आचार्य श्री जयसेन पूजन
रचयिता: पं. अभयकुमार जैन, देवलाली
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आचार्य श्री जयसेन पूजन
रचना : पंडित अभयकुमार जैन,जैनदर्शनाचार्य
देवलाली
सर्वोदय अहिंसा
सर्वः सर्वत्र नन्दतु
स्वर : पंडित सुनीलजी शास्त्री-सुश्री श्वेतल जैन
राजकोट वीर प्रभु, गौतम सुगुरु के पद-कमल उर में धरूँ।
पंच परमागम प्रदाता पद्मनन्दि-पद नमूँ॥
ग्रन्थ त्रय टीका रची आचार्य अमृतचन्द्र ने।
तात्पर्यवृत्ति सरल टीका रची गुरु जयसेन ने॥
जयसेन गुरुवर की सरल शैली भविक-मन मोहती।
पद-खण्डना कर ग्रंथकर्ता के हृदय को खोलती॥
नय-विवक्षा भी बताते संशयादि विलीन हों।
अंत में भावार्थ लिखते भव्य! अब निज हित करो॥
गुरुवर कथित तात्पर्यवृत्ति बसे मम श्रद्धान में।
शुद्धात्म की अनुभूति विलसे स्व-संवेदन ज्ञान में॥
आप-सम निर्ग्रंथता की सदा वर्ते भावना।
निजानंद तरंग उछलें रहे नहिं कुछ कामना॥
(दोहा)
गुरु जयसेनाचार्य के चरणों का धरि ध्यान।
भाव सहित पूजन करूँ प्रकटें दर्शन-ज्ञान॥
श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र में आओ कृपा निधान।
आह्वानन सुस्थापना सन्निधिकरण विधान॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवर! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवर! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)
सम्यक् मति श्रुतज्ञान नीर से मिथ्यामल प्रक्षाल हो।
अजर अमर शुद्धात्म-स्वाद से जन्म जरा मृतु नाश हो॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
परम समरसी भाव व्याप्त है चिन्मय ज्ञान तरंग में।
गुरु-वचनों में भव-आताप विनाशक चंदन गंध है॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यः संसारताप-विनाशनाय
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत सुख-रस स्वाद निराकुल धारा बहे अखंड है।
क्षत-विक्षत सुख-ज्ञान पराश्रित दिखे न चेतनचन्द्र में॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
निर्विकल्प शुद्धात्म-भावना की सुगंध निष्काम है।
काम-कलंक विनाशक गुण-सुमनों से शोभित धाम है॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यः कामबाणविनाशनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
निज शुद्धात्म-समाधि सुखामृत रस में गुरुवर तृप्त हैं।
क्षुधा-वेदना उदित न होती चिदानन्द में मस्त हैं॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यग्ज्ञान ज्योति में झलके अनेकांतमय तत्त्व है।
संशय-विभ्रम-मोह रहित अनुभूति सदा निष्पक्ष है॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
द्रव्यकर्म से भिन्न राग को कहते चेतनरूप हैं।
किन्तु चिदातम ध्यान-अनल में जले कर्म की धूप है॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुक्लध्यान के फल में गुरुवर केवलज्ञान विलोकते।
किन्तु ध्यान भी विनाशीक लख शाश्वत ध्रुव-फल भोगते॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।
टीका के भावार्थों का अर्पित गुरुवर! यह अर्घ्य है।
भाववान शुद्धात्मतत्त्व की अनुभूति अन्अर्घ्य है॥
शुद्धात्मानुभूति लक्षण तात्पर्य-वृत्ति दातार हैं।
गुरु जयसेन चरण-कमलों में वन्दन शत शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यगुरुवरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
टीकाओं में लिख दिए कई रहस्य अनमोल।
जयमाला में कह रहा उनमें से कुछ बोल॥
(वीरछन्द)
जिन जिनवर अरु जिनवर-वृषभों का वर्णन गुरु करते हैं।
सासादन से क्षीणमोह तक एकदेश जिन कहते हैं॥
केवलि प्रभु जिनवर अरु जिनवर वृषभ कहें तीर्थंकर को।
सिद्धों को, तीर्थंकर को अरु नमन करें सब श्रमणों को॥
चार भाव पर्यायरूप अरु द्रव्यरूप है पंचम भाव।
द्रव्य और पर्यायमयी सापेक्ष सदा है आत्मपदार्थ॥
शुद्ध जीवत्व शक्ति लक्षण है पंचम भाव निरावरणी।
शुद्ध पारिणामिक स्वभाव है बन्ध-मोक्ष पर्याय विहीन॥
काललब्धिवश भव्यशक्ति की व्यक्ति जब कभी होती है।
श्रद्धा-ज्ञान-चरित्ररूप परमात्म-परिणति होती है॥
उपशम और क्षयोपशम क्षायिक समकित आगम कहता है।
अरु अध्यात्म कथन में यह शुद्धोपयोग कहलाता है॥
शुद्धात्म द्रव्य से भिन्न कथंचित् उपशमादि ये पर्यायें।
शुद्ध पारिणामिक अविनाशी विनाशीक ये पर्यायें॥
उपशम और क्षयोपशम क्षायिक राग रहित ये तीनों भाव।
यही मुक्ति के कारण होते, नहीं पारिणामिक शुध भाव॥
शक्तिरूप मुक्ति अनादि से शुद्ध पारिणामिक में है।
बन्ध-मोक्ष अरु उनके कारण से विरहित निष्क्रिय ध्रुव है॥
शुद्ध पारिणामिक स्वभाव तो ध्येयरूप, नहिं ध्यान स्वरूप।
मैं कर्ता नहिं बंध-मुक्ति का जन्म-मरण विरहित चिद्रूप॥
शुद्ध नयाश्रित एकदेश भावना क्षयोपशम ज्ञानस्वरूप।
किंतु ध्यान करनेवाले ध्याते निज को अखंड ध्रुवरूप॥
सकल आवरण रहित एक प्रत्यक्षरूप प्रतिभासस्वरूप।
शुद्ध पारिणामिक लक्षण मैं अविनाशी परमात्मस्वरूप॥
ॐ ह्रीं श्री जयसेनाचार्यदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये
जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
इसप्रकार शिवमार्ग का करें कथन आचार्य।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन ध्यावें पद-परमार्थ॥
(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Acharya_Shri_Jaysen_Pujan_Pt_Abhaykumar_Jain.pdf (2.9 MB, 19 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/54894।