अनेकान्तदृष्टि से सामाजिक सौहार्द
-प्रो. वीरसागर जैन
जैनदर्शन एक अत्यन्त व्यावहारिक दर्शन है। उसके सिद्धान्त न केवल पारमार्थिक दृष्टि से, अपितु लौकिक या व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यन्त उपादेय सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि आचार्य विद्यानन्द जैसे अध्ययनशील विद्वान् मुनि ने भी जैनदर्शन के सभी प्रमुख सिद्धान्तों की सामाजिक/व्यावहारिक व्याख्या निम्न प्रकार से प्रसिद्ध की है:-
“आत्मानुशासन - स्वयं पर स्वयं का शासन ।
अनेकान्तवाद - सबके साथ समन्वय की कला ।
अहिंसावाद - किसी का मन व्यर्थ में मत दुखाओ ।
अपरिग्रहवाद - अति लोभ खतरे की घण्टी है।
स्याद्वाद - पहले तोलो, बोलो ।” ¹
जैनदर्शन के प्रमुख सिद्धान्तो की उक्त व्याख्या को उन्होंने ‘विश्वकल्याण में उपयोगी श्रेष्ठ जीवन-निर्माण के पाँच सूत्र’ शीर्षक देकर सर्वत्र प्रचारित किया है । इससे सिद्ध होता है कि जैनदर्शन एक अत्यन्त व्यावहारिक दर्शन है और उसके सिद्धान्त आत्मकल्याणार्थ ही नहीं, विश्वकल्याणार्थ भी अत्यंत उपयोगी हैं।
आचार्य विद्यानन्द मुनि की भाँति अन्य भी अनेक मनीषी चिन्तकों ने जैनदर्शन और उसके सिद्धान्तों की व्यावहारिकता एवं लोकहित में उपादेयता पर बड़ा ही सुन्दर प्रकाश डाला है, परन्तु विस्तार-भय से यहाँ हम उसकी विशेष चर्चा नहीं कर सकते हैं । मात्र सत्यदेव विद्यांलकार का एक कथन उद्धृत कर अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं। उनका वह कथन इस प्रकार है-
“जैन धर्म का साम्यभाव या समाजवाद केवल मानव तक सीमित नहीं है। प्राणिमात्र उसकी परिधि में समा जाते हैं … वह विपक्षी के लिए भी अपने ही समान गुंजाइश रखता है। यदि दूसरे के लिए गुंजाइश रखकर जीवन व्यवहार किया जाये तो संघर्ष की संभावना नहीं रहती ।… व्यावहारिक रूप में जैनधर्म की क्षमता असीम है।” ²
आज हमारा विषय जैनदर्शन के एक अत्यन्त प्रमुख सिद्धान्त अनेकान्तवाद की सामाजिक सौहार्द में उपयोगिता पर चिन्तन करना है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसके लिए सर्वप्रथम हमें अनेकान्तवाद का समीचीन स्वरूप समझना होगा, तभी हम उसकी सामाजिक सौहार्द में भूमिका का निर्णय एवं विचार कर पाएंगे।
क्या है अनेकान्तवाद का स्वरूप-
¹ कुन्दकुन्द भारती शोध संस्थान, नई दिल्ली के प्रवेशद्वार पर प्रचारित-प्रसारित ।
² बाबू छोटेलाल जैन अभिनन्दनग्रन्थ (कलकत्ता) में प्रकाशित उनके लेख से जैनदर्शन के अनुसार इस विषय की सभी वस्तुएँ अनेकान्तात्मक हैं, अनेकान्तस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप ही अनेकान्त है। अनेकान्त का अर्थ है कि उसमें अनेक अन्त हैं । ‘अन्त’ शब्द का अर्थ यहाँ धर्म, गुण, स्वभाव, विशेषता आदि समझना चाहिए तथा ‘अनेक’ का भी अर्थ वैसे तो अनेक (एकाधिक, बहुत, संख्यात, असंख्यात, और अनन्त तक भी ) समझे जा सकते हैं, किन्तु यहाँ रूढ़िवशाद् ‘दो’ ही और वह भी परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले दो ही ग्रहण किए जाएं तो उपयुक्त रहेगा, उसी से अनेकान्तवाद का सौन्दर्य अथवा वैशिष्ट्य उभरकर सामने आ सकेगा - ऐसा जैनाचार्यों का स्पष्ट निर्देश है।
