आचार्यश्री विद्यानन्दजी मुनिराज को अत्यंत प्रिय सूक्तियाँ
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हतं ज्ञानं क्रियाहीनम् ।
क्रियाहीन ज्ञान व्यर्थ है।
-तत्त्वार्थराजवार्तिक -
ज्ञानात् त्यागस्त्यागात् शान्तिः ।
ज्ञान से त्याग होता है और त्याग से शांति ।
-पंचाध्यायी -
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
ज्ञान के समान पवित्र कहीं कुछ नहीं है ।
-गीता -
सत्संगः स्वर्गवासः ।
सत्संग तो स्वर्ग का वास है।
-चाणक्य-नीति -
धर्मध्यानपरो नरो प्रतिदिनं स स्यात् सदाऽऽरोग्यवान् ।
प्रतिदिन धर्मध्यान में तत्पर रहनेवाला सदा नीरोग रहता है ।
-मंगलाष्टक -
विद्या-भेषज-मन्त्र-तोय-हवनैर्यान्ति प्रशान्तिं बुधाः ।
ज्ञानी विद्या, औषध, मंत्र, जल, हवन आदि से दुःखों को शांत करते हैं ।
-दशभक्ति -
तत्त्वज्ञानविहीनानां दुःखमेव हि शाश्वतम् ।
तत्त्वज्ञान से रहित पुरुष सदा दुःखी रहता है ।
-क्षत्रचूड़ामणि -
संसारोऽपि हि सारः स्यात् दम्पत्योरेककण्ठयोः।
यदि पति-पत्नी एककण्ठ हैं तो उनका संसार भी कथंचित् सार है ।
-क्षत्रचूड़ामणि -
ध्यानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते क्षणात् ।
ध्यानरूपी अग्नि क्षण भर में सर्वकर्मों को भस्म कर डालती है । -
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।
विद्या कल्पलता के समान है जो क्या-क्या नहीं दे सकती? -
श्रेयांसि बहुविघ्नानि ।
अच्छे कर्मों में बहुत विघ्न आते हैं । -
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ।
सुख, दुःख, जीवन, मरण- सभी जीव के उपकार हैं ।
-तत्त्वार्थसूत्र -
वक्तुरेव हि तज्जाड्यं यत्र श्रोता न बुद्धयते ।
यह वक्ता की ही कमी है कि श्रोता कुछ समझ नहीं सके ।
-तत्त्वार्थसूत्र -
अल्पारंभपरिग्रहत्वं मानुषस्य ।
अल्प आरंभ और परिग्रह से मनुष्य आयु की प्राप्ति होती है । -
अलं काकसहस्रेभ्यो एक एव दृषद् भवेत् ।
हजारों कौओं को उड़ाने के लिए एक ही कंकर पर्याप्त है ।
-क्षत्रचूड़ामणि -
गुरुद्रव्यं गुणवत् ग्राह्यम् ।
गुरु की वस्तु गुणकारी समझकर ग्रहण करनी चाहिए । -
केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम् ।
किसी भी उपाय से फल की सिद्धि करना चाहिए । -
उन्नतं मानसं यस्य भाग्यं तस्य समुन्नतम् ।
जिसका मन ऊँचा है, उसका भाग्य बहुत ऊँचा है । -
चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशवासितम् ।
रागादि भावों से युक्त चित्त ही संसार है ।
-क्षत्रचूड़ामणि -
न हि विषादो विधेयोऽत्र तद्धि वैदुष्यजं फलम् ।
विद्वत्ता का फल यही है कि कभी विषाद् न किया जाए । -
लोकोऽयं नाट्यशाला ।
यह दुनिया नाटक के समान है । -
सर्वभाषा सरस्वती ।
सभी भाषाएँ सरस्वती हैं ।
-शंकराचार्य 23. आत्मैव गुरुरात्मनः।
आत्मा ही आत्मा का गुरु है।
-इष्टोपदेश -
मौनं सर्वार्थसाधकम्।
मौन सर्व प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाला है। -
वृद्धा नारी ईश्वरी।
वृद्धा स्त्री ईश्वर के समान होती है।
-पद्मपुराण -
अनुकरणप्रियाः शिष्याः/बालाः।
शिष्य/बालक अपने गुरुजनों का अनुकरण करते हैं। -
स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।
स्पष्टवादी धोखा नहीं देता। -
परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
सभी जीव परस्पर एक-दूसरे का उपकार करते हैं।
-तत्त्वार्थसूत्र -
हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि ज्ञानम्।
हित की प्राप्ति और अहित के परिहार में ज्ञान ही समर्थ है।
-परीक्षामुखसूत्र -
धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात्।
उत्तम धर्म शुद्धोपयोग है।
-पंचाध्यायी -
ज्ञातुरभिप्रायो नयः।
ज्ञाता के हृदय के अभिप्राय को नय कहते हैं। -
आत्माश्रितो निश्चयनयः पराश्रितो व्यवहारनयः।
आत्माश्रित निश्चयनय है, पराश्रित व्यवहारनय है।
-आत्मख्याति, 272 -
अविचलमेव वस्तुनिष्ठं ज्ञानं ध्यानमिष्यते।
वस्तुनिष्ठ निश्चल ज्ञान को ही ध्यान कहते हैं।
-भगवती आराधना, 1682 टीका -
कर्त्तव्यमेव धर्मः।
कर्त्तव्य ही धर्म है। -
आत्मग्राहकं दर्शनं, परग्राहकं ज्ञानम्।
दर्शनोपयोग आत्मग्राहक है और ज्ञानोपयोग परग्राहक है।
-द्रव्यसंग्रह, गाथा 44 -
एकः शरणं शुद्धोपयोगः।
शुद्धोपयोग ही एक मात्र शरण है।
-प्रवचनसार, 78 -
चेतनालक्षणो जीवः।
जीव का लक्षण चेतना है।
-सर्वार्थसिद्धि -
ज्ञानामृतं भोजनम्।
ज्ञानरूपी अमृत ही आत्मा का भोजन है।
-भरतेश वैभव -
शरीरं व्याधिमंदिरम्।
शरीर व्याधियों का मंदिर है। (5,68,99,584 रोग) -
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।
एक ही देव (वृषभदेव) सब जगत् में गूढ हैं।
-पंचाध्यायी -
सूक्ष्मो भगवद् धर्मः।
भगवत् प्रणीत धर्म सूक्ष्म है।
-पुरुषार्थसिद्धयुपाय, 79 -
अनन्तज्ञानादि शुद्धात्मस्वरूपं साधयन्तीति साधवः।
अनंत ज्ञानादि शुद्धात्मस्वरूप को जो साधता है वह साधु है।
-धवला 1, पृ. 52 -
रत्नत्रयभावनया स्वात्मानं साधयतीति साधुः।
रत्नत्रय की भावना से जो स्वात्मा को साधता है, वह साधु है।
-प्र.सा. तात्प., गाथा 252 -
आस्तिक्यम् आत्मविश्वासः।
जो आत्मा में विश्वास करता है वह आस्तिक है।
-रश्मिमाला -
परमगाम्भीर्य सहजा मूर्तिः।
राग रहित मुखमुद्रा ही परम वीतरागता है। -
अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परम्।
अहिंसा ही जीवों का परमब्रह्म है- यह बात जगत् में विदित है, प्रसिद्ध है।
-स्वयंभूस्तोत्र 47. अहिंसैव जगन्माताऽहिंसैवानन्दपद्धतिः।
अहिंसा ही जगत् की माता है और अहिंसा ही आनन्द का मार्ग है। -ज्ञानार्णव ४।३२ -
दानं पारम्पर्येण मोक्षकारणम्।
दान परम्परा से मोक्ष का कारण है। -
गुरुं विना सर्वे भवन्ति पशुसन्निभाः।
गुरु के बिना सब पशुतुल्य है। -भद्रबाहुचारित्र -
विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत्।
विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) का फल सम्पूर्ण दुःखों की निवृत्ति है। -
जिनधर्मो जगद्बन्धुः।
जिनधर्मो जगत् का बन्धु है। -
न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति।
साधु पुरुष किए हुए उपकार को कभी नहीं भूलते। -गोम्मटसार-टीका
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