हे धर्मधुरंधर गुणसागर, जिन आगम के तुम प्रखरपुंज।
हे ध्यान सिंधु धारा पवित्र, हित उपदेशी तुम ज्ञानकुंज।।
धन-जन-कंचन से हो विराग, सत् निजानंद करुणावतार।
हे मंगल-उत्तम-शरण आप, हे महातपस्वी गुणागार।।
हे कौंडकुंद के कुन्दकुन्द, जिनशासन श्रुत के कलाकार।
हे शिवपंथी आचार्य देवश्री, कुन्दकुन्द को नमस्कार।।
मिथ्यान्धकार को दिनकर सम, सुमार्ग पथिक तरु छाया हो।
मेरु समान अडिगपन जिनका, फिर किसी भी माया हो।।
स्वर्ण अक्षरों से परिभूषित, परमागम सम आप खड़े।
चौरासी पाहुड रचना कर, मोक्ष शिखर की ओर बढ़े।।
हे एलाचार्य वक्रग्रीव जिन, ध्वजा साध कुंद निजाधार।
हे शिवपंथी आचार्य देव श्री, कुन्दकुन्द को नमस्कार।।
रचनाकार: अमन जैन (Aman Jain), खनियाधाँना
Instagram: @amanJainapj