अहो शुद्ध चिद्रूप | Aho Shuddh Chidrup

◆ शुद्ध चिद्रूप ◆

अहो!
शुद्ध चिद्रूप तो चिद्रूप ही है।
कर्ता है, ऐसा भी नहीं है
कर्ता नहीं, ऐसा भी नहीं।

अकर्ता है, ऐसा भी नहीं है
अकर्ता नहीं, ऐसा भी नहीं।

कर्ता-अकर्ता भी है-ऐसा भी नहीं
कर्ता-अकर्ता नहीं है-ऐसा भी नहीं।

कर्ता है, व्यवहार का पक्ष है
अकर्ता है, निश्चय का पक्ष है।

सर्वत्र विकल्प हैं
दोनों में विरोध है अर्थात् भिन्नता है।

कर्ता हो तो भले हो
अकर्ता हो भले हो।
चित्स्वरूप जीव तो चित्स्वरूप ही है
सहज चित्स्वरूप।

व्यवहार का विषय तो नहीं
निश्चय का भी विषय नहीं
सकल नयों का अविषय
नय पक्षों से पार ‘निर्विकल्प’
परन्तु शून्य नहीं।

अनादि निधन सत्यस्वरूप
समय ही नहीं अपितु
चित्स्वभावी समयसार
प्रतिसमय अनुभव में आता हुआ
प्रतिभास रूप
ज्ञेयों की रुचि
पर्याय की दृष्टि
भेदों की अटक के कारण
अनुभव में नहीं आता।

ज्ञेयों की रुचि छोड़कर
पर्याय को देखने वाली आँख को
सर्वथा बंद करके
मात्र खुली हुई द्रव्यार्थिक चक्षु से देख
प्रतीति में आ जायेगा।

प्रतिभासित होता हुआ ‘ज्ञायक’
हो जायेगा अनुभव रूप
दिख जायेगा आत्मा
छूट जायेगा नयपक्ष
हो जायेगा साक्षीभूत
नयपक्षों का ज्ञाता मात्र
सर्वज्ञ प्रभु की भाँति
ज्ञानानंदमय कृतकृत्य।

:writing_hand:
आदरणीय बाल ब्रह्मचारी रवींद्र जी ‘आत्मन्’
(जिनवर गुणगान)

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