आचार्यश्री विद्यानन्दजी मुनिराज को अत्यंत प्रिय सूक्तियाँ | Acharyashri Vidyanandaji Muniraj Ko Atyant Priy Suktiya

आचार्यश्री विद्यानन्दजी मुनिराज को अत्यंत प्रिय सूक्तियाँ

  1. हतं ज्ञानं क्रियाहीनम् ।
    क्रियाहीन ज्ञान व्यर्थ है।
    -तत्त्वार्थराजवार्तिक

  2. ज्ञानात् त्यागस्त्यागात् शान्तिः ।
    ज्ञान से त्याग होता है और त्याग से शांति ।
    -पंचाध्यायी

  3. न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
    ज्ञान के समान पवित्र कहीं कुछ नहीं है ।
    -गीता

  4. सत्संगः स्वर्गवासः ।
    सत्संग तो स्वर्ग का वास है।
    -चाणक्य-नीति

  5. धर्मध्यानपरो नरो प्रतिदिनं स स्यात् सदाऽऽरोग्यवान् ।
    प्रतिदिन धर्मध्यान में तत्पर रहनेवाला सदा नीरोग रहता है ।
    -मंगलाष्टक

  6. विद्या-भेषज-मन्त्र-तोय-हवनैर्यान्ति प्रशान्तिं बुधाः ।
    ज्ञानी विद्या, औषध, मंत्र, जल, हवन आदि से दुःखों को शांत करते हैं ।
    -दशभक्ति

  7. तत्त्वज्ञानविहीनानां दुःखमेव हि शाश्वतम् ।
    तत्त्वज्ञान से रहित पुरुष सदा दुःखी रहता है ।
    -क्षत्रचूड़ामणि

  8. संसारोऽपि हि सारः स्यात् दम्पत्योरेककण्ठयोः।
    यदि पति-पत्नी एककण्ठ हैं तो उनका संसार भी कथंचित् सार है ।
    -क्षत्रचूड़ामणि

  9. ध्यानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते क्षणात् ।
    ध्यानरूपी अग्नि क्षण भर में सर्वकर्मों को भस्म कर डालती है ।

  10. किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।
    विद्या कल्पलता के समान है जो क्या-क्या नहीं दे सकती?

  11. श्रेयांसि बहुविघ्नानि ।
    अच्छे कर्मों में बहुत विघ्न आते हैं ।

  12. सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ।
    सुख, दुःख, जीवन, मरण- सभी जीव के उपकार हैं ।
    -तत्त्वार्थसूत्र

  13. वक्तुरेव हि तज्जाड्यं यत्र श्रोता न बुद्धयते ।
    यह वक्ता की ही कमी है कि श्रोता कुछ समझ नहीं सके ।
    -तत्त्वार्थसूत्र

  14. अल्पारंभपरिग्रहत्वं मानुषस्य ।
    अल्प आरंभ और परिग्रह से मनुष्य आयु की प्राप्ति होती है ।

  15. अलं काकसहस्रेभ्यो एक एव दृषद् भवेत् ।
    हजारों कौओं को उड़ाने के लिए एक ही कंकर पर्याप्त है ।
    -क्षत्रचूड़ामणि

  16. गुरुद्रव्यं गुणवत् ग्राह्यम् ।
    गुरु की वस्तु गुणकारी समझकर ग्रहण करनी चाहिए ।

  17. केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम् ।
    किसी भी उपाय से फल की सिद्धि करना चाहिए ।

  18. उन्नतं मानसं यस्य भाग्यं तस्य समुन्नतम् ।
    जिसका मन ऊँचा है, उसका भाग्य बहुत ऊँचा है ।

  19. चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशवासितम् ।
    रागादि भावों से युक्त चित्त ही संसार है ।
    -क्षत्रचूड़ामणि

  20. न हि विषादो विधेयोऽत्र तद्धि वैदुष्यजं फलम् ।
    विद्वत्ता का फल यही है कि कभी विषाद् न किया जाए ।

  21. लोकोऽयं नाट्यशाला ।
    यह दुनिया नाटक के समान है ।

  22. सर्वभाषा सरस्वती ।
    सभी भाषाएँ सरस्वती हैं ।
    -शंकराचार्य 23. आत्मैव गुरुरात्मनः।
    आत्मा ही आत्मा का गुरु है।
    -इष्टोपदेश

  23. मौनं सर्वार्थसाधकम्।
    मौन सर्व प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाला है।

  24. वृद्धा नारी ईश्वरी।
    वृद्धा स्त्री ईश्वर के समान होती है।
    -पद्मपुराण

  25. अनुकरणप्रियाः शिष्याः/बालाः।
    शिष्य/बालक अपने गुरुजनों का अनुकरण करते हैं।

  26. स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।
    स्पष्टवादी धोखा नहीं देता।

  27. परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
    सभी जीव परस्पर एक-दूसरे का उपकार करते हैं।
    -तत्त्वार्थसूत्र

  28. हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि ज्ञानम्।
    हित की प्राप्ति और अहित के परिहार में ज्ञान ही समर्थ है।
    -परीक्षामुखसूत्र

  29. धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात्।
    उत्तम धर्म शुद्धोपयोग है।
    -पंचाध्यायी

  30. ज्ञातुरभिप्रायो नयः।
    ज्ञाता के हृदय के अभिप्राय को नय कहते हैं।

  31. आत्माश्रितो निश्चयनयः पराश्रितो व्यवहारनयः।
    आत्माश्रित निश्चयनय है, पराश्रित व्यवहारनय है।
    -आत्मख्याति, 272

  32. अविचलमेव वस्तुनिष्ठं ज्ञानं ध्यानमिष्यते।
    वस्तुनिष्ठ निश्चल ज्ञान को ही ध्यान कहते हैं।
    -भगवती आराधना, 1682 टीका

  33. कर्त्तव्यमेव धर्मः।
    कर्त्तव्य ही धर्म है।

  34. आत्मग्राहकं दर्शनं, परग्राहकं ज्ञानम्।
    दर्शनोपयोग आत्मग्राहक है और ज्ञानोपयोग परग्राहक है।
    -द्रव्यसंग्रह, गाथा 44

  35. एकः शरणं शुद्धोपयोगः।
    शुद्धोपयोग ही एक मात्र शरण है।
    -प्रवचनसार, 78

  36. चेतनालक्षणो जीवः।
    जीव का लक्षण चेतना है।
    -सर्वार्थसिद्धि

  37. ज्ञानामृतं भोजनम्।
    ज्ञानरूपी अमृत ही आत्मा का भोजन है।
    -भरतेश वैभव

  38. शरीरं व्याधिमंदिरम्।
    शरीर व्याधियों का मंदिर है। (5,68,99,584 रोग)

  39. एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।
    एक ही देव (वृषभदेव) सब जगत् में गूढ हैं।
    -पंचाध्यायी

  40. सूक्ष्मो भगवद् धर्मः।
    भगवत् प्रणीत धर्म सूक्ष्म है।
    -पुरुषार्थसिद्धयुपाय, 79

  41. अनन्तज्ञानादि शुद्धात्मस्वरूपं साधयन्तीति साधवः।
    अनंत ज्ञानादि शुद्धात्मस्वरूप को जो साधता है वह साधु है।
    -धवला 1, पृ. 52

  42. रत्नत्रयभावनया स्वात्मानं साधयतीति साधुः।
    रत्नत्रय की भावना से जो स्वात्मा को साधता है, वह साधु है।
    -प्र.सा. तात्प., गाथा 252

  43. आस्तिक्यम् आत्मविश्वासः।
    जो आत्मा में विश्वास करता है वह आस्तिक है।
    -रश्मिमाला

  44. परमगाम्भीर्य सहजा मूर्तिः।
    राग रहित मुखमुद्रा ही परम वीतरागता है।

  45. अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परम्।
    अहिंसा ही जीवों का परमब्रह्म है- यह बात जगत् में विदित है, प्रसिद्ध है।
    -स्वयंभूस्तोत्र 47. अहिंसैव जगन्माताऽहिंसैवानन्दपद्धतिः।
    अहिंसा ही जगत् की माता है और अहिंसा ही आनन्द का मार्ग है। -ज्ञानार्णव ४।३२

  46. दानं पारम्पर्येण मोक्षकारणम्।
    दान परम्परा से मोक्ष का कारण है।

  47. गुरुं विना सर्वे भवन्ति पशुसन्निभाः।
    गुरु के बिना सब पशुतुल्य है। -भद्रबाहुचारित्र

  48. विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत्।
    विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) का फल सम्पूर्ण दुःखों की निवृत्ति है।

  49. जिनधर्मो जगद्बन्धुः।
    जिनधर्मो जगत् का बन्धु है।

  50. न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति।
    साधु पुरुष किए हुए उपकार को कभी नहीं भूलते। -गोम्मटसार-टीका

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