आधुनिक युग के प्रमुख जैन नैयायिक | Adhunik Yug Ke Pramukh Jain Naiyayik

आधुनिक युग के प्रमुख जैन नैयायिक

-प्रो. वीरसागर जैन

जैन नैयायिकों की परम्परा प्राचीन काल से आज तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है | प्राचीन नैयायिकों ने तो जैन न्याय के प्रणयन में स्तुत्य योगदान किया ही है, उनकी तो अद्भुत से अद्भुत महिमा है ही, किन्तु आधुनिक युग में भी अनेक विद्वानों ने जैन न्याय के विकास में महनीय योगदान किया है, जिसकी कथमपि उपेक्षा नहीं की जा सकती | आज मैं यहाँ आधुनिक युग के ही कतिपय प्रमुख जैन नैयायिकों का पुण्य-स्मरण करना चाहता हूँ | जैन न्याय के विद्यार्थियों को इनसे भी अवश्य परिचित होना चाहिए | ध्यान रहे ‘आधुनिक युग’ का तात्पर्य यहाँ मुख्यतः बीसवीं शताब्दी से ही है।

आधुनिक युग के जैन नैयायिकों की संख्या भी यद्यपि मेरे आकलन के अनुसार सहस्राधिक है, क्योंकि पहले न्यायशास्त्र का अध्ययन-अध्यापन बड़े व्यापक स्तर पर होता था, किन्तु अभी हम यहाँ ऐसे कतिपय प्रमुख जैन नैयायिकों का ही स्मरण करेंगे, जो सूर्य-चन्द्र के समान विशेष दैदीप्यमान रहे | जैन न्याय के विद्यार्थियों को कम से कम इनसे तो अवश्य परिचित होना चाहिए | न केवल परिचित होना चाहिए, अपितु इनका कृतज्ञ भी होना चाहिए और इनसे प्रेरणा लेकर स्वयं को भी न्यायविद्या की प्रगति में यथाशक्ति योगदान करना चाहिए |

ध्यातव्य है कि अभी यहाँ केवल दिवंगत नैयायिकों का ही पुण्य-स्मरण किया जा रहा है, अन्यथा अभी वर्तमान में भी अनेक नैयायिक जैन न्याय की महती सेवा कर रहे हैं, जो कथमपि उपेक्षणीय नहीं है, किन्तु उनके सम्बन्ध में अलग से लिखने का प्रयास किया जाएगा |

आधुनिक युग के इन जैन नैयायिकों के सम्बन्ध में भी यद्यपि मेरा मन इनके जीवनवृत्त, व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व का विस्तृत परिचय देने का कर रहा है, परन्तु अभी विस्तारभय के कारण अतिसंक्षिप्त परिचय ही यहाँ लिखा जा रहा है, ताकि विद्यार्थी सरलतापूर्वक इन महापुरुषों से कुछ तो परिचित हो सकें, विस्तृत परिचय बाद में कभी लिखने का प्रयास किया जाएगा | यथा-

1. पं. गोपालदास बरैया (1867 से 1917) - आधुनिक युग में एक प्रकार से आपने ही सर्वप्रथम शिक्षा का शुभारम्भ किया | यही कारण है कि आप ‘गुरूणां गुरुः’ कहलाते हैं | वर्तमान में जितने भी जैन विद्वान् हैं, उन सबका मूल कहीं-न-कहीं आपसे जुड़ा हुआ मिलता है | आपने मुरैना (मध्यप्रदेश) में जो जैन सिद्धांत विद्यालय स्थापित किया, वह युगांतरकारी सिद्ध हुआ | उसमें बड़े-बड़े धुरन्धर विद्वान् तैयार हुए | यह विद्यालय आज भी आपकी अमर कीर्ति को प्रकाशित करता हुआ भलीभांति चल रहा है | आपने जैन न्याय के विकास में जो योगदान किया है, वह अविस्मरणीय है | आपने अपनी कृति ‘जैन सिद्धांत प्रवेशिका’ में भी एक अध्याय न्याय विषय का लिखकर जन-जन को जैन न्याय से परिचित कराने का स्तुत्य प्रयास किया है | इसके अतिरिक्त ‘जैन सिद्धान्त दर्पण’ एवं ‘सुशीला’ उपन्यास भी आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं |

2. पं. गणेशप्रसाद वर्णी (1874 से 15 सितम्बर 1961)- आपने जैन न्याय के अध्ययन-अध्यापन को पूरे देश में अद्भुत गति प्रदान की | आपने गाँव-गाँव में जैन दर्शन एवं न्याय के व्यवस्थित अध्ययन-अध्यापन हेतु विद्यालय-महाविद्यालय खुलवाये | स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी भी आपकी ही अक्षय कीर्ति का स्मारक है । आपने स्वयं इस महाविद्यालय का प्रथम विद्यार्थी बनकर न्यायाचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की थी । आपकी सारी ही कथा बड़ी रोमांचक एवं शिक्षाप्रद है, जिसे ‘मेरी जीवनगाथा’ पढ़कर कुछ समझा जा सकता है । आपका तप वस्तुतः प्रणम्य है, समाज आपके उपकारों से कभी भी उऋण नहीं हो सकता । जीवन के अन्त में आपने सम्मेदशिखर तीर्थ पर दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण करके शरीर का त्याग किया ।

3. पं. जुगलकिशोर मुख्त्यार (1877 से 1968)- आप बहुत बड़े जैन नैयायिक थे । जैन न्याय के संस्थापक आचार्य समन्तभद्र पर तो आपका असाधारण अधिकार था । आपने उनकी सभी कृतियों का सम्पादन, अनुवाद एवं व्याख्यान आदि किया है, जिनमें स्वतंत्ररूप से भी आप्तमीमांसा, स्वयंभूस्तोत्र, युक्त्यनुशासन आदि हैं और समग्ररूप से ‘समन्तभद्र-भारती’ भी है । इनके अतिरिक्त भी आपके अनेक ग्रन्थ हैं- तत्त्वानुशासन, समाधितन्त्र, युगवीर-निबन्धावली, मेरी भावना आदि । वीर सेवा मन्दिर दिल्ली आपकी ही कीर्ति का अक्षय स्मारक है । आपकी ‘अनेकान्त’ पत्रिका अभी तक यहीं से निरन्तर प्रकाशित हो रही है ।

4. पं. सुखलाल संघवी (8 दिसम्बर 1880 से 2 मार्च 1978)- आपकी कहानी अत्यन्त प्रेरणास्पद है । आपकी आँखें १६ वर्ष की उम्र में ही चेचक के कारण चली गई थीं, फिर भी आपने अपनी दृढ़ लगन के कारण दर्शन, न्याय, साहित्य, भाषा आदि विविध विषयों गहन अध्ययन किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने । आपको साहित्य अकादमी आदि के तो अनेक पुरस्कार मिले ही, भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ सम्मान भी प्राप्त हुआ । आपने जैन न्याय के अनेक ग्रन्थों का विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावनाओं के साथ सम्पादन किया है । आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं- दर्शन और चिन्तन, प्रमाणमीमांसा, सन्मतितर्क, जैन तर्कभाषा, तत्त्वार्थसूत्र आदि ।

5. पं. माणिकचन्द्र कौन्देय (1886 से ) - आप बहुत बड़े जैन नैयायिक थे । आपने आचार्य विद्यानंद स्वामी के ‘तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक’ का सात भागों में सम्पादन-अनुवाद किया है । इसके अतिरिक्त भी आपने अनेक महत्त्वपूर्ण निबन्ध जैन दर्शन एवं न्याय से सम्बन्धित लिखे हैं । न्यायशास्त्र में प्रवीण होने के कारण आपने अपने समय में अनेक शास्त्रार्थ भी किये थे और उनमें विजय भी प्राप्त की थी । समाज द्वारा आपको समय-समय पर तर्कशिरोमणि, न्यायरत्न, न्यायभूषण, न्यायदिवाकर आदि अनेक उपाधियों से भी विभूषित किया गया था । जिनशासन का रहस्य, धर्मफलसिद्धान्त, षट्द्रव्यों की आकृतियाँ आदि भी आपकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं ।

6. पं. चैनसुखदास न्यायतीर्थ (22 जनवरी 1899 से 26 जनवरी 1969)- आप जयपुर के सुप्रसिद्ध कॉलेज श्री दिगम्बर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य थे और जैन न्याय के विशिष्ट ज्ञाता एवं कुशल अध्यापक थे । आपने जैन न्याय के अध्ययन-अध्यापन को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किये । सरकारी स्तर पर जैन न्याय के ग्रन्थों को पाठ्यक्रम में निर्धारित कराने में भी आपका योगदान अविस्मरणीय है । आपकी अनेक कृतियाँ उपलब्ध हैं । यथा- जैनदर्शनसार, अर्हत्-प्रवचन, भावना-विवेक, प्रवचन-प्रकाश, सर्वार्थसिद्धिप्रसार, पावन प्रवाह, निक्षेपचक्र, स्याद्वाद आदि ।

7. पं. घनश्यामदास न्यायतीर्थ (1888 से 1924)- आप जैन सिद्धान्त विद्यालय मुरैना में पं. गोपालदासजी बरैया के साक्षात् शिष्य रहे और दिगम्बर जैन समाज के प्रथम न्यायतीर्थ बने । आपको गोम्मटसार की पूरी लगभग पौने दो हजार गाथाएँ कंठस्थ थीं । आप कुछ समय स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी में भी धर्माध्यापक रहे, किन्तु अन्त में खुरई में ही रहने लगे । आपकी अनूदित कृतियाँ हैं- परीक्षामुख, नाममाला, पद्मपुराण, पांडवपुराण, प्रभंजनचरित ।

8. पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री सिद्धांताचार्य (1903 से 1972) - आप जैन न्याय के विशिष्ट ज्ञाता एवं कुशल अध्यापक थे । आपने स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी के प्राचार्य/अधिष्ठाता के रूप में अपनी महती सेवाएँ समाज को प्रदान की हैं । ‘जैन न्याय’ आपकी अत्यन्त लोकप्रिय कृति है, जो दो भागों में मिलती है । इसके अतिरिक्त भी आपने अनेक ग्रन्थों का लेखन किया है । यथा- प्रमाणनयनििक्षेप, जैन सिद्धांत, जैन धर्म, समीचीन जैन धर्म, भगवान् ऋषभदेव, करुणानुयोग प्रवेशिका, चरणानुयोग प्रवेशिका, जैन साहित्य का इतिहास, आदि । आपके द्वारा सम्पादित कृतियाँ भी बहुत हैं । यथा- द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र, जयधवला (13 भाग ), गोम्मटसार, धर्मामृत, भगवती आराधना आदि ।

9. पं. महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य (11 मई 1911 से 20 मई 1959)- आप तो मानों जैन न्याय के पर्यायवाची ही थे । आपका जन्म ही मानों जैन न्याय के उद्धार के लिए हुआ था । आप सदा ही जैन न्याय में रचे-पचे रहते थे । मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में भी आपने इतने अधिक न्यायग्रन्थों का सम्पादन-अनुवाद आदि किया है कि आश्चर्य होता है । तथा वे ग्रन्थ भी कोई साधारण नहीं हैं, अपितु जैन न्याय के अत्यन्त कठिन ग्रन्थों में गिने जाते हैं । आपने उनकी विद्वत्तापूर्ण विस्तृत प्रस्तावनाएँ भी लिखी हैं, जो एक-एक ही पीएच. डी. के समान जान पडती हैं । आपके प्रमुख ग्रन्थ हैं- न्यायविनिश्चय, सिद्धिविनिश्चय, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड, प्रमाण-मीमांसा, प्रमाणप्रमेयकलिका, युक्त्यनुशासन, सत्यशासनपरीक्षा, विश्वतत्त्वप्रकाश, जैन दर्शन आदि ।

10. डॉ. दरबारीलाल कोठिया (11 जून 1911 से 3 जनवरी 2000) - आप भी आधुनिक युग के सुप्रसिद्ध जैन नैयायिक हैं । आपका जन्म नैनागिर में हुआ था और समाधिमरण नेमावर में । आप संस्कृत, प्राकृत एवं हिन्दी तीनों भाषाओं में कुशलतापूर्वक लेखन करते थे । आपके द्वारा लिखित या सम्पादित कृतियाँ हैं- जैनदर्शने प्रमाणचिन्तनम्, जैनदर्शने करुणायाः स्वरूपम्, द्रव्यसंग्रहटीका, न्यायदीपिकायाः प्रश्नोत्तरावलिः, न्यायदीपिका, आप्तपरीक्षा, अध्यात्मकमलमार्तण्ड, स्याद्वादसिद्धि, पत्रपरीक्षा, प्रमाणपरीक्षा, प्रमाणप्रमेयकलिका, अष्टसहस्री, देवागमस्तोत्र, जैन न्याय की भूमिका, प्रमाणशास्त्र-परिशीलन, जैन तर्कशास्त्र में अनुमान-विचार, जैनतत्त्वमीमांसा आदि ।

11. पं. नरेन्द्रकुमार भिसीकर (29 जून 1906 से 1997)- आप श्री महावीर ब्रह्मचर्याश्रम कारंजा, महाराष्ट्र में धर्माध्यापक थे और न्यायशास्त्र भी बहुत अच्छा पढाते थे । मुझे भी श्री टोडरमल दिगम्बर जैन सिद्धांत महाविद्यालय में आपसे आप्तपरीक्षा पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । आपने अनेक न्याय एवं अध्यात्म के ग्रन्थों का मराठी भाषा में अनुवाद किया है । यथा- प्रमेयकमलमार्तण्ड, अष्टसहस्री, पंचाध्यायी, कातिकेयानुप्रेक्षा, मोक्षमार्गप्रकाशक आदि ।

12. पं. मूलचन्द्र शास्त्री (1903 से 5 अगस्त 1986)- आप दर्शन एवं न्याय के साथ-साथ साहित्य के भी अच्छे विद्वान् थे । आपने संस्कृतभाषा में भी वर्द्धमानचम्पू, वचनदूतम्, लोकाशाहमहाकाव्य आदि अनेक कृतियाँ की रचना की है | इसके अतिरिक्त भी आपने लगभग 50 कृतियों के अनुवादादि किये हैं | न्याय विषयक कृतियों में आप्तमीमांसाटीका, युक्त्यनुशासन, न्यायरत्न आदि विशेष उल्लेखनीय हैं |

13. मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानन्द’ (1915 से 30 मार्च 1978)- जैन न्याय को साधारण जनता तक पहुँचाने में आपका विशेष योगदान है | आपने समाज की सार्वजनिक सभाओं में जैन-न्याय के अनेकानेक ग्रन्थों पर व्याख्यान किये, जिनकी अनेक कृतियाँ भी प्रकाशित हुई हैं | यथा- अष्टसहस्री-प्रवचन, परीक्षामुख-प्रवचन, आप्तपरीक्षा-प्रवचन, आप्तमीमांसा-प्रवचन, सप्तभंगीतरंगिणी-प्रवचन, युक्त्यनुशासन-प्रवचन, आदि | इनके अतिरिक्त भी आपके शताधिक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं |

14. जिनेन्द्र वर्णी (14 मई 1921 से 24 मई 1983) - ‘जैनेन्द्र सिद्धांत कोश’ के प्रणेता जिनेन्द्र वर्णी जी को कौन नहीं जानता ? जैन न्याय आपका विशेष विषय था | आपने जैन न्याय पर सार्वजनिक सभा में भी व्याख्यान किये | आपके उन व्याख्यानों की एक कृति प्रकाशित भी हुई है- नयदर्पण | इसके अतिरिक्त आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं- शान्तिपथप्रदर्शन, पदार्थविज्ञान, कर्मसिद्धान्त, कर्मरहस्य, कुन्दकुन्द-दर्शन, समणसुत्तं आदि |

15. मुनि नथमल (14 जून 1920 से 9 मई 2010 )- आपका नाम बाद में आचार्य महाप्रज्ञ हो गया | न्यायशास्त्र-विषयक आपकी एक कृति बहुत प्रसिद्ध है- ‘जैन न्याय का विकास’ जो राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से प्रकाशित हुई है | इसके अतिरिक्त ‘समयसार : निश्चय-व्यवहार की यात्रा’ भी आपकी न्याय-अध्यात्म-मिश्रित महत्त्वपूर्ण कृति है | तेरापंथ अनुशास्ता आचार्य महाप्रज्ञ की प्रेरणा से जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय लाडनूं में भी जैन न्याय का अध्ययन निरन्तर प्रगतिशील है |

16. पं. उमरावसिंह न्यायतीर्थ- आप स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी में प्राध्यापक थे और पण्डित कैलाशचन्द्रजी के भी गुरु थे | आपने ‘आप्तपरीक्षा’ की एक सुन्दर हिन्दी टीका लिखी है, जो बहुत अच्छी है, मैंने स्वयं पढ़ी है, किन्तु उसके अतिरिक्त भी कोई ग्रन्थ होगा तो मुझे ज्ञात नहीं हुआ | आप अपने समय में एक ‘ज्ञानवर्द्धक’ नाम की पत्रिका भी निकाला करते थे |

17. पं. भंवरलाल न्यायतीर्थ (1915 से )- आप कुछ समय अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् के अध्यक्ष भी रहे | आपने जयपुर में एक प्रेस भी चलाई, जिससे अनेकानेक जैन ग्रन्थों का सम्पादन-अनुवादादि होकर उद्धार हुआ | इसके अतिरिक्त आपने एक ‘वीरवाणी’ नामक शोध-पत्रिका का भी नियमित प्रकाशन किया |

18. मुनि वीरसागरजी- जैन न्याय को सरल-सुबोध शैली में जन-जन तक पहुँचाने में आपका विशेष योगदान है | आप जैन न्याय को आध्यात्मिक दृष्टि से समझने-समझाने पर विशेष बल देते थे | प्रायः सोलापुर में आपके सान्निध्य में जैन न्याय के विशेष शिविर लगते थे | ‘अध्यात्मन्यायदीपिका’ आपकी अत्यन्त लोकप्रिय कृति है ।

19. प्रो. उदयचन्द्र जैन ( )- आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में प्रोफेसर थे और सर्वदर्शनाचार्य थे, सभी दर्शनों के अच्छे ज्ञाता थे | आपने जैन न्याय के अनेक ग्रन्थों के अनुवाद, परिशीलन, व्याख्यान आदि लिखकर जैन न्याय के विकास में महान् योगदान किया है | आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं-आप्तमीमांसा-

तत्त्वदीपिका, स्वयम्भूस्तोत्र-तत्त्वदीपिका, प्रमेयकमलमार्तण्ड-परिशीलन, न्यायकुमुदचन्द्र-परिशीलन आदि ।