अहिंसा | Ahinsa (पावनी जैन)

जब था नहीं कोई हमारे ध्यान में,
वे वर्धमान महान्, जिन विचरें हमारे ध्यान में।
बस वीतराग-विज्ञान ही जिनके कथन का सार है,
दे दिया जग को संदेश, ‘जियो और जीने दो’।
तब घर-घर से निकली आवाज़, सत्य-अहिंसा ज़िंदाबाद।
तब वीर प्रभु ने हमें क्या सिखलाया? धर्म अहिंसामय बतलाया।
ठान लिया सब जीवों ने संदेशों को अपनाएँगे,
महावीर के पथ पर चलकर स्वयं सिद्ध बन जाएँगे।
मोह छोड़ेंगे, राग छोड़ेंगे, द्वेष छोड़ेंगे,
अहिंसा के संबंध में सच्ची समझ लाकर, जीवन में अपनाएँगे।
रागादिक भावों को धर्म न मानकर निज स्वरूप रम जाएँगे,
ध्याय कर निज आत्म को स्वयं वीर बन जाएँगे।

रचनाकार: पावनी जैन (Pavni Jain), ब्राह्मी सुंदरी विद्या निकेतन, दिल्ली
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