अलंकारशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता
-प्रो. वीरसागर जैन
जीवन के हर क्षेत्र में, ख़ास तौर से भारतीय जीवन के तो सभी क्षेत्रों में अलंकारों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि यहाँ ‘सत्य’ और ‘शिव’ के साथ-साथ ‘सुन्दर’ को भी महत्त्व दिया गया है । अलंकार शोभावर्धक तत्त्व का नाम है । वह मात्र काव्य में ही नहीं, सभी विषयों में सौन्दर्य की सृष्टि करता है ।
जिस प्रकार स्वर्णकार आभूषण में ताँबा आदि मिलाकर, विविध आकृतियाँ बनाकर उसमें आकर्षण और सौन्दर्य पैदा करता है, उसी प्रकार साहित्यकार अपनी उक्तियों में, कथनों में कल्पना आदि तत्त्व मिलाकर, उसमें भी विविध छंद-अलंकारादि लगाकर उनमें आकर्षण, सौन्दर्य और हृदयग्राह्यता उत्पन्न करता है ।
जिस प्रकार बिना वैसा-वैसा किये अच्छे आभूषण नहीं बनते, उसी प्रकार बिना वैसा-वैसा किये अच्छा साहित्य भी नहीं बनता ।
अतः अलंकार का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है । अलंकारों के ज्ञान बिना किसी भी प्रतिपादन को भलीभांति नहीं समझा जा सकता ।
उदाहरणार्थ- रामकथा को ही लीजिए । हम समझते हैं कि उसमें कदम-कदम पर इतने अधिक आलंकारिक प्रयोग हैं कि अलंकारों को समझे बिना उसकी एक भी बात को ठीक से नहीं समझा जा सकता । जैसे कि राम ने सूर्पनखा की नाक काट ली । विचारणीय है कि राम जैसे मर्यादा-पुरुषोत्तम जो हमारी संस्कृति के सर्वोच्च आदर्श हैं, एक स्त्री की नाक कैसे काट सकते हैं? और यदि काट सकते हैं तो फिर वे हमारी संस्कृति के आदर्श कैसे माने जा सकते हैं? अतः निःसंदेह उक्तकथन को आलंकारिक ही समझना चाहिए । सूर्पनखा को अपने सौन्दर्य पर बड़ा गर्व था, वह अपनी सखियों के बीच बड़ी हेकी जमाकर राम-लक्ष्मण के पास गई थी कि वह उनसे परिणय करके ही रहेगी, किन्तु उसकी दाल न गली और उसे निराश होकर वापिस लौटना पडा, अतः कवियों ने कहा कि उसकी नाक कट गई ।
इसी प्रकार हनुमान् का पहाड़ उठाकर लाना भी एक आलंकारिक प्रयोग ही है | हनुमान् औषध-पत्र लेने पहाड़ पर पहुँचे | साम्य के कारण अनेक औषधों में उन्हें भ्रम उत्पन्न हो गया | इतना अवकाश था नहीं कि लौटकर वैद्य से पुनः परामर्श किया जा सके | अतः वे उन सभी औषधों को लेकर आ गए| कवियों ने इसे अतिशयोक्ति आदि अलंकार लगाकर ऐसा कहा कि वे पहाड़ उठा लाए | उसी प्रकार, जिस प्रकार कभी-कभी मैं बहुत अधिक सब्जियां खरीद कर घर ले जाता हूँ तो पत्नी कहती है कि पूरी सब्जीमंडी उठा लाए |
इसी प्रकार रावण के दस सिर, वानर सेना, अहल्या का उद्धार, शबरी के बेर, जल पर शिला-सेतु-निर्माण आदि अनेकानेक प्रसंग ऐसे हैं जिनका समीचीन अर्थ अलंकारों के ज्ञान के बिना नहीं समझा जा सकता| ये सब ‘अभिधा’ के प्रयोग नहीं हैं, जैसा कि लोग समझ लेते हैं । हनुमान् ने सचमुच में अपना सीना नहीं चीरा था और न ही उसमें इस तरह से राम-लक्ष्मण दिखाई दिए थे, जैसे कि आजकल चित्र बनाकर दिखाया जाता है |
इसी प्रकार तुलसी-पूजन, गणेश-पूजा, गंगा-स्नान, गो-सेवा, गोवर्धन-पूजा आदि रोजमर्रा के अनेकानेक विषय ऐसे हैं जिनको अलंकारों के ज्ञान के उपरांत ही ठीक से समझकर लाभान्वित हुआ जा सकता है |
अलंकारों के ज्ञान को अप्रयोजनभूत या व्यर्थ समझना एक बड़ी भारी भूल है |
अलंकारशास्त्र हमें यह भी सिखाता है कि हर बात को अच्छे ढंग से ही कहो, बुरे ढंग से(बुरे शब्दों से, गाली-गलोच से) कहने की कोई आवश्यकता नहीं है | अपने सभी भावों को अच्छे शब्दों से भी सशक्त ढंग से व्यक्त किया जा सकता है |