आचार्य विमलसागरजी का आध्यात्मिक चिन्तन | Achary Vimalasagaraji Ka Adhyatmik Chintan

आचार्य विमलसागरजी का आध्यात्मिक चिन्तन

-प्रो. वीरसागर जैन

आचार्य विमलसागरजी महाराज को कौन नहीं जानता ? वे वात्सल्यरत्नाकर के विरुद से विख्यात थे और उन्होंने णमोकार मन्त्र के माध्यम से लाखों अजैनों को जैन धर्म के मार्ग पर लगाया था | वे येन केन प्रकारेण सभी को धर्म से जोड़कर रखते थे |

उनकी अनेक विशेषताएँ थीं, परन्तु मैं समझता हूँ कि उनकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अन्दर से एक गहरे आध्यात्मिक साधक थे | परन्तु आश्चर्य है कि लोगों का ध्यान उनके इस आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर प्रायः नहीं जाता है, अतः मैं यहाँ इस लेख में उनके इसी पक्ष की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, क्योंकि इससे सभी को आध्यात्मिक प्रेरणा भी प्राप्त होगी ।

अध्यात्मविद्या भारतीय संस्कृति का प्राण है। यदि दो शब्दों में समूची भारतीय संस्कृति का मूल सन्देश पूछा जाए तो वह वस्तुतः इतना ही है- आत्मानं विद्धि । अर्थात् आत्मा को जानो । उसमें भी जैन संस्कृति तो विशेष रूप से आध्यात्मिक मानी गई है। इसमें आत्मा के ज्ञान-ध्यान को ही शुद्ध धर्म कहा गया है और आत्मभ्रान्ति को ही संसार का मूल कारण कहा गया है। जैन धर्म के अनुसार जो आत्मा को जानता है वह ज्ञानी है, चाहे वह निरक्षर ही क्यों न हो और जो आत्मा को नहीं जानता वह सर्व ज्ञाता होते हुए भी नितान्त अज्ञानी है। इस विषय को मैं विस्तार से अपनी कृति ‘भारतीय दर्शन में आत्मा एवं परमात्मा’ में लिख चुका हूँ, यहाँ विशेष अवकाश नहीं है, किन्तु सारांश यही है कि हम सबको जीवन में अध्यात्म साधना अवश्य करना चाहिए | उसके बिना सारा जीवन व्यर्थ है |

आचार्य विमलसागरजी का आध्यात्मिक चिन्तन मुझे उनकी डायरीनुमा कृति ‘बोधामृत’ और ‘स्वात्म-सम्बोधन’ में यत्र-तत्र विकीर्ण उपलब्ध हुआ है, अतः यहाँ मैं उन्हीं में से कुछ महत्त्वपूर्ण एवं सरल-सुबोध कथन चयनित करके प्रस्तुत कर रहा हूँ। कहा जाता है कि ये आध्यात्मिक चिन्तन-बिन्दु उन्होंने रात्रि में आत्मध्यान करके लिखे थे | यथा-

“हे विमल आत्मन् ! तुम स्वयं शुद्ध निश्चय दृष्टि से अरहंत हो, तुम ही कर्मों से रहित सिद्ध हो, तुम ही आचार्य हो, तुम ही पाठक हो और तुम ही साधु हो। पर्याय की अशुद्धि द्रव्यशक्ति को व्यक्ति में नहीं लाने दे रही है और पर्याय अशुद्ध है तो वर्तमान में द्रव्य में भी अशुद्धता है। कारण ? पर्याय से द्रव्य भिन्न नहीं है और द्रव्य से पर्याय भिन्न नहीं है, अतः अपने शुद्ध चिदानन्द चैतन्य प्रभु को प्राप्त करने के लिए प्रयास करो- अर्हन्स्वरूपोऽहं। चिदानन्दस्वरूपोऽहं । परमानन्दाय नमः। जो कर्म से रहित अर्थात् निष्कर्म हैं उन्हें नमस्कार।”

“हे आत्मन् ! चौथे गुणस्थान से लेकर बाहरवें गुणस्थान तक वाले जीव अन्तरात्मा होते हैं। वे हीरे के समान हैं, जो स्व-पर-प्रकाशक कहलाते हैं। वास्तव में बहिरात्मा ही संसारी है तथा अन्तरात्मा को परमात्मा बनने का सर्टिफिकेट प्राप्त हो गया है। अन्तरात्मा ही संसार-शरीर-भोगों से विरक्त होकर परमात्मा बन जाता है। जो शाश्वत सुख में ही हमेशा के लिए निग्मन होकर सिद्ध शिला में तिष्ठता है, वही परम वीतरागी कहलाता है।”

“हे विमल आत्मन् ! तुम परमामृत रूप हो, ज्योतिस्वरूप हो, त्रिकाल त्रिलोक में सतत शुद्धात्मस्वरूप ज्ञानानन्दमयी चिदानन्द ज्योति-पुञ्ज तुम्हारा आत्मा ही वंदनीय है, पूजनीय है, उसी की सदुपासना करो।”

“हे आत्मन् ! तुम्हारी आत्मा कोहीनूर हीरे के समान है। जो हीरा स्वच्छ सुन्दर एवं बहुमान वाला है, उसकी प्राप्ति करो | वह स्वभाव से ही केवलज्ञानी है, पूर्ण आनन्दघन, चैतन्ययुक्त है।”

“निज आत्मा का ध्यान एक क्षण मात्र में असंख्यात कर्म-निर्जरा का कारण है।”

“हे विमल आत्मन्! निश्चय-दृष्टि से तुम स्वयं अरहन्त परमात्मा हो। तुम केवलज्ञान ज्योति से भासमान परम चैतन्य प्रभु हो। तुम्हारा वही स्वरूप है जो अरहन्त का है। अपने स्वरूप को अपना उपादेय मानकर उसी को भजो।”

“हे विमल आत्मन्! विमल कहते हैं मल-रहित आत्मा को। तुम भी अपनी पूर्ण अनुभूति, निर्मल आत्मा की प्राप्ति के लिए निरन्तर चारों आराधनाओं की आराधना करो, यही श्रेयोमार्ग है। निश्चय से परमसिद्ध परमात्मा के समान शुद्ध चैतन्य प्रभु चिन्तामणि श्रद्धा प्रतीति ही ज्ञान अराधना है। चैतन्य की सम्यक् अनुभूति ही चारित्र आराधना है, उस चैतन्य की खोज ही सच्ची तपाराधना है। इस प्रकार सच्ची आराधना आराधक को आराध्य बना देती है।”

इसी प्रकार और भी अनेक छोटे-छोटे सूक्ति-वाक्य भी आचार्य विमलसागरजी की डायरी में मिलते हैं, जिनसे बहुत उच्च कोटि की आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त होती है | यथा -

आत्मा की हानि शारीरिक रोग से नहीं, विकारी भावों से है।
हमारे परिणामों में ही सुख-दुःख है। शुद्ध परिणामों से सुख तथा अशुद्ध परिणामों से दुःख होता है।
लाखों शत्रुओं से उतनी हानि नहीं होती, जितनी क्रोधादि परिणामों से होती है।
समताभाव के बिना संयम आदि का पालन निरर्थक है।
जिस प्रकार विपरीत भोजन से स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, उसी प्रकार विषय-कषाय से आत्मा का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।
आत्महितैषी इन्द्र व चक्रवर्ती के भोगों को भी रोग समझता है।
शारीरिक सुख पराधीन है, परन्तु आत्मिक सुख स्वाधीन है।
पर की रक्षा करो, परन्तु उसमें अपने आपको मत भूलो |
दूसरों के प्रति बुरा विचार करके अपने उपयोग का दुरुपयोग मत करो।
राग-द्वेष को बुद्धिपूर्वक जीतने का प्रयत्न करो, ये केवल पठन-पाठन से दूर नहीं होंगे। आवश्यकता है कि परवस्तुओं में इष्टानिष्ट कल्पना न होने दो। यही सच्चा पुरुषार्थ है।

अपनी प्रवृत्ति निर्मल बनाओ, उस पर तुम्हारा अधिकार है।
पर की प्रवृत्ति आपके अधीन नहीं है, उसकी चिन्ता करना व्यर्थ है।
हे आत्मन् ! सुख न तो संसार में है न मोक्ष में है। न कर्मोदय में है, न कर्मों के अभाव में है। सुख तो स्वयं के ही पास है। इस निराकुल सुख का, आत्मा के साथ तादाम्य सम्बन्ध होते हुए भी मोहवश हम उसे अन्यत्र खोजने में लगे रहते हैं। जैसे कस्तूरी हिरण के पास है, पर वह खुशबू के लिए बाहर घूमता है।
अविरत सम्यग्दृष्टि अपने को द्रव्य-दृष्टि से अबन्धक जानता है किन्तु पर्याय से अपने को तृण-तुल्य मानता है कि अहो! मेरी पर्याय में अभी पामरता है। स्वभाव की प्रभुता होने पर भी पर्याय में अभी पामरता है। कहाँ केवली की दशा, कहाँ सन्त-मुनियों का पुरुषार्थ और कहाँ मेरी पामरता। इस तरह सम्यग्दृष्टि को पर्याय का विवेक होता है।
अपने ज्ञान-स्वभाव में लीन होने पर इच्छाओं का निरोध हो जाता है।
सौ टंची सोने के समान यह ज्ञायक भगवान् आत्मा पवित्र शुद्ध है। इसे जो दृष्टि में लेता है वह मालामाल बन जाता है। शुद्ध आत्मा की प्राप्ति ही सच्ची सम्पत्ति है।

अंत में, हम सभी आचार्य विमलसागरजी महाराज के आध्यात्मिक चिन्तन से लाभान्वित हों और समाज में भी उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष का विशेष प्रकाश होकर अध्यात्मविद्या का प्रचार-प्रसार बढे -इसी पवित्र भावना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।