अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता
-प्रो. वीरसागर जैन
दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों को तत्त्वज्ञान की निर्मलता या स्पष्टता के लिए सभी दर्शनों का थोडा-बहुत ज्ञान अवश्य करना चाहिए, किन्तु आजकल अधिकांश छात्र इस ओर ध्यान नहीं देते, वे मात्र ‘अपना’ ही एक दर्शन पढ़ते हैं और अन्य दर्शनों के ज्ञान का प्रयास नहीं करते | यहाँ तक कि कुछ छात्र तो अन्य दर्शनों के ज्ञान को अनावश्यक, अनुपयोगी या समय की बर्बादी भी बताते हैं, जो एक बड़ी भयावह स्थिति है | प्राचीन काल में ऐसा नहीं होता था, सभी छात्र सभी दर्शनों का ज्ञान करते थे | वे जानते थे कि सभी दर्शन एक-दूसरे के ज्ञान में सहायक हैं, अन्य दर्शनों को समझे बिना किसी एक दर्शन का भी यथार्थ ज्ञान नहीं होता |
दरअसल, प्रत्येक शास्त्र में पूर्व पक्ष के साथ ही उत्तर पक्ष को समझाया जाता है, पूर्व पक्ष में अन्य दर्शनों की मान्यताएं रखी जाती हैं और फिर उत्तर पक्ष में उनका निराकरण करके अपना दर्शन स्थापित किया जाता है, किन्तु यदि हम पूर्व पक्ष को ही ठीक से नहीं समझे होंगे तो उत्तर पक्ष को कैसे समझेंगे ? पूर्व पक्ष के बिना उत्तर पक्ष समझ में नहीं आ सकता | जिसे पूर्व पक्ष जितना अच्छा समझ में आएगा, उसे उत्तर पक्ष भी उतना ही अच्छा समझ में आएगा | अतः हमें मात्र एक ‘अपने’ दर्शन के ही ज्ञान का आग्रह नहीं रखना चाहिए, अपितु सभी दर्शनों के ज्ञान का उद्यम करना चाहिए |
दर्शनशास्त्र के एकांगी ज्ञान की यह स्थिति आज जैन दर्शन के विद्यार्थियों में भी देखी जा रही है, जबकि जैन परम्परा में तो सदा ही सभी दर्शनों के अध्ययन-अध्यापन पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है | जैन पुस्तकालयों में भी सर्व दर्शनों के ग्रन्थों का संग्रहण-संरक्षण होता रहा है | हरिभद्रसूरि आदि कुछ जैनाचार्यों ने तो स्वतंत्र रूप से ही षड्दर्शनसमुच्चय आदि ग्रन्थों का प्रणयन किया है, अतः जैन दर्शन के विद्यार्थियों को तो संकीर्णता छोड़ ही देनी चाहिए और जैनेतर दर्शनों के ज्ञान का भी यथासम्भव उद्यम करना चाहिए | उसे यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि यदि वह जैनेतर दर्शनों का ज्ञान नहीं करेगा तो उसे जैन ग्रन्थ भी ठीक से समझ में नहीं आ सकेंगे | यथा -
जैन-ग्रन्थों में लक्षण-निर्माण के समय आचार्यगण अन्यमत-निराकरण की दृष्टि से संक्षेप में सूत्ररचना करते हैं, जिसे जैनेतर दर्शनों का ज्ञाता व्यक्ति ही ठीक से समझ-समझा सकता है | जैसे -
‘स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्’ - परीक्षामुखसूत्र 1/1
प्रमाण के इस लक्षण में एक-एक पद के द्वारा एक-एक दर्शन की मान्यता का निराकरण किया गया है| यथा - ‘स्व’ पद अस्वसंवेदनवादी सांख्य, परोक्षज्ञानवादी मीमांसक और ज्ञानान्तरप्रत्यक्षवादी यौग के निराकरण हेतु है | ‘अपूर्व’ पद धारावाहिकज्ञानवादियों के निराकरण हेतु है | ‘अर्थ’ पद बाह्य अर्थ को न मानने वाले विज्ञानाद्वैतवादी, पुरुषाद्वैतवादी, शून्याद्वैतवादी के निराकरण हेतु है | ‘व्यवसायात्मक’ पद निर्विकल्पज्ञान वादी बौद्धों के निराकरण हेतु है । ‘ज्ञान’ पद अज्ञानरूप सन्निकर्ष आदि को प्रमाण माननेवाले नैयायिकों के निराकरण हेतु है । ( -प्रमेयरत्नमाला, पृष्ठ 14 )
