प्रभु महावीर का संदेश, “जियो और जीने दो”।
आतिशबाजी कहती है, “मरो और मारने दो”।।
जलाओ तो ज्ञानदीप जलाओ, मत जलाओ किसी को,
करो तो अज्ञान-अंधकार दूर करो, मत करो अंधा किसी को।।
कुछ देर की रोशनी और बहुत सारा शोर,
जहरीला धुआँ और घुटन है चारों ओर।।
सागर, बादल, गगन प्रदूषित,
नदी, धरा और पवन प्रदूषित।
बढ़ गया प्रदूषण इतना कि
अब साँस लेना हुआ है मुश्किल।।
पटाखों से झुलसे हुए जीवों की चीत्कार सुनो।
निर्दोष अनंत जीवों की रक्षा की अब तो पुकार सुनो।।
अरिहंत-सिद्ध ने हमें अहिंसा का मर्म सिखलाया है,
फिर हिंसामय दीवाली क्यों?
मनाना है निज ज्ञानदीप से अज्ञान-अंधकार भगाना है,
अहिंसामय दीवाली मिलकर घर-घर मनाना है।
घर-घर मनाना है।।
रचनाकार: ब्राह्मी जिनी जैन d/o समकित जैन शास्त्री, ब्राह्मी सुंदरी विद्या निकेतन, दिल्ली
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