चेतन अपने भाव सम्हारो, देहादिक से भिन्न निहारो।।टेक।।
रागादिक हैं दुख के कारण, इन्हें सदा ही हेय विचारो।
ध्रुव परमातम के आश्रय से, कर पुरुषार्थ सहज निरवारो।।1।।
वीतरागता शिव सुखदाता अपने उर में सदा विचारो।
है सर्वस्व सदा अपने में, बाहर कुछ भी नहीं तुम्हारो।।2।।
पूर्ण वीतरागी साँचे प्रभु गुरु, निर्ग्रन्थ हृदय में धारो।
स्याद्वादमय श्री जिनवाणी, पढ़ो-पढ़ावो सदा विचारो।।3।।
तत्त्वों का सम्यक् निश्चय कर, स्व-पर भेद-विज्ञान सुधारो ।
पर से विरत स्वयं में रत हो, ज्ञानानंद सहज विस्तारो ।। 4।।
पर द्रव्यों का दोष न देखो, अन्तर्मुख उपयोग सम्हारो।
इष्ट-अनिष्ट कल्पना त्यागो, समता भाव सदा ही धारो ।। 5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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