इसी प्रकार सिद्ध जीवों का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए आचार्य नेमिचंद्र गोम्मटसार में लिखते हैं कि-
‘अट्ठविह कम्मवियला सीदीभूदा णिरंजणा णिच्चा ।
अट्ठगुणा किदकिच्चा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ॥’ - गाथा 68
अर्थ - सिद्ध अष्टविध कर्मों से रहित, शान्त, निरंजन, नित्य, अष्टगुण सहित, लोकाग्रनिवासी होते हैं ।
इसमें भी एक-एक पद के द्वारा एक-एक दर्शन की मान्यता का निराकरण किया गया है, जैसा कि आचार्य नेमिचंद्र ने स्वयं ही अगली गाथा में लिखा है -
‘सदसिव संखो मक्कडि बुद्धो णइयाइयो य वैसेसी ।
ईसरमंडलिदंसण-विदूसणटुं कदं एदे ॥’ -गाथा 69
अर्थ - उक्त सभी विशेषण क्रमशः सदाशिव, सांख्य, मक्कड़ी, बुद्ध, नैयायिक, वैशेषिक, ईश्वरवादी और मांडलिक दर्शन के निराकरणार्थ किये गये हैं ।
इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए टीकाकारों ने जो कुछ लिखा है उसे अन्य दर्शनों के ज्ञान बिना कथमपि नहीं समझा जा सकता । यथा - ‘अट्ठविहकम्मवियला’ पद से याज्ञिक और सदाशिव मत का निराकरण किया गया है । ‘सीदीभूदा’ पद से सांख्य मत का निराकरण किया गया है । ‘णिरंजणा’ पद से मस्करी मत का निराकरण किया गया है । ‘णिच्चा’ पद से बौद्ध मत का निराकरण किया गया है । ‘अट्ठगुणा’ पद से नैयायिक - वैशेषिक मत का निराकरण किया गया है । ‘किदकिच्चा’ पद से ईश्वरसृष्टिकर्तृत्ववादी मत का निराकरण किया गया है । ‘लोयग्गणिवासिणो’ पद से मांडलिक मत का निराकरण किया गया है । (-संस्कृतटीका का सार)
इसी प्रकार अन्य भी सब समझना चाहिए । वास्तव में शास्त्रों के प्रत्येक कथन में कथ्य से अधिक निराकृत्य समाया होता है और उस निराकृत्य को समझे बिना कथ्य का पूर्ण ज्ञान-आनन्द प्राप्त नहीं होता । जैसे कि जीव का स्वरूप समझाते हुए द्रव्यसंग्रह आदि शास्त्रों में जीव के नौ अधिकारों का उल्लेख किया गया है-
जीवो उवओगमओ अमुत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो ।
भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्डुगदी ॥
आचार्य नेमिचंद्र, द्रव्यसंग्रह, गाथा 2
अर्थ - जीव के नौ अधिकार हैं - जीवत्व, उपयोगमयत्व, अमूर्तिकत्व, कर्तृत्व, स्वदेहपरिमाणत्व, भोक्तृत्व, संसारित्व, सिद्धत्व, ऊर्ध्वगमनत्व ।
यहाँ भी एक-एक विशेषण के द्वारा एक-एक दर्शन का निराकरण किया गया है | यथा - ‘जीवो’ पद से चार्वाक मत का निराकरण किया गया है | ‘उवओगमओ’ पद से नैयायिक मत का निराकरण किया गया है | ‘अमुत्ति’ पद से भट्ट चार्वाक मत का निराकरण किया गया है | ‘कत्ता’ पद से सांख्य मत का निराकरण किया गया है | ‘सदेहपरिमाण’ पद से नैयायिक, मीमांसक एवं सांख्य मत का निराकरण किया गया है | ‘भोत्ता’ पद से बौद्ध मत का निराकरण किया गया है | ‘संसारित्व’ पद से सदाशिव मत का निराकरण किया गया है । ‘सिद्धत्व’ पद से भट्ट एवं चार्वाक मत का निराकरण किया गया है | ‘ऊर्ध्वगमनत्व’ पद से मांडलिक मत का निराकरण किया गया है | (-बृहद्रव्यसंग्रह, गाथा 2 की टीका )
कहने की आवश्यकता नहीं है कि जो व्यक्ति जैनेतर दर्शनों से परिचित नहीं होगा, वह इन्हें कथमपि नहीं समझ सकता | इसी प्रकार के और भी असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, पर सबका अभिप्राय यही है कि जैनेतर दर्शनों के ज्ञान बिना जैन शास्त्रों के कथनों को ठीक से नहीं समझा जा सकता | मेरा स्वयं का भी अनुभव है कि मैंने जब से अन्य दर्शनों का कुछ ज्ञान प्राप्त किया है, तब से मुझे जैन दर्शन के कथनों का ज्ञान अधिक स्पष्ट होने लगा है, अतः आप भी अन्य दर्शनों का थोडा बहुत ज्ञान अवश्य प्राप्त करें |
कुछ लोग कहते हैं कि हमें तो मात्र अध्यात्म का ज्ञान करना है, अतः हमें अन्य दर्शनों के ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं है, किन्तु ऐसी बात भी बिलकुल उचित नहीं है | आध्यात्मिक ग्रंथों को समझने के लिए भी अन्य दर्शनों का ज्ञान बहुत आवश्यक है | ‘समयसार’ जैसे परम आध्यात्मिक ग्रन्थ में भी स्थान-स्थान पर अन्य दर्शनों का बहुत उल्लेख हुआ है, जिसे अन्य दर्शनों के ज्ञान बिना कथमपि नही समझा जा सकता है | यथा -
(क) गाथा 117,122, 340 में स्पष्टतया नाम लेकर सांख्यदर्शन का उल्लेख आया है- ‘पसज्जदे संखसमओ वा’ इत्यादि |
(ख) गाथा 321, 322 में ईश्वरसृष्टिकर्तृत्ववादी दर्शन का निराकरण आया है।
(ग) गाथा 347 में बौद्ध दर्शन का निराकरण आया है |
(घ) गाथा 86 में द्विक्रियावादी दर्शन का निराकरण आया है |
समयसार के हिंदी-वचनिकाकार पं. जयचंदजी छाबड़ा ने ऐसे स्थलों को अपने भावार्थों में अन्य दर्शनों की अपेक्षाएं स्पष्ट करके विस्तार से लिखा है (-देखिए समयसारकलश 131,183 का भावार्थ ) | जरा सोचिए, यदि पं. जयचंदजी छाबड़ा अन्य दर्शनों के ज्ञाता न होते तो बात को कैसे स्पष्ट करते ?
पं. जयचंदजी छाबड़ा ही नहीं, पं. टोडरमलजी, पं. भागचन्द्रजी, पं. टेकचंदजी आदि लगभग सभी आध्यात्मिक विद्वान् भी विविध दर्शनों का उचित ज्ञान रखते थे और इसीलिए वे जैन तत्त्वज्ञान को ठीक से समझने-समझाने में सफल हुए थे, अतः हम सबको भी यथाशक्ति अन्य दर्शनों के ज्ञान का प्रयास करना चाहिए | अन्य दर्शनों के ज्ञान बिना तो हम समयसार के “नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते | चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे ||" जैसे आध्यात्मिक श्लोक को भी ठीक से नहीं समझ सकते, क्योंकि इसमें भी अन्य मतों की विवक्षा से ही सारे कथन हैं | (-देखिए समयसारकलश 1 का भावार्थ ) | बहुत क्या कहें, एक णमोकार मन्त्र को भी अन्य दर्शनों के ज्ञान बिना ठीक से नहीं समझा जा सकता |
द्रव्यसंग्रह के आध्यात्मिक टीकाकार ब्रह्मदेवसूरि ने तो प्रत्येक गाथा का शब्दार्थ, नयार्थ, आगमार्थ और भावार्थ के साथ मतार्थ भी समझना आवश्यक बताया है | यथा -
“एवं शब्दनयमतागमभावार्थो यथासम्भवं व्याख्यानकाले सर्वत्र ज्ञातव्यः ।” (-गाथा 2)
इससे अन्य दर्शनों के ज्ञान की महती आवश्यकता सिद्ध होती है | ब्रह्मदेवसूरि ने अपने परमात्मप्रकाश आदि सभी टीकाग्रन्थों में स्थान-स्थान पर अन्यमत-विवक्षा को स्पष्ट किया है ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि न्याय, दर्शन, सिद्धांत विषयक ग्रन्थों के लिए ही नहीं, अध्यात्मविषयक ग्रन्थों के परिज्ञान हेतु भी अन्य दर्शनों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है |
जरा गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिए कि यदि अन्य दर्शनों का ज्ञान अत्यंत आवश्यक नहीं होता तो जैन आचार्यों ने प्रथमानुयोग के कथा-ग्रन्थों, पुराणों, श्रावकाचारों और पूजापाठ तक के प्राथमिक ग्रन्थों में भी षड्दर्शनों का परिचय क्यों लिखा है | यथा -
• महापुराण, सर्ग 3 से 5 में विस्तार से षड्दर्शनों का परिचय दिया गया है ।
• यशस्तिलकचम्पू, षष्ठ आश्वास में भी विस्तार से षड्दर्शनों का परिचय दिया गया है |
• भद्रबाहुकथा में रइधू कवि लिखते हैं कि गोवर्धनाचार्य ने भद्रबाहु को सर्वप्रथम षड्दर्शनों का ज्ञान कराया | (पृष्ठ 7)
• मोक्षमार्गप्रकाशक में पं. टोडरमलजी ने एक पूरा पांचवां अधिकार अन्यमत-समीक्षा का लिखा |
• हरिभद्रसूरि ने तो स्वतंत्र रूप से ही एक ‘षड्दर्शनसमुच्चय’ नामक विशाल ग्रन्थ लिखा है |
• सिद्धचक्र-विधान में भी कविवर पं. सन्तलाल जी ने अनेक स्थानों पर विविध दर्शनों का उल्लेख किया है | देखें पृष्ठ 144, 248, 251 आदि |
इन सबसे भी यह भलीभांति सिद्ध होता है कि समीचीन शास्त्रज्ञान के लिए अन्य दर्शनों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है | दरअसल, दर्शनशास्त्र एक है, सांख्य, न्याय, वैशेषिक आदि तो उसकी शाखाएँ हैं | शाखाओं के ज्ञान बिना वृक्ष का पूर्ण ज्ञान सम्भव ही नहीं है | अतः दर्शनशास्त्र के सभी विद्यार्थियों को सभी विविध दर्शनों का ज्ञान अवश्य करना चाहिए |
पुनश्च, यदि आप शास्त्रों के वक्ता, व्याख्याता या अध्यापक हैं, तब तो आपके लिए अन्य दर्शनों का ज्ञान होना बहुत ही आवश्यक है | आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है | जैसा कि निम्नलिखित प्रमाणों से स्पष्ट होता है-
(क) ‘ससमयपरसमयविदण्डू’ - आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्यभक्ति
अर्थ - आचार्य स्वसमय और परसमय के ज्ञाता होते हैं |
(ख) ‘तात्कालिकस्वसमयपरसमयपारगो’ - धवला १/१/४८
अर्थ - वक्ता/लेखक को तात्कालिक (अपने समय के) सभी स्वसमय और परसमयों का पारगामी होना चाहिए |
(ग) ‘सर्वेषां दर्शनानां मनसि परिगतज्ञानवेत्ता भवेद्धि |
वक्ता शास्त्रस्य धीमान् …||’ - आचार्य सोमसेन, 1/20
अर्थ - शास्त्रों के धीमान् वक्ता को सर्व दर्शनों का विशेष ज्ञाता होना चाहिए |
अन्त में, जिसप्रकार यहाँ अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता प्रतिपादित की, उसीप्रकार व्याकरण, भाषा, साहित्य, इतिहास, न्याय आदि अन्य शास्त्रों के ज्ञान की आवश्यकता/उपयोगिता भी समझ लेनी चाहिए | विशेष रूप से वक्ता/लेखक को तो सर्व शास्त्रों का ज्ञान होना ही चाहिए, जैसा कि 'प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः’ (आत्मानुशासन, 5), ‘सर्वशास्त्रकलाभिज्ञो’ (इन्द्रनंदी) आदि वाक्यों द्वारा पूर्वाचार्यो ने भी स्पष्ट कहा है ।