कहने का तात्पर्य यह हुआ कि विश्व की प्रत्येक वस्तु परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले दो-दो धर्मों के अनन्त युगलों का निवास-स्थान है और इसीलिए वह अनेकान्तात्मक या अनेकान्तस्वरूप है। तथा इस प्रकार विश्व की प्रत्येक वस्तु को अनेकान्तस्वरूप मानना अनेकान्तवाद है और उसे कहने या समझने के लिए जिस समीचीन पद्धति का आश्रय लिया जाता है, वह स्याद्वाद है।
अनेकान्तवाद के साथ स्याद्वाद को भी समझना परम आवश्यक है । दोनों परस्पर अत्यन्त सम्बद्ध हैं । अनेकान्त प्रत्येक वस्तु को परस्पर विरुद्ध अनन्त धर्मयुगलों का निवास-स्थान घोषित करता है, किन्तु ऐसे जटिल स्वरूप वाली वस्तु को स्याद्वाद के बिना कहना या समझाना सम्भव नहीं है, अतः स्याद्वाद अनेकान्तात्मक वस्तु को समीचीनतया कहने या समझने की उत्तम विधि है, जो प्रायः इस प्रकार कथन करती है कि- प्रत्येक वस्तु स्यात् (कथंचित्/किसी एक अपेक्षा से/अमुक अपेक्षा से) अस्ति है और वही वस्तु स्यात् नास्ति भी है। अथवा स्यात् एक है, स्यात् अनेक भी है, इत्यादि ।³
अनेकान्त-स्याद्वाद का यह सिद्धान्त वस्तु-स्वरूप को समीचीनतया समझने-समझाने में अत्यन्त समर्थ होने से दर्शन के क्षेत्र में तो बड़ा उपयोगी/महत्त्वपूर्ण माना ही जाता हैः किन्तु व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और यहाँ तक कि सम्पूर्ण विश्व में सुख-शान्ति स्थापित करने की दृष्टि से भी बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और उपादेय समझा जाता है । इस सम्बन्ध में जैनाचार्यों ने तो अपना दृष्टिकोण प्रबलतापूर्वक रखा ही है, किन्तु दुनिया भर के समाजशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों ने भी इस संबंध में अपने विचार मुक्त कण्ठ से रखे हैं, जिससे सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता, आतंकवाद आदि सभी समस्याओं को समाप्त कर सामाजिक सौहार्द और समरसता का वातावरण बनाने में अनेकान्तदृष्टि अत्यन्त समर्थ है । यहाँ तक भी कहा जा सकता है कि एकमात्र अनेकान्तदृष्टि ही इसका समीचीन उपाय है, अमोघ उपाय है। प्रमाणस्वरूप हम यहाँ कतिपय जैनाचार्यों और विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनितिक चिन्तकों के कथन/विचार उद्धृत कर रहे हैं। आशा है, इनसे अनेकान्तदृष्टि की व्यावहारिक जीवन में उपयोगिता भलीभाँति स्पष्ट हो सकेगी |
³ ‘यदेव तत्तदेव अतत्, यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत्तदेवासत्, यदेवनित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्तुवस्तुत्वनिष्पादकपरस्पर-विरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः।’ -आचार्य अमृतचन्द्र, समयसार-टीका आत्मख्याति, परिशिष्ट तीन लोक का अद्वितीय गुरु है अनेकान्तवाद, उसके बिना लोकव्यवहार भी नहीं चल सकता -
"तस्यानेकान्तवादस्य लिंगं स्याच्छब्द उच्यते ।
तदुक्तार्थे बिना भावे लोकयात्रा न प्रवर्तते ।।"⁴
अर्थ- उस अनेकान्तवाद का चिह्न “स्यात्” शब्द है। उसे कहे बिना लोकयात्रा भी नहीं चल सकती है।
"जेण विणा लोगस्स वि ववहारो सव्वहा ण णिव्वहइ ।
तस्स भुवणेक्कगुरुणो णमो अणेगंतवायस्स ।।"⁵
अर्थ- जिसके बिना लोकव्यवहार भी बिल्कुल नहीं चल सकता, उस तीन लोक के अद्वितीय गुरु अनेकान्तवाद को मैं नमस्कार करता हूँ ।
सर्व विवादों का विनाशक (समाधान) है अनेकान्तवाद -
"परमागमस्य जीवं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् ।
सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ।।"⁶
अर्थ- जो सम्पूर्ण परमागम का प्राण है, जिसमें सभी नय इस प्रकार विलास करते हैं कि जन्मान्ध व्यक्तियों के हस्ति-दर्शन संबंधी विवाद की भाँति सर्व विवाद सहज ही समाप्त हो जाते हैं, उस अनेकान्तवाद को मैं नमस्कार करता हूँ।
विभिन्न दृष्टिकोणों के समन्वय की अद्भुत कला सिखाकर शान्ति स्थापित करता है अनेकान्तवाद -
"स्याद्वाद विभिन्न दृष्टिकोणों का समन्वय हमारे सामने उपस्थित करता है। वह अपने-अपने दृष्टिकोणों के अनुसार वस्तु के स्वरूप को मानकर परस्पर में विवाद करने वाले लोगों में समझौता कराने में समर्थ है। आज संसार में सर्वत्र त्राहि-त्राहि की पुकार सुनाई पड़ती है । अशांति से त्रस्त मानव शांति की अभिलाषा करते हैं, लेकिन उनको पूर्ण शांति नहीं मिलती । शांति का यथार्थ उपाय है- विभिन्न दृष्टिकोणों का समन्वय या एकीकरण | किसी भी वस्तु को यदि पूर्ण रूप से समझना है तो इसके लिए विभिन्न दृष्टिकोणों से उसका निरीक्षण करना आवश्यक है, क्योंकि ऐसा किए बिना, वस्तु का पूर्ण रूप समझ में नहीं आ सकता । किसी भी बात पर विभिन्न
⁴ आचार्य जटासिहनन्दि, वरांगचरित्र, 26/83
⁵ आचार्य सिद्धसेन, सन्मतिसूत्र, 3/69
⁶ आचार्य अमृतचन्द्र, पुरुषार्थसिद्धि-उपाय, श्लोक 2 दृष्टिकोणों से विचार करने का नाम ही स्याद्वाद है और एक दृष्टिकोण से किसी विषय पर विचार करना एकान्त दृष्टि है । जैन दर्शन का स्याद्वाद सिद्धान्त भिन्न-भिन्न मतभेदों को दूर करने में सर्वथा समर्थ है ।" 7
-प्रो. उदयचन्द्र जैन वाराणसी
विरोधी से भी प्यार करने की अद्भुत कला सिखाता है अनेकान्तवादः-
“जिस प्रकार मैं स्याद्वाद को जानता हूँ उसी प्रकार उसको मानता भी हूँ । मुझे यह अनेकान्त बड़ा प्रिय है । … पहले मैं मानता था कि मेरे विरोधी अज्ञान में हैं । आज मैं विरोधियों से प्यार करता हूँ । क्योंकि अब मैं विरोधियों की दृष्टि से अपने को देख सकता हूँ । मेरा अनेकान्तवाद सत्य और अहिंसा इन्हीं युगल सिद्धान्तों का परिणाम है ।” 8
-महात्मा गाँधी
साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, असहिष्णुता आदि अनेक समस्याओं का समाधान है अनेकान्तवाद :-
“जैनाचार्यों की यह वृत्ति अभिनन्दनीय है कि उन्होंने ईश्वरीय आलोक के नाम पर उपदेशों में ही सत्य का एकाधिकार नहीं बताया । इसके फलस्वरूप उन्होंने साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के दुगुणों को दूर कर दिया, जिसके कारण मानव-इतिहास भयंकर द्वन्द्व और रक्तताप के द्वारा कलंकित हुआ । अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद विश्व के दर्शनों में अद्वितीय है । … स्याद्वाद सहिष्णुता और क्षमा का प्रतीक है; कारण वह यह मानता है कि दूसरे व्यक्ति को भी कुछ कहना है । सम्यग्दर्शन और स्याद्वाद के सिद्धान्त औद्यौगिक पद्धति द्वारा प्रस्तुत की गई जटिल समस्याओं को सुलझाने में अत्यधिक कार्यकारी होंगे।" 9
-डॉ. एस. वी. नियोगी, भूतपूर्व चीफ जस्टिस तथा कुलपति, नागपुर विश्वविद्यालय
लोकदृष्टि से भी बड़ा उपयोगी है अनेकान्तवाद :-
“जैनों के अनेकान्त को कुछ आस्तिक दर्शनों में छल की संज्ञा दी गई है, किन्तु यह ठीक नहीं है । अनेकान्तवाद संशय का हेतु भी नहीं है, क्योंकि सप्तभंगी नय में समझाया गया है कि प्रत्येक पदार्थ में स्व-स्वरूप और पर-स्वरूप के विशेषों की उपलब्धि होती है । इस दृष्टि से अनेकान्तवाद में संशय की कोई गुंजाइश नहीं है । इसके अतिरिक्त वह तो लोकदृष्टि से जितना उपयोगी है, विचार की दृष्टि से भी उतना ही उपयोगी है ।” 10
- डॉ. वाचस्पति गैरोला
नैतिक उत्कर्ष और व्यावहारिक शुद्धि के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है अनेकान्तवाद :-
7 अनेकान्त और स्याद्वाद ( गणेश वर्णी संस्थान, वाराणसी ), पृष्ठ 19
8 जैनधर्म, अहिंसा और महात्मा गांधी ( कुंदकुंद भारती, नई दिल्ली ), पृष्ठ
9 प्राकृतविद्या, अप्रैल-दिसम्बर, 2008, पृष्ठ 155
10 भारतीय दर्शन, पृष्ठ 114 "पाणिनि-सूत्र ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः’ (पा. 4/4/30) के अनुसार जैनदर्शन आस्तिक दर्शन में ही परिगणित होता है । जैनदर्शन का अनेकान्त तो उसका आधार-स्तम्भ है ही, परन्तु परमार्थतः प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के लिए भी इसको आवश्यक मानना चाहिए, क्योंकि स्वभावतः प्रत्येक तत्त्व में अनेकरूपता होनी चाहिए । नैतिक उत्कर्ष के साथ व्यावहारिक शुद्धि के लिए भी अनेकान्त दर्शन जैन दर्शन की महान् देन है ।"11
-मंगलदेव शास्त्री
स्याद्वाद से सर्व सत्य विचारों का द्वार खुल जाता हैः-
"जैनदर्शन के सिद्धान्त प्राचीन तत्त्वज्ञान तथा धार्मिक पद्धति के अभ्यासियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके स्याद्वाद नामक सिद्धान्त से सर्व सत्य विचारों का द्वार खुल जाता है।"12
-हर्मन जैकोबी
अनेकान्तवाद को जितना शीघ्र अपनाया जाएगा उतनी ही शीघ्र विश्व में शान्ति स्थापित होगी :-
“इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेकान्त का अनुसंधान भारत की अहिंसा-साधना का चरम उत्कर्ष है और सारा संसार इसे जितनी ही शीघ्र अपनाएगा, विश्व में शान्ति भी उतनी ही शीघ्र स्थापित होगी ।"13
-रामधारीसिंह दिनकर
अनेकान्त दृष्टि ही पूर्ण एवं यथार्थ दृष्टि है :-
"सब धर्मो में एक परमतत्त्व का ही गुणगान है और सब दर्शनों ने भिन्न-भिन्न शैली से उसे परमतत्त्व का विवेचन किया है, परन्तु स्याद्वाद शैली संपूर्ण एवं यथार्थ है। "14
-श्रीमद् राजचंद्र
इसी प्रकार के विचार महान् वैज्ञानिक ‘अल्वर्ट आइन्स्टीन’ ने भी प्रकट किए है - "हम केवल सापेक्ष सत्य को ही जान सकते हैं। वस्तु के समग्र सत्यांशों को विश्वद्रष्टा ही जान सकता है। कारण कि वस्तु में अनेक गुण रहते हैं और वे स्याद्वाद से ही अल्प ज्ञानी द्वारा जाने जा सकते हैं। "15
-आइन्स्टीन
भौतिक एकता और विश्वशान्ति के लिए अत्यधिक उपयोगी है अनेकान्तवाद :-
11 जैनदर्शन ( महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य ), प्राक्कथन . पृष्ठ 14
12 स्याद्वाद ( पं. जवाहरलाल शास्त्री ), पृष्ठ 249
13 संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 137
14 श्रीमद्राजचंद्र, भाग 1, पृष्ठ 245
15 स्याद्वाद ( पं. जवाहरलाल शास्त्री ), पृष्ठ 249 "अनेकान्त जैन दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसको पश्चिमी वैज्ञानिकों तथा हिन्दू तर्कशास्त्रियों द्वारा सामान्य रूप से ही नहीं स्वीकृत किया गया है, किन्तु उसको भौतिक एकता या समझौते द्वारा विश्वशान्ति के लिए भी प्रमुख सिद्धांत माना गया है ।"¹⁶
- प्रो. आर्ची ब्रह्म
विचार-सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना जागृत करता है अनेकान्तवादः-
"अनेकान्त दृष्टि से विचारसहिष्णुता और परसन्मान की वृत्ति जग जाने पर मन दूसरे के स्वार्थ को अपना स्वार्थ मानने की ओर प्रवृत्त होकर समझौते की ओर सदा झुकने लगता है । जब उसके स्वाधिकार के साथ ही साथ स्वकर्त्तव्य का भी भाव उदित होता है, तब वह दूसरे के आन्तरिक मामलों में जबरदस्ती टाँग नहीं अड़ाता ।… पं. जवाहरलाल नेहरू ने विश्वशान्ति के लिए जिन पंचशील सिद्धान्तों का उद्घोष किया है उनकी बुनियाद अनेकान्तदृष्टि-समझौते की वृत्ति, सह-अस्तित्व की भावना, समन्वय के प्रति निष्ठा और वर्ण-जाति-रंग आदि के भेदों से ऊपर उठकर मानव मात्र के समभ्युदय की कामना पर ही तो रखी गई है। "¹⁷
-डॉ. महेंद्रकुमार न्यायाचार्य
एकान्तवादी मानसिक रूप से विकलांग होता है:-
"विकलांग दो प्रकार के होते हैं- शारीरिक विकलांग और मानसिक विकलांग । जो एकान्तवादी लोग होते हैं वे मानसिक विकलांग होते हैं। अनेकान्तवादी ही पूर्ण या सर्वांग हो सकता है और वही दूसरों की भी विकलांगता मिटा सकता है। "¹⁸
-प्रो. वाचस्पति उपाध्याय
वचनशुद्धि का एक मात्र उपाय है अनेकान्त-स्याद्वादः-
"जैन दर्शन का स्याद्वाद सिद्धान्त वस्तुतः बोलने की कला का ही चरम विकास है। स्याद्वाद के अवलम्बन बिना कभी कोई अच्छा नहीं बोल सकता, क्योंकि उसके बिना सच्चा नहीं बोला जा सकता। जो सच्चा न हो, वह कैसा भी हो, अच्छा नहीं हो सकता, अतः अच्छा व सच्चा बोलने के लिए स्याद्वाद का अवलम्बन अनिवार्य है । वस्तुतः अनन्ताधर्मात्मक जटिल वस्तु को स्याद्वाद के बिना बोलने की कोई भी कोशिश ठीक से हो ही नहीं सकती ।"¹⁹
-प्राकृतविद्या
आतंकवाद कहता है- मरो और मारो, अनेकान्तवाद कहता है- जीओ और जीने दो:-
¹⁶ आचार्य शिवसागर स्मृति ग्रन्थ, पृष्ठ 546
¹⁷ जैनदर्शन ( गणेशवर्णी संस्थान, वाराणसी ) पृष्ठ 474
¹⁸ जैनसमाज, ग्रीनपार्क, नईदिल्ली द्वारा आयोजित विकलाग सहायता शिविर में।
¹⁹ प्राकृतविद्या, ( अप्रैल-दिसम्बर, 2008), कवरपृष्ठ 2 "एकान्तदृष्टि आतंकवाद है। उसमें पर-सहिष्णुता नहीं होती । उसका सिद्धान्त ही होता है- ‘मरो और मारो’ । किन्तु अनेकान्तदृष्टि का सिद्धान्त है- ‘जियो और जीने दो’ । वह सभी को अपने साथ-साथ पर का भी ध्यान रखना सिखाती है । मतभेद होते हुए भी मनभेद रखने की अद्भुत कला का विकास अनेकान्तदृष्टि से ही होता है। अतः एकान्तदृष्टि आग्रहपूर्ण होने से विविध विवादों को जन्म देकर सर्वत्र अशान्ति का वातावरण उत्पन्न करती है और अनेकान्तदृष्टि सर्व विवादों को समुचित रूप से सुलझा कर सर्वत्र शान्ति की स्थापना करती है।"20
- आचार्य विद्यानंद मुनि
अन्त में मैं अपनी बात श्रद्धेय पं. चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ के एक महत्त्वपूर्ण कथन के साथ पूर्ण करता हूँ
:
"दुनिया में बहुत से वाद हैं, स्याद्वाद भी उनमें से एक है, पर वह अपनी अद्भुत विशेषता लिए हुए है। दूसरे वाद विवादों को उत्पन्न कर संघर्ष को विनष्ट करने में ही अपना गौरव प्रकट करता है। स्याद्वाद के अतिरिक्त सब वादों में आग्रह है, इसलिए उनमें से विग्रह फूट पड़ते हैं; किन्तु स्याद्वाद तो निराग्रह वाद है, उसमें कहीं भी आग्रह का नाम नहीं है। यही कारण है कि इसमें किसी भी प्रकार के विग्रह का अवकाश नहीं है।"21
-पं. चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ
20 आचार्यश्री के प्रवचनों से
21 प्राकृतविद्या, (अप्रैल - दिसम्बर, 2008), कवरपृष्ठ 111