अज्ञानी-ज्ञानी संवाद | Agyani-Gyani Samvad

अज्ञानी-
मैं क्या करूँ नाथ ! मुझे कर्मों ने घेरा, मुझे कर्मों ने घेरा।
कर्मों के उदय से ही, दुःख पाया घनेरा।।1।।

ज्ञानी-
तेरी ही है भूल, नहिं कर्मों ने दुःखेरा।
निज रूप देख नाथ, होवे तुझमें उजेरा ।। 2 ।।

अज्ञानी-
शास्त्र पढूँ तो मैं पढ़ नहीं पाऊँ।
सिर भी पचाऊँ, पढूँ, फिर भूल जाऊँ।।
मेटो अज्ञान मुझे कर्मों ने घेरा ।। 3 ।।

ज्ञानी-
कल्याण का निमित्त जान, प्रीति से पढ़ना।
ज्ञानी का समागम, फिर-फिर के करना।।
थिरता से मिटेगा अज्ञान अंधेरा।। तेरी।। 4।।

अज्ञानी-
सामायिक करूँ तो, मोसे बैठा नहिं जावे।
पैर-कमर दूखें, मेरा जिया घबड़ावे।।
चाहूँ मैं आराम, मुझे कर्मों ने घेरा ।। 5 ।।

ज्ञानी-
सामायिक स्वरूप, पहले जिनवाणी से जानो।
अर्थ भाव उसका, निश्चय उर आनो।।
है उसमें ही आराम जान, आतम चितेरा ।। 6 ।।

अज्ञानी-
माला फेरूँ तो मन घूमने को जावे।
उसे समझाऊँ तो फिर नींद आ जावे।।
कैसे जपूँ जाप, मुझे कर्मों ने घेरा।। तेरी.।। 7।।

ज्ञानी-
मंत्र के वाच्य का, स्वरूप यदि पावे।
प्रयोजन समझे, तो नींद नहीं आवे ।।
सहज जपे जाप, मिटे मन का घुमेरा ।। तेरी.।। 8।।

अज्ञानी-
उपवास न होवे मोसे, नीरस न भावे।
एकाशन करूँ,
शाम भूख लग आवे ।।
स्वाद नहीं छूटे, मुझे कर्मों ने घेरा।। तेरी.।। 9।।

ज्ञानी-
निराहारी आत्मरूप, जब तू जाने।
विषय-भोग दुःखदायी, श्रद्धा उर आने ।।
मिटे बाह्य स्वाद रस, आवे आतम केरा ।। तेरी. ।। 10।।

अज्ञानी-
पुण्य नहीं होवे मोसे, पाप नहीं छूटे।
देने के नाम से, पेट
मेरा दूखे ।।
कैसे हो कल्याण, मुझे कर्मों ने घेरा ।। तेरी.।। 11।।

ज्ञानी-
पर वस्तु परभाव भिन्न जब जाने।
आत्मानुभूति कर, उनमें नहिं साने ।।
पाप-पुण्य छूटें, होवे निज में बसेरा ।। तेरी.।। 12।।

उपसंहार-
कर्म तो तेरे दुःख के जिम्मेवार नहीं हैं।
अपने स्वभाव बिना, सुख नहीं कहीं है ।।
कर्मों को तो ज्ञान नहिं, उनका और तेरा ।। तेरी. ।। 13 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह