तो ज्यों का त्यों ही रहता, पर्यायों से फर्क न पड़ता ।
जैसे कमल न कीचड़ होता, वैसे ही तू जड़ न होता ।
ढीठ पड़े क्यों गोते खाकर, ऐसी क्या मजबूरी बोलो ।
अपने चेतन में तुम डोलो, अपने चेतन में तुम डोलो ।।

भोर की पहली किरण न ताको , ऐसे भोर कई देखे हैं ।
पर न चेते एक दिवस भी, भोर भी अब फीके रहते हैं ।।
जैसे श्रमण भी घोर निशा में, समकित रवि से जगमग रहते ।
ऐसे रवि के तेज से ज्ञानी, अंधकार से कभी न मिलते ।।
समकित के आश्रय से आत्मन्, जग को जग के हाल पे छोड़ो ।
अपने चेतन में तुम डोलो , अपने चेतन में तुम डोलो ।।

रचनाकार: आर्जव जैन (Arjav Jain), दिल्ली
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