आओ पधारो मम हृदयंगम
हे प्रभुवर महावीरा रे…।।टेक।।
हे प्रभुवर मम दृष्टि कब हो
स्थिर निज में ही वीरा रे ।। (आओ पधारो…) ।।1।।
अब तक पर में चित्त लगाया
पर बुद्धि मम भाई रे ।। (आओ पधारो…)।।2।।
धन की माया दिखती सुन्दर
स्वर्ण की बेड़ी भाई रे ।। (आओ पधारो…)।।3।।
यह संसार महा दुःख सागर
इसको सुखमय माना रे ।। (आओ पधारो…)।।4।।
तुमको मैंने ना पहचाना
चिंतामणि सम माना रे ।। (आओ पधारो…)।।5।।
तुम ने जो जो त्यागा प्रभुवर
तुमसे ही वो मांगा रे ।। (आओ पधारो…)।।6।।
सुख का पिंड है आत्म मेरा
उसको न पहचाना रे ।। (आओ पधारो…)।।7।।
अब तो जिनवर मूरत देखी
तुम सम निज को पाया रे ।। (आओ पधारो…)।।8।।
मैं हूँ एक अखंड त्रिकाली
निज को सुखमय जाना रे ।। (आओ पधारो…)।।9।।
तुम सम ही अब मैं होऊंगा
पूर्ण सुखी निज आश्रय से ।। (आओ पधारो…)
पराश्रित बुद्धि
(दोहा)
सुख का पिंड है आत्मा, उसको न पहचान।
दुःख अनंत पाये प्रभु, पर को सुखमय जान।।
(वीर छंद)
पर को सुखमय जाना मैंने, पर से ही सुख को माना।
सुख तो स्वाश्रित निज की पर्यय, उसको न मैं पहचाना।।
जगती जिस पथ पर बढ़ती थी, उस पर ही आरूढ़ हुआ।
मार्ग सु:ख का है या दुःख का, इसका कभी न ज्ञान हुआ।।
विषयों में ही मस्त रहा मैं, उनका छल न पहचाना।
जैसे सुधा समझकर विष को, कोई हुआ हो मस्ताना।।
जब मैंने प्रभु तुमको जाना, भाव तुम्हारा पहचाना।
मैं तो स्वयं- स्वयं का भगवन्, यह भी मैंने तब जाना।।
जिसने माना अग्नि शीतल, उसने तो दुःख ही पाया।
ऐसी ही स्थिति प्रभु मेरी, विषयों से जब सुख चाहा।।
मैं स्वयं हूँ पूर्ण स्वयं में, यह तुमसे मैंने सीखा।
अकर्तृत्व को धारण करके भी मुझको तो सुखी किया।
है उपकार तुम्हारा भगवन्, सही मार्ग को प्रकटाया।
जानन-देखन कार्य है मेरा, ज्ञाता-दृष्टा बतलाया।।
चैतन्यमयी चिद्रूप स्वभावी, ज्ञान हुआ है अब निज का।
पर में अब मैं सुख न खोजूं, निज से ही सुख प्रकट हुआ।
(दोहा)
पर वस्तु में हो यदि, एकत्व अरु कर्तृत्व।
दुःख होगा सर्वत्र ही, यदि भोक्तृत्व ममत्व।।
एही चार कुबुद्धि हैं, इस संसार का मूल।
किंतु यदि हो आत्म में, तो होवें सुख कूल।।
रचनाकार: चिद्रूप जैन (Chidrup Jain), कोटा